अंधेरे का सूरज निकाला जा रहा है संभले हालत को संभाला जा रहा है सच को हर सूरत में छुपाया जाता है झूठ का अख़बार निकाला जा रहा है कट रही उंगलियां नोचे जा रहे जिस्म ग़रीब को दहशत की आदत में ढ़ाला जा रहा है मौसम की नज़ाकत समझो दौरे हाज़िर में पगड़ियों को सरे आम उछाला जा रहा है कल उंगलियां पकड़ जिनकी यतीम बड़े हुए उन्हीं की परवरिश में नुक़्स निकाला जा रहा है कई सांप जकड़े है एक सोन चिड़िया को पालने वाले पर इल्ज़ाम डाला जा रहा है रखो नज़र दहलीज़ पर ये दौर तुम्हारा है हमारी पुरानी आंख का उजाला जा रहा है मिशाल मुहब्बत की इस क़दर करो क़ायम जो देखे यही कहे हिंदुस्तान वाला जा रहा है
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अंधेरे का सूरज निकला जा रहा है
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अंधेरे का सूरज निकाला जा रहा है संभले हालत को संभाला जा रहा है सच को हर सूरत में छुपाया जाता है झूठ का अख़बार निकाला जा रहा है एक तो परेशां है आवाम सियासत से एक बेबसी का जनाज़ा निकला जा रहा है कट रही उंगलियां नोचे जा रहे जिस्म ग़रीब को दहशत की आदत में ढ़ाला जा रहा है मौसम की नज़ाकत समझो दौरे हाज़िर में पगड़ियों को सरे आम उछाला जा रहा है कल उंगलियां पकड़ जिनकी यतीम बड़े हुए उन्हीं की परवरिश में नुक़्स निकाला जा रहा है जिसकी बदौलत ज़माना जानता है हमें वही खज़ाना घर से निकाला जा रहा है कई सांप जकड़े है एक सोन चिड़िया को पालने वाले पर इल्ज़ाम डाला जा रहा है रखो नज़र दहलीज़ पर ये दौर तुम्हारा है हमारी पुरानी आंख का उजाला जा रहा है मिशाल मुहब्बत की इस क़दर करो क़ायम जो देखे यही कहे हिंदुस्तान वाला जा रहा है
मोहब्बत में ऐसे नज़ारे हो गए
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इश्क़ में बहुत लोगों के ख़सारे हो गए हमें भी मोहब्बत में ऐसे नज़ारे हो गए वैसे वो मुस्कुराकर तो देखा करती है इसी भरम मे नए ज़माने पुराने हो गए चांद ने हटा दी घटा जो औढ़ रखी थी आंखों के सामने रंगीन उजाले हो गए नज़र रखने वाले ने जिस तौर से देखा उनके सारे पुराने ऐब हमारे हो गए जिसने पलट कर भी मेरी ओर ना देखा मशहूर उसके नाम से मेरे फ़साने हो गए तेरी ज़ुल्फ़़ की तासीर होठों का जायक जाइज़ा तेरे बदन का सब ज़माने हो गए ------------------------------------------
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सबके कर्ज़ उतारे जा रहे हैं कुछ तो बे-फ़र्ज़ उतारे जा रहे हैं अपने हालात तो गर्दिशों में है उनके मुक़द्दर संवारे जा रहे हैं खुदगर्ज़ बड़े हैं लोग जो एहसान भूल गये हर शख़्स की ख़ातिर दिया जो बलिदान भूल गए आंधियों से गुज़ारिश है अपनी हद में रहें पल भर हमारी क्या आंख लगी औकात भूल गए यह रखना याद मुनाफ़े की तिजारत के वास्ते इश्क़ की नई दुकानों पे कीमत सस्ती होती है ना दिखाया करो डर सैलाबों का सरफ़रोशों को हमारे हौसले से ज़्यादा धार नहीं तुम्हारी तलवार में उसने अपनी चाहत का इज़हार जो किया अधूरी मेरी एक ग़ज़ल मुकम्मल हो गई मेरी उम्मीद पे मेरे अपने ही खरे उतरे है ग़ैर क्या पता मैं किस तरह बहलाता हूं ना जाने आजकल ये क्या हो गया है मुझे पहले देखता हूं आईना फिर देखता हूं तुझे
Romantic Shayari (Double)
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झूठ नहीं कहता कईं मोहब्बत मैंने की हासिल की उम्मीद ना रखी बस दिल तक ही रही मैंने फिराई थी यूं ही रेत में उंगलियां ग़ौर से देखा तो तेरा अक़्स बन गया कमबख्त़ रात को भी चिढ़ तुझसे हो गई बैठू जो सोचने ढ़ल जाती है तावली मुक़द्दर ही मेरा खराब है शायद वरना खुशनसीब वो हैं जो उनके करीब हैं मालूम होता ग़र ये खेल लकीरों का तो ज़ख्मी कर हाथों को तेरी तक़दीर लिख लेता यह पैग़ाम आया ख़ुदा का मुहब्बत कर ले 'सत्यं' अब क्या कुसूर मेरा जो दिल उन पे आ गया यह कैसे मुकाम पर हम आ खड़े हुए तुम्हें दिल में बसाकर भी तन्हा से लगते हैं यह कैसी सज़ा मुझें वो शख़्स दे गया के क़त्ल भी ना किया और ज़िंदा भी ना छोड़ा तुम बैठी रहो देर तक मेरी नज़रों के सामने आज मेरा मन है बहुत मदहोश होने का वो बेरुखी करते हैं मेरे दिल से जाने क्यों जिन्हें करीब से तमन्ना देखने की है जिनका घर है दिल मेरा वो दूर जा बैठे भला कैसे किसी अजनबी को मैं पनाह दूं पूछता जो खुदा तेरी रजा क्या है तो सबसे पहले तेरा नाम मैं लेता तेरे दीदार में कोई बात है शायद लड़खड़ाता है जिस्म मेरा इज़ाज़त के बिना तमाम कोशिशें बेकार ही रही संभल पाने की जब डूब गए हम ...
समंदर से भी यार यारी रखा करो (Ghazal)
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समंदर से भी यार यारी रखा करो या उस पार जाने की कोई तैयारी रखा करो घर जाओ तो आईना जरूर देखना अपनी भी थोड़ी जिम्मेदारी रखा करो संभलकर उडो आसमानों की ऊंचाई पर श्येन से भी अपनी पहरेदारी रखा करो पेड़ लगाए हैं तो पत्थरबाज़ों से रहो होशियार कच्चे फलों पे भी थोड़ी निगरानी रखा करो हमें यह पता चला तो चला के वो बेवफा है आईने तुम ना इस कदर जी भारी रखा करो घर के अंदर दग़ाबाज़ भी दुश्मन से काम नहीं चिरागों पे अपने रोशनी बहुत सारी रखा करो --------------------------------------- देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें
Sher (2 lines)
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ये जरूरी नहीं हर बात शक़्ल ए अल्फाज़ ही हो मोहब्बत में खामोशी भी हाले-दिल बयां करती है मय पीकर तो मेरे जज़्बात नहीं संभलते मुझसे होश में रहता हूं तो ख़ामोश बहुत रहता हूं मेरी नज़रें जब उसकी जुल्फ़ों में उलझ जाती है जागते रहते हैं रात भर, कमबख़्त नींद कहां आती है दिल बड़ा चाहिए मोहब्बत के निशां छुपाने में हर किसी से तो यह तूफान संभाला नहीं जाता तेरे चेहरे पे जज्बातों की शबनम लिपटी है अब मैं मुहब्बत कहूं या परेशानी कहूं इसे मुहब्बत क्या है यह बीमार को पता है दवा है या ज़हर है तजुर्बेकार को पता है क्या तुमने 'सत्यं' को ख़ाक समझ रखा है इश्क़ फिर से, कोई मजाक समझ रखा है जब कभी तन्हाई में तेरी याद ने सताया मुझे बस मूंदकर आंखों को तेरी सूरत देखा किए