Ghazal (मुकम्मल) ता-उम्र जो मिला ज़ख़्म

ता-उम्र जो मिला ज़ख़्म, निशानी की तरह,
मैं ख़ून था जो बहा दिया पानी की तरह।

मैंने साथ रहने की अपनों से मिन्नतें कीं,
वो बात भी करते रहे मेहरबानी की तरह।

चाहे जितना भी तुम अहम किरदार बनो,
तुम्हें भुला दिया जाएगा कहानी की तरह।

मिट्टी को मिलना है इक दिन मिट्टी में,
ग़ुरूर भी ढल जाएगा जवानी की तरह।

फिर उनसे तर्क-ए-तअल्लुक़ ठीक नहीं,
याद रखना है अगर बात पुरानी की तरह।

मुझे ठुकरा के ग़ुरबत में गुज़ारा करती है,
जो मुझ पे हुकूमत करती थीं रानी की तरह।

तू भी दुनिया के रंग मुझको दिखाने लगी,
मैं भी छोड़ दूँगा तुझे एक दीवानी की तरह।

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