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Sher (मुकम्मल)

वो बेरुख़ ही हो जाते हैं मुझको देखकर, मैं बेख़ुद ही हो जाता हूँ जिनको देखकर। कुछ लोग जो दिल में आते नहीं हैं, कुछ लोग जो दिल से जाते नहीं हैं। जिसने मेरी आँखों से आँसू उतारे हैं मैं भी अपनी नज़र से उतार दूँगा उसे ​मैं अपने चेहरे पर सदा मुस्कान रखता हूँ अंदर से टूटा हूँ मगर दुश्मन परेशान रखता हूँ मैं समझता था वो समझता है मुझे, कौन खुदगर्ज भला समझता है मुझे। कैसी तौबा कैसा सज़्दा बेगुनाह के लिए सब बे-ईमानी है यारों एक तन्हा के लिए आज जाने गरज़ कैसी निकाल आई आसमां इक जमीं पर पिघलने लगा दर्दे-इश्क़ में मैं बद-हवास तो नहीं ला-इलाज हूं कुई बदज़ात तो नहीं यूं ही नइं कोई किनारा करता है इकला बाज़ अक्सर बुलंदी छूता है पैग़ाम यूं आया ख़ुदा का इश्क़ कर ले 'सत्यं' अब क्या खता मेरी बता दिल तुझपे आया मेरा ​लो अब शराफ़त छोड़ दी मैंने, तुम यारो अपनी हदें पहचानो। तबीयत मचल रही तो इज़हार कर, चारासाज़ी छोड़, किसी से प्यार कर। उससे इश्क़ है तो छुपाना कैसा, पर्दा गुनाहों पे रख, इबादत पे नहीं। प्यार की बस यही एक शर्त होनी चाहिए इंसाँ को इंसाँ की पहचान होनी चाहिए यह बात जुदा है, वो अब नहीं आएँगे, पर दि...

Ghazal (✓) अब और क्या बाकी रहा कमाने में

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उलझ कर शाम वो मेरी, ढली है एक ज़माने में, भटकते ही रहे हम तो, इसी शहर-ए-पुराने में। ​मुक़द्दर से मिला जो भी, उसे हँस कर क़ुबूल तू कर गँवा मत ज़ीस्त को अपनी, यूँ नादाँ आज़माने में। ​सजाया शौक़ से हमने भी इक उतरन को बदन पर, ज़माना ढूँढता है अब सुकून बस नए-पुराने में। ​सिरहाने थे जो मेरे दो चराग़ाँ कर रहे उजाला, अँधेरे कामयाब आख़िर हुए हैं मुझे रुलाने में। गुनाहगारों से अब जो है भरा यह शहर सारा ही, लगा है हर कोई बस दूसरों की कमी गिनाने में। ​यह सिलसिला पुराना है, कोई आज की बात नहीं, है आफ़ताब से ही रोशन महताब हर ज़माने में। नशा है साहिबे मसनद पे यूँ झूठी हवाओं का, नादान लगे हैं यहाँ, मुरझाए गुल खिलाने में। ​मुक़द्दर भी संवारें उनके और सबको साथ रक्खा, बता अब और क्या बाक़ी रहा सत्यम कमाने में

Sher (मुकम्मल)

शायद मिरी चाहत मिरे जानिब खड़ी है सच बोला था नज़मी ने वो मग़रूर बड़ी होगी देखो बेमिस्ल फ़ैसला ये ख़ुदाई का तोड़ते-तोड़ते मुझे वो ख़ुदा टूट गया मालूम है दिल की दहलीज़ उन्हें मगर ज़िद पे अड़े हैं कोई अब उनको पुकार ले उसने जब अपनी चाहत का इज़हार कर दिया अधूरी मेरी ग़ज़ल थी मुकम्मल हो गई मैं मुसाफ़िर हूँ तेरी रज़ा की किश्ती का चाहे साहिल पे ले चल चाहे डुबो दे मुझे एक मुद्दत से मैं ख़ामोश चला आता हूँ  सोचा कह दूँ हाल-ए-दिल तड़पना ठीक नहीं गुज़रा है बदलते हुए हालात का हर मंज़र एक बस तेरी याद के मौसम के सिवा लिख दी है तब्दीलियाँ हर दौर ने हर शै पे एक बस तेरी याद के मौसम के सिवा उसे भूल जाने की करामात हो जाए बग़ैर इल्ज़ाम के ये सारी बात हो जाए

Sher (✓)

यूँ आसाँ नहीं होता, सच-झूठ समझ पाना कई नक़ाब पड़े हैं, एक चेहरे पे आजकल नादानी में जो लोग क़दम उठा लेते हैं। पहचान की ख़ातिर पहचान गवाँ देते हैं, ​ तू भी छोड़ देना मुझे एक ज़माने के बाद, उतर जाएगा नशा मेरा आज़माने के बाद। चाहता हूँ ख़ुद से ही अब मैं रिहाई पाना, छीन ली है एक शख़्स ने आज़ादी मेरी। संभाला है ख़ुद को हमने क्या क्या देखकर किया नहीं गुनाह कोई ख़ुद को तन्हा देखकर हज़ार ग़म हैं और एक मुसीबत भी तो है, जिसको चाहूं मैं, वही दूर चला जाता है। क्यों लगाएं मैंने ये ख़्वाहिशों के मेले, मालूम था जब ख़्वाब हक़ीक़त नहीं होते। कैसे निकालूँ दिल से, बता तुझे ऐ सनम मैंने तो दर-आए को भी गले लगाया है

Sher | दीवान ए सत्यं | Diwan E Satyam | Anil Satyam

मेरे दुश्मन ही नहीं एक, मुझको ग़म देते हैं अब तो इनमें सितमग़र तेरा नाम भी आने लगा कभी सिगरेट कभी शराब हर रोज़ नए तज़ुर्बें करता हूं तेरे ग़म में सितमगर अपने रुतबे से भी गिर गया मैं मैं भी ख़्वाहिशों के शहर में, तू भी ख़्वाहिशों के शहर में घर अपना बनाने चले हैं, इस तपती हुई दोपहर में

Sher | 4 लाइन शायरी

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तुझे अपने दिल में बसा रखा है, खज़ाना जहाँ से छुपा रखा है। ​ज़माना खड़ा है खिलाफ़ अब मेरे, मगर हाथ तुझसे मिला रखा है। मिला एक मुझको भी ऐसा दिलदार लगा हूँ मैं जीने उसी का किरदार उसी का अक्स अब ज़ेहन में बसा है जुमेरात, जुमा, हो थावर, इतवार मोहब्बत जिससे भी मुझको ज़रा हो जाती है, वह मेरी जान से ज़्यादा मुझे हो जाती है। उसे पलकों पे अपनी मैं बिठा कर रखता हूँ, जो मेरी हो जाती है मेरी हो जाती है। कई दर्द से रोज़ उभरती हूँ मैं, कई आँखों से छुप निकलती हूँ मैं। जियूँ अपने ही तौर से, आरज़ू थी, ना-मर्ज़ी मगर राह बदलती हूँ मैं। मैं सितारों से सरगोशी करता हूं, जुगनुओं को रातभर खलता हूं। न देखो मुझे इतना गौर से यार मैं आंखों पर असर करता हूं। उसके सच झूठ में बदलने लगे, सोचते ही आँसू निकलने लगे। वो बेवफ़ा करता था वफ़ा की बात, आज सोचा तो दम ही निकलने लगे। सबके हिस्से हिस्से-दारी होनी चाहिए सबकी चादर-ओ-दीवारी होनी चाहिए बर्तन खाली चूल्हा ठंडा ही सही आँखों में 'सत्यं' ख़ुद्दारी होनी चाहिए ज़ख़्म मेरे अब मुस्कुराने लगे वो हमें और भी आज़माने लगे ​सजाए उसने फूल अपने बालों में भँवरे आगे-पीछे गुनगु...

Sher (शरारत)

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अपनी ख़्वाहिशों को यूं ना आज़माया कर कभी भीगने का मन हो तो भीग जाया कर तेरे बदन की शायरी में तमाम हरूफ बड़े कटीले हैं मैं शायर बड़ा गठीला हूं इज़ाज़्त दो कुछ अपना लिखूं हमें यूं लगा कि मोहब्बत का जमाना है फरवरी रोज़ ले लिया उसने पर रोज़ देने से मना कर दिया अब मैं अपने होठों को प्यासा नहीं रखता कई सहराओं से गुज़रा हूं दरिया तक आने में तेरे बदन पे जहाँ तिल है जानेमन, वहीं मेरा दिल है बेशक तू किसी से भी प्यार कर पर मुझे उस चीज से मत इनकार कर ता-उम्र साथ देना ना देना तो तेरी मर्जी है पर जरूरत के वक्त तो मत इनकार कर यह आलम शहनाई का होता तो अच्छा होता हिसाब जज़्बातों की भरपाई का होता तो अच्छा होता कमबख्त कंबल की आग भी अब बुझने लगी इस सर्दी इंतजाम रजाई का होता तो अच्छा होता ये सर्द रातें गरमा जाए तो क्या हो तन्हाई मेरी महक जाए तो क्या हो मैं तसव्वर में पढ़ रहा हूं हर-रात जिसे वही किताब हकीकत बन जाए तो क्या हो यही कमबख्त महीना था फरवरी इन्हीं दिनों छोड़ गई थी मुझे वो **मरी

Sher (मुकम्मल)

मेरे हुजरे में ना रख सामान मुजरे का काफ़िरों की बस्ती में इक नेक रहने दे वज़ह ऐसी के लबों पर अपने चुप्पी रखता हूं मुझपे यह इल्ज़ाम है मैं हक़ जमाने लगता हूं मेरी नज़रें उसकी ज़ुल्फ़ में उलझ जाती हैं रातों को हम जागते हैं नींद कहाँ आती है इस कैसे मुकाम पर हम आ खड़े हुए तुझे दिल में बसा कर भी तन्हा ही लगते हैं मुश्किल है वफ़ा-ए-गुल की ज़िम्मेदारी खिलता सुबह शब तक मुरझा वो जाता हैं जफ़ा फ़रेब दर्द अश्क़ होंगे महफ़िलों की तरह  रस्ते में इश्क के मिलेंगे संग ए मीलों की तरह

Sher | नशा (मुकम्मल) ✓

दर्द-ए-दिल अब मैं सुनाने से रहा अश्क आँखों के दिखाने से रहा ​होगी बरकत पैमाने में कभी जूठे प्याले मुँह लगाने से रहा तुम बैठी रहो मेरी नज़रों के सामने, आज मेरा मन है मदहोश हो जाने का। मय पी कर सँभलते ही नहीं जज़्बात मेरे, होश में रहता हूँ तो ख़ामोश ही रहता हूँ। कभी गुज़ारा था अपना बस एक ही जाम पर, अब तलब ऐसी बढ़ी है कि दो आँखें चाहिए। शराब पी कर भी जानाँ बहुत होश में हूँ, तू आँखों से ना पिला, बहकने का डर है। ​बंद है मय-कदा, और दूर उसका घर भी है, याद उसकी आज मुझको क़त्ल कर के छोड़ेगी । हर कोशिश मेरी बेकार रही संभल पाने की, कि हम डूब ही गए तेरी आँखों की गहराई में। तेरी आँखें नहीं तो क्या कोई जाम ही सही, अब सहारा कोई तो हो जिए जाने के लिए। तुम तो सियासती लफ़्ज़ों में बात करती हो, शराब छोड़ दो कहती हो, पास आती नहीं। ​थी हराम कल जो शराब, आज वो हलाल हो गई, होश में कह न सके, बेखुदी में बात हो गई साग़र है मेरे हाथ में आगोश में हो तुम, तौबा करूँ शराब से या तुमको छोड़ दूं ******************* मत फूंक मय से, अपना जिग़र ,सत्यं, बेख़ुद ही होना है तो इश्क़ में जला इस आँखों में उतर जा मेरी या जाम में उत...

Sher ✓ एक कलाम सत्यं के नाम

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यह मंज़र भी किसी दिन मैं दिखाऊँगा उसे किसी जाँबाज़ से रू-ब-रू कराऊँगा उसे ​छुपा रक्खा है इक इक्का अभी आस्तीन में ज़रूरत आ पडी तो खेल जाऊँगा उसे ख़ुदग़र्ज़ हैं वो लोग जो एहसान भूल गए लड़ा था जिनके वास्ते, वो इंसान भूल गए आँधियों से ये कहो कि अपनी हद में ही रहें शराफ़त हमनें क्या दिखाई, औक़ात भूल गए। दुश्मन को नज़र-ए-इनायत देते हैं हम ग़लती पे उसकी पर्दा गिरा देते हैं हम मिला न सकेगा वो आंखें कभी हमसे नज़रों में उसकी उसे गिरा देते हैं हम सितारे गर्दिशों में हैं हमारे इन दिनों वरना, लुटाएं हैं बड़े एहसाँ यहाँ ख़ैरात की सूरत। रहा है शौक़ ही ख़तरों से खेलना, होते रहे सामना, सो मोहब्बत कर ली। कभी बे-बात सुनना, कभी छुप कर रोना इतना आसान नहीं है, 'सत्यं' होना हुनर चेहरे को पढ़ने का क्या ही खूब आया है, उजाले में छुपी हर सूरत को पहचानता हूँ मैं। रौनक़ न देखिए मिरी सूरत की ऐ जनाब, ग़म को छुपाने का मिरा, अंदाज़ है यह। मैंने क़सम उठाई थी गुनाह न करने की मालूम न था लोग मोहब्बत को जुर्म समझते हैं मारा हुआ मैं अपनी ही क़िस्मत का हूँ 'सत्यं', वरना जो ख़ुशनसीब हैं, वो उनके क़रीब ह...

Ghazal (मुकम्मल) पुरानी ईंट सही हम

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ये रास्ते, ये सफ़र रह जाएँगे मेरे जाने के बाद और रह जाएँगी मेरी यादें मेरे जाने के बाद तुम्हें आँख भर के कोई न देखेगा ज़माने में बहुत रुलाएँगी बातें माँ-बाप गुज़र जाने के बाद हमें कमसिनी में घर से निकाला गया बे-क़सूर मेरे वालिद ने ये बताया जी भर आने के बाद वो बद-मिज़ाज अब बदज़ुबानी सहने लगा आ गया उसे सलीक़ा बेटी घर आने के बाद ये जो गुरूर है मेरा तेरी बेरुख़ी पे टिका उतर जाता है नशे-सा हँस के बुलाने के बाद मैं सोचता हूँ कोई ग़ज़ल अपने हालात पे लिखूँ मुहब्बत लिख जाता है क़लम उठाने के बाद उलझ गई थी ज़िंदगी सबको अपना कहते-कहते आसान कर लिया सबको औक़ात पे लाने के बाद पुरानी ईंट सही हम, तू बे-क़द्री से न फेंक हमें ही अलग किया हमसे सिर छुपाने के बाद

Ghazal (✓) इश्क़ में यार अपने ही बेगाने हो गए

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इश्क़ में यार अपने ही बेगाने हो गए हम मोहब्बत में उसी के दीवाने हो गए वैसे तो वो मुस्कुरा कर देखा करती थी इस भरम में नए ज़माने, पुराने हो गए चाँद ने हटा दी घटा जो ओढ़ रखी थी आँखों के आगे अनदेखे ख़ज़ाने हो गए सबको मिली शोहरत उसकी पाक निगाहों से क़त्ल होकर मशहूर सब निशाने हो गए उसने बेदख़ल कर दिया मुझे पलकों से दीवार-ओ-दहलीज़ मेरे ठिकाने हो गए एक शमा ने बिखेरी जलवों की सी रौशनी जलने को तैयार कई परवाने हो गए तेरी ज़ुल्फ़ों की वो तासीर, लबों का ज़ायका जाइज़ा तेरे बदन का सब ज़माने हो गए

Ghazal (✓) दिल पर हमारे ज़ख़्म इक

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दिल पर हमारे ज़ख़्म इक गहरा बना दिया, शहर-ए-वफ़ा जला के सहरा बना दिया। देखा जो उस तरफ़ तो जन्नत नज़र आई, मेरी हँसी पे उसने पहरा लगा दिया। ​परवाज़ जिसकी अर्श की हदों को छूती थी, सैयाद की निगाह ने पिंजरे में ला दिया। ​दुनिया को वो गिनाता रहा मेरी ख़ामियाँ, उल्फ़त में जिसके सामने सर को झुका दिया। ​उसकी नज़र से ही तबीयत में थी बहार, फेरी नज़र तो दिल को वीराना बना दिया। ​घबरा के रात ख़्वाब से हम यूँ ही जग गए, इक संग-दिल ने जान पे सदमा लगा दिया। ​सबको लगा कि मुझपे है साये का बद-असर, हम प्यार में थे पागल कि ख़ुद को भुला दिया। ​सोचा न था इस मोड़ से गुज़रेंगे हम 'सत्यं', हँसते हुए इंसान को मुर्दा बना दिया। ​आया न लब पे नाम कभी मेरे इश्क़ का, साहिल पे ख़ुद खड़ा रहा, मुझको डुबा दिया। 221 / 2121 / 1221 / 212 ​

उद्धरण (quotation)

आत्म-संयम हेतु बुद्ध की शिक्षाएं ली है तो आत्म-सम्मान हेतु युद्ध की शिक्षाएं भी ली है मन विजय हेतु बुद्ध की शिक्षाएं ली है और  जन विजय हेतु युद्ध की शिक्षाएं ली है 

Ghazal (✓) अलग सोच ज़माने की

अलग सोच ज़माने की बना लेनी चाहिए, उठे जो भी सदाएँ, वो दबा देनी चाहिए। ज़रूरी नहीं शमशीर क़त्ल को ही उठे, दहशतगर्दी को भी लहरा देनी चाहिए। अँधेरों से जो लड़ते हैं, वही लाते हैं सहर, सदा सबको मिलकर उठा देनी चाहिए। फ़क़त बातें नहीं, हौसला भी चाहिए, अमल की राह आसान बना देनी चाहिए। मुहब्बत के चराग़ों से सजे हर एक दिल, ये नफ़रत की हवाएँ बुझा देनी चाहिए। ग़रीबों की दुआएँ ही ख़ज़ाना हैं असल, लागत चाहे जो भी हो उठा लेनी चाहिए। सत्यं इस दौर में इंसानियत की ख़ातिर, कलम को आज तलवार बना देनी चाहिए।

Ghazal (मुकम्मल) एक ही शख़्स से वो इश्क़

किसी इक शख़्स से ही इश्क़ वो दोबारा होना यानी ख़सारे में ही इक और ख़सारा होना ​उसे बस एक ही बार देखा था आधी रात में फिर न मुमकिन हुआ जन्नत का नज़ारा होना ​रंगत-ए-रुख़्सार देती है पयाम-ए-उल्फ़त बज़्म में मुमकिन कहाँ तुमको इशारा होना ​दिल में उसके भी मोहब्बत थी ये जाना मैंने पर उसे मंज़ूर न था सिर्फ़ हमारा होना ​तेज़ लहरों की तरह वो तो निकल जाती है और मेरी चाहतें दरिया से किनारा होना ​थक गया हूँ मैं बहुत हिज्र की राहों में अब अब क़यामत है यहाँ तन्हा गुज़ारा होना ​बेरुख़ी ने तेरी ग़ैरों का किया है मुझको मुश्किल है अब जान मेरी फिर तुम्हारा होना

Sher (मुकम्मल) नई शायरी

मुद्दतों में आज जो देखा है आईना मैंने लोग तो बदल गए, ख़ुद को वही पाया मैंने वो हो रहे हैं बेरुख मुझसे जाने क्यों, जिन्हें करीब से देखने की तमन्ना है। लिखो हम पे कोई दीवान लिखो ​हम एक काग़ज़ पे नहीं आने वाले तलाश उसकी है जो बस मेरा हो जाए, नसीब ऐसा कोई शख़्स मुझको न हुआ। देख लो हमारे सब्र की ज़रा ये इंतहा, हमने ज़िंदगी गुज़ार दी हमसफ़र के बग़ैर। सज्दे की हक़ीक़त न जिन्हें मालूम, वह लगे हैं बेईमानों को ख़ुदा बनाने में। कब तक मुझे इन बंदिशों की हयात में जीना होगा, किस फ़र्ज़ से ग़ैरत के नाम जहन्नुम में जीना होगा।

रिश्तेदारी और मां-बाप शाइरी

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जिनके हाथ तजुर्बों से भरे होते हैं, ज़िंदगी के खेल में माहिर बड़े होते हैं। साथ रखना तुम हमेशा बुज़ुर्गों को अपने, बला खौफ खाती है गर ताबीज़ बँधे होते हैं बदनसीबी ने ख़ाक कर दिया था मुझे वो ख़िज़ाँ की आँच अब भी याद थी मुझे बढ़ता रहा मैं राह-ए-कामयाबी माँ की दुआओं का ही असर था मुझे अपने आज सब सरफरोशी हो गए सारे मिरे अरमां इक खमोशी हो गए रिश्ते लहू के पूछता अब कोई नहीं मौसी बुआ चाचा, पड़ोसी हो गए कुछ इस क़दर हमने चिराग़ों को तालीम दी घर जल गए दुश्मन के, इल्ज़ाम हवा पर गया अपने माँ-बाप को हर सूरत ख़ुश रखा कर ऐसा न हो फ़र्ज़ की बद्दुआ लग जाए तुझे मेरे दिल से उठती है यही सदा बार बार गर है पिता सलामत, चाहत नहीं खुदा की मेरे अपने मेरी उम्र को छिपाते रहे बड़ों की नज़र में छोटे बच्चे ही होते हैं

Ghazal (मुकम्मल) मौसम फिर से सुहाना हो गया है

मौसम फिर से सुहाना हो गया है किसी पर दिल दीवाना हो गया है उसकी गली से गुज़रे थे हम इक दिन अब उसी से आना-जाना हो गया है दो घड़ी उसकी निगाहों में जो देखा दिल हमारा उसका निशाना हो गया है जब भी मिलने की करूँ बात उससे टालते-टालते ज़माना हो गया है ग़ैर से मिलने में है वो बे-तकल्लुफ़ मुझको मिलना भी बहाना हो गया है अब तू इज़हार करे या फिर इनकार तेरा दिल में ठिकाना हो गया है लोगों से छुप-छुप के तुझे देखता हूँ इश्क़ मेरा अब बहुत पुराना हो गया

Ghazal (मुकम्मल) मेरी तबीयत में बरकत हो गई है

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मेरी तबीयत में बरकत हो गई है चुनाँचे सबको वहशत हो गई है मेरी तारीफ़ से ख़ुद-मंसूब मसीहा को मेरे रुतबे से ही दिक़्क़त हो गई है वो जो करता था मोहब्बत से किनारा उसी शख़्स को पाने की हसरत हो गई है वफ़ा करके भी जो सहते रहे जुदाई उन्हीं जैसी अब मेरी क़िस्मत हो गई है जो कल तक था सभी का ही चहीता उसी को आज ख़ुद से नफ़रत हो गई है तलाशा हमने सुकून-ए-दिल बहुत ही प्यारी तेरे लबों की लज़्ज़त हो गई है क्या करूँ मैं तेरी कम-सिन जवानी का मुझ पे अब ख़ुदा की रहमत हो गई है अमीर-ए-शहर को सौंप दी सब विरासत वतन की बदतर हालत क़ुदरत हो गई है दैर-ओ-हरम में ढूँढते हैं हम ख़ुदाओं को मगर इंसाँ को इंसाँ से नफ़रत हो गई है

एक रोमांचक कहानी

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एक बार एक बच्चा मुझसे कोई कहानी सुनाने की ज़िद कर बैठा और ​दोस्तों वह कहानी कुछ इस प्रकार थी! यह उस समय की बात थी, जब बहुत काली रात थी। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी, पत्ता-पत्ता ठंड के कारण ठिठुर रहा था। मैं अपनी सेना की टुकड़ी के साथ जंगल में था, तब मुझको एक संदेश मिला कि दुश्मनों ने घेर लिया है तुमको, वे हमारी सीमाओं की ओर आगे बढ़ रहे हैं। मैंने जैसे ही संदेश सुना, मेरा शरीर काँप उठा। मैंने झट से अपने सैनिकों को तैयार किया और फिर एक छोटी पहाड़ी से हमला बोल दिया। चारों तरफ गोलियाँ चलने लगीं, मानो ठंडी रात में कोई भयानक तूफ़ान आ गया। हमारे सारे दुश्मन मारे गए। हमने चैन की साँस ली। हम जंगल में आगे बढ़ ही रहे थे कि दुश्मनों के टैंक नज़र आती है। मेरे सिपाही बहादुरी से लड़े, लेकिन सभी मारे जाते हैं। मैंने बड़ी बहादुरी से दुश्मन के टैंक्स को एक-एक कर नष्ट कर दिया। मैं बहुत थक चुका था। जंगल में शेर-भालू का भी डर था। थोड़ी दूरी पर मुझे पानी नज़र आया। मैंने अपनी बंदूक फेंकी और पानी पीने को आगे बढ़ा। मैंने जैसे ही झील की तरफ हाथ बढ़ाया और अंजलि भर पानी मुँह के पास लाया, अचानक एक भयानक-सा चेहरा मेरे ...

Sher 8 (मुकम्मल)

अपने कमरे में मैंने रूठा हुआ आईना देखा अक़्स अपना देख कर सोचा यह किसको देखा देख कर साज़िश मेरे जिस्म‑ओ‑मिज़ाज की होंठ तो चुप ही रहे, आँखों को गवारा न हुआ क्या सुनाएँ तुमको दास्तान-ए-दिल   हम तो जीते जा रहे हैं ख़्वाहिशों के सहारे इश्क़, प्यार, मोहब्बत, उल्फत, प्रेम सब में आधा हरफ़ है फिर मैं कैसे उम्मीद करूँ उससे मुकम्मल मोहब्बत की। एक परिंदा हूँ, मुझे आज़ाद ही रहने दो ज़ुल्फ़-ओ-दामन से मेरा वास्ता ही क्या मैं तपती ज़मीं हूँ, तू बादल है जानाँ   तू आए तो बरसे, मेरी प्यास बुझ जाए किसी से मिलना कभी इत्तेफ़ाक़ होता नहीं वही होता है जो ख़ुदा ने लिखा होता है