Ghazal 4 (मुकम्मल) अलग सोच ज़माने की
अलग सोच ज़माने की बना लेनी चाहिए,
उठे जो भी सदाएँ, वो दबा देनी चाहिए।
ज़रूरी नहीं शमशीर क़त्ल को ही उठे,
दहशतगर्दी को भी लहरा देनी चाहिए।
अँधेरों से जो लड़ते हैं, वही लाते हैं सहर,
सदा सबको मिलकर उठा देनी चाहिए।
फ़क़त बातें नहीं, हौसला भी चाहिए,
अमल की राह आसान बना देनी चाहिए।
मुहब्बत के चराग़ों से सजे हर एक दिल,
ये नफ़रत की हवाएँ बुझा देनी चाहिए।
जो सच की खोज में हैं, उन्हें आवाज़ दें हम,
उन्हें इंसाफ़ की मंज़िल दिखा देनी चाहिए।
ग़रीबों की दुआएँ ही ख़ज़ाना हैं असल,
लागत चाहे जो भी हो उठा लेनी चाहिए।
सत्यं इस दौर में इंसानियत की ख़ातिर,
कलम को आज तलवार बना देनी चाहिए।
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