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शेर (4 line)

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वो मेरी हद-ए-तसव्वुर से गुज़रता क्यों नहीं नशा उसके अन्दाज़ का उतरता क्यों नहीं मैं हैरान हूँ ये सोचकर उसके बारे में ढलता है वक़्त, हुस्न उसका ढलता क्यों नहीं उजाले कफ़न ओढ़कर सोने लगे सहारे सिरों को झुका रोने लगे जहाँ देखो हर तरफ मातम है छाया फ़रिश्ते ख़ुदा की मौत पर रोने लगे अलग सोच ज़माने की बना लेनी चाहिए, उठे जो भी सदाएँ, वो दबा देनी चाहिए। ज़रूरी नहीं शमशीर क़त्ल को ही उठे, दहशतगर्दी को भी लहरा देनी चाहिए। मेरे दिल में वो शम्अ-ए-मुहब्बत जलाता रहा मेरे जुनून पर कामयाबी का रास्ता बनाता रहा जिसे लेकर गया था मैं एक रोज़ बुलंदी पर वही अपनी नज़र से मुझे गिराता रहा ख़ामोशियाँ सुनो तो सुनाई देती हैं ख़्वाहिशें आँखों में दिखाई देती हैं तुम मानो या न मानो कोई बात नहीं तेरी आवाज़ मोहब्बत की गवाही देती है एक ज़माना लगा मुझे, तेरी मोहब्बत कमाने में वक़्त नहीं लगता था मुझे वक़्त गवाने में तेरी सारी तस्वीरें जला डाली मैंने एक-एक कर बाख़ुदा हाथ कांपने लगे, आख़िरी तस्वीर जलाने में मेरे मुंह से जो निकले हर बात दुआ हो जाए सज़ा ऐसी मिले उसे, वो रिहा हो जाए वो लोग जो समझते हैं, उनका ही दिल धड़कता ह...

Sher (मुकम्मल)

तुझे अपने दिल में बसा रखा है, खज़ाना जहाँ से छुपा रखा है। ​ज़माना खड़ा है खिलाफ़ अब मेरे, मगर हाथ तुझसे मिला रखा है। सबके हिस्से हिस्से-दारी होनी चाहिए सबकी चादर-ओ-दीवारी होनी चाहिए बर्तन खाली चूल्हा ठंडा ही सही आँखों में 'सत्यं' ख़ुद्दारी होनी चाहिए ज़ख़्म मेरे अब मुस्कुराने लगे वो हमें और भी आज़माने लगे ​सजाए उसने फूल अपने बालों में भँवरे आगे-पीछे गुनगुनाने लगे बदन में मचलती हरारत सी है, तेरे वास्ते ये बशारत सी है। इजाज़त हो बाहों में भर लूँ तुझे, कि जागी तबीयत में शरारत सी है। यूँ आसाँ नहीं होता, सच-झूठ समझ पाना कई नक़ाब पड़े हैं, एक चेहरे पे आजकल नादानी में जो लोग क़दम उठा लेते हैं। पहचान की ख़ातिर पहचान गवाँ देते हैं, ​ तू भी छोड़ देना मुझे एक ज़माने के बाद, उतर जाएगा नशा मेरा आज़माने के बाद। चाहता हूँ ख़ुद से ही अब मैं रिहाई पाना, छीन ली है एक शख़्स ने आज़ादी मेरी। संभाला है ख़ुद को हमने क्या क्या देखकर किया नहीं गुनाह कोई ख़ुद को तन्हा देखकर हज़ार ग़म हैं और एक मुसीबत भी तो है, जिसको चाहूं मैं, वही दूर चला जाता है। क्यों लगाएं मैंने ये ख़्वाहिशों के मेले, मालूम था जब ख़...

Sher | दीवान ए सत्यं | Diwan E Satyam | Anil Satyam

मेरे दुश्मन ही नहीं एक, मुझको ग़म देते हैं अब तो इनमें सितमग़र तेरा नाम भी आने लगा कभी सिगरेट कभी शराब हर रोज़ नए तज़ुर्बें करता हूं तेरे ग़म में सितमगर अपने रुतबे से भी गिर गया मैं मैं भी ख़्वाहिशों के शहर में, तू भी ख़्वाहिशों के शहर में घर अपना बनाने चले हैं, इस तपती हुई दोपहर में

Sher | 4 लाइन शायरी

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ए ख़ुदा ये हसरत मेरी साकार तू कर दे उसके दिल में मेरी तड़प का एहसास तू कर दे जल उठे उसका दिल भी याद में मेरी इस कदर कोई करामात तू कर दे ए इलाही मुझपे इतना तो करम कर ना दे सज़ा बेजुर्म बेबस पे रहम कर फक़त प्यार में डूबा हूं है कोई गुनाह नहीं है नाम तेरा ही दूजा इतनी तो शरम कर थामा है मेरा हाथ तो छोड़ ना देना रास्ता दिखा के प्यार का मुंह मोड़ना लेना तुम्हें देखता हूं मैं जिसमें सुबह-शाम मेरे विश्वास के आईने को तोड़ ना देना हर तरफ फिज़ा में तेरा नाम लिखा है मेरे लिए मोहब्बत का पैगाम लिखा है मिटा ना देना ये गुज़ारिश है ए दोस्त मैंने दिल के हर कोने में तेरा नाम लिखा है एक रोज़ मेरी ज़िंदगी में वो भी शरीक थी वो चाहत बनके मेरे दिल के करीब थी मैं समझा था मोहब्बत में मिलेंगे हसीन पल नज़दीक से देखा तो जुदाई नसीब थी मैं ज़िंदगी में थक के चूर हो गया हूं हालात के हाथों मजबूर हो गया हूं इक ख्वाहिश थी तेरे नज़दीक आने की पर किस्मत से बहुत दूर हो गया हूं क्या पाते हो मुझको सताकर क्या मिलता है तुम्हें यूं दूर जाकर एहसास होगा दिल में लग जाएगी जिस दिन कैसा लगता है किसी के दिल को दुखाकर वो मेरे वज़ूद को बनात...

Sher 10 (मुकम्मल)

कई दर्द से रोज़ उभरती हूँ मैं, कई आँखों से छुप निकलती हूँ मैं। जियूँ अपने ही तौर से, आरज़ू थी, ना-मर्ज़ी मगर राह बदलती हूँ मैं। मैं सितारों से सरगोशी करता हूं, जुगनुओं को रातभर खलता हूं। न देखो मुझे इतना गौर से यार मैं आंखों पर असर करता हूं। उसके सच झूठ में बदलने लगे, सोचते ही आँसू निकलने लगे। वो बेवफ़ा करता था वफ़ा की बात, आज सोचा तो दम ही निकलने लगे। तबीयत मचल रही तो इज़हार कर, चारासाज़ी छोड़, किसी से प्यार कर। उससे इश्क़ है तो छुपाना कैसा, पर्दा गुनाहों पे रख, इबादत पे नहीं। प्यार की बस यही एक शर्त होनी चाहिए इंसाँ को इंसाँ की पहचान होनी चाहिए यह बात जुदा है, वो अब नहीं आएँगे, पर दिल की इल्तिजा है, थोड़ा इंतज़ार कर।

Sher 4 (मुकम्मल)

​मैं अपने चेहरे पर सदा मुस्कान रखता हूँ अंदर से टूटा हूँ मगर दुश्मन परेशान रखता हूँ कैसी तौबा कैसा सज़्दा बेगुनाह के लिए सब बे-ईमानी है यारों एक तन्हा के लिए ​​​वो बेरुख़ ही हो जाते हैं मुझको देखकर, मैं बेख़ुद ही हो जाता हूँ जिनको देखकर। आज जाने गरज़ कैसी निकाल आई आसमां इक जमीं पर पिघलने लगा दर्दे-इश्क़ में मैं बद-हवास तो नहीं ला-इलाज हूं कुई बदज़ात तो नहीं यूं ही नइं कोई किनारा करता है इकला बाज़ अक्सर बुलंदी छूता है पैग़ाम यूं आया ख़ुदा का इश्क़ कर ले 'सत्यं' अब क्या खता मेरी बता दिल तुझपे आया मेरा

Sher (शरारत)

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अपनी ख़्वाहिशों को यूं ना आज़माया कर कभी भीगने का मन हो तो भीग जाया कर तेरे बदन की शायरी में तमाम हरूफ बड़े कटीले हैं मैं शायर बड़ा गठीला हूं इज़ाज़्त दो कुछ अपना लिखूं हमें यूं लगा कि मोहब्बत का जमाना है फरवरी रोज़ ले लिया उसने पर रोज़ देने से मना कर दिया इन दिनों ही तो हम कुछ जुदा-जुदा से रहने लगे एक ज़माने में हमने फूलों की बहोत इज्जत की अब मैं अपने होठों को प्यासा नहीं रखता कई सहराओं से गुज़रा हूं दरिया तक आने में तेरे बदन पे जहाँ तिल है जानेमन, वहीं मेरा दिल है बेशक तू किसी से भी प्यार कर पर मुझे उस चीज से मत इनकार कर ता-उम्र साथ देना ना देना तो तेरी मर्जी है पर जरूरत के वक्त तो मत इनकार कर यह आलम शहनाई का होता तो अच्छा होता हिसाब जज़्बातों की भरपाई का होता तो अच्छा होता कमबख्त कंबल की आग भी अब बुझने लगी इस सर्दी इंतजाम रजाई का होता तो अच्छा होता ये सर्द रातें गरमा जाए तो क्या हो तन्हाई मेरी महक जाए तो क्या हो मैं तसव्वर में पढ़ रहा हूं हर-रात जिसे वही किताब हकीकत बन जाए तो क्या हो यही कमबख्त महीना था फरवरी इन्हीं दिनों छोड़ गई थी मुझे वो **मरी