Sher (मुकम्मल) एक कलाम सत्यं के नाम
यह मंज़र भी किसी दिन मैं दिखाऊँगा उसे किसी जाँबाज़ से रू-ब-रू कराऊँगा उसे छुपा रक्खा है इक इक्का अभी आस्तीन में ज़रूरत आ पडी तो खेल जाऊँगा उसे ख़ुदग़र्ज़ हैं वो लोग जो एहसान भूल गए लड़ा था जिनके वास्ते, वो इंसान भूल गए आँधियों से ये कहो कि अपनी हद में ही रहें शराफ़त हमनें क्या दिखाई, औक़ात भूल गए। दुश्मन को नज़र-ए-इनायत देते हैं हम ग़लती पे उसकी पर्दा गिरा देते हैं हम मिला न सकेगा वो नज़रें कभी हमसे नज़रों में उसकी उसे गिरा देते हैं हम न पूछो मेरी दास्तां-ए-ग़म मुझसे मैं यूँ अश्क सबके गिराना नहीं चाहता लाख महफ़िल हो, हमें मतलब नहीं 'सत्यं' कोई तो अपनी नज़र के मयार का मिले। ----------------------------------------------- कभी बे-बात सुनना, कभी छुप कर रोना इतना आसान नहीं है, सत्यं होना दुश्मन को भी मोहब्बत की सज़ा देते हैं हम नज़र में उसकी अपनी दीद शर्मिंदगी बना देते हैं हम जिनका दिल है घर मेरा, वो दिल के अंदर हैं अभी और बहुत हैं चाहत, ऐसे दीवानों के पैदाइशी शौक़ है ख़तरों से खेलना होते रहे सामना, सो मोहब्बत कर ली इन दिनों गर्दिश में हैं सितारे अपने वरगना एहसान बाँटे हैं ...