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Sher (मुकम्मल)

तुझे अपने दिल में बसा रखा है, खज़ाना जहाँ से छुपा रखा है। ​ज़माना खड़ा है खिलाफ़ अब मेरे, मगर हाथ तुझसे मिला रखा है। सबके हिस्से हिस्से-दारी होनी चाहिए सबकी चादर-ओ-दीवारी होनी चाहिए बर्तन खाली चूल्हा ठंडा ही सही आँखों में 'सत्यं' ख़ुद्दारी होनी चाहिए ज़ख़्म मेरे अब मुस्कुराने लगे वो हमें और भी आज़माने लगे ​सजाए उसने फूल अपने बालों में भँवरे आगे-पीछे गुनगुनाने लगे --------------------------​

Sher (मुकम्मल)

नादानी में जो लोग क़दम उठा लेते हैं। पहचान की ख़ातिर पहचान गवाँ देते हैं, ​तू भी छोड़ देना मुझे एक ज़माने के बाद, उतर जाएगा नशा मेरा आज़माने के बाद।

नशा | Nasha | शराब और आंखें

दर्द-ए-दिल अब मैं सुनाने से रहा अश्क आँखों के दिखाने से रहा ​होगी बरकत पैमाने में कभी जूठे प्याले मुँह लगाने से रहा तुम बैठी रहो मेरी नज़रों के सामने, आज अपना मन है मदहोश हो जाने का। मय पी कर सँभलते ही नहीं जज़्बात मेरे, होश में रहता हूँ तो ख़ामोश ही रहता हूँ। ******************* या तो आंखों में उतर जा या जाम में उतार दें मेरी फ़ितरत है, मैं दो नशे एक साथ नहीं करता शराब पी है लेकिन, बहुत होश में हूं तू नज़र हटा नज़र से बहकने का डर है मयखाना बंद है, उसका घर भी दूर है आज रात याद उसकी, मुझे क़त्ल करके छोड़ेगी तमाम कोशिशें बेकार ही, रही संभल पाने की जब डूब गए हम, तेरी आंखों की गहराई में तेरी आंखें नहीं तो क्या छलकता जाम पीते हैं अब कोई तो सहारा हो जीये जाने के लिए मत फूंक मय से, अपना जिग़र ,सत्यं, बेख़ुद ही होना है तो इश्क़ में जला इस तुम ये कैसे सियासती लफ़्ज़ों में बात करती हो शराब छोड़ने को कहती हो और पास भी आती नहीं के शराब जो हराम थी, हलाल हो गई इजहारे-मोहब्बत होश में ना हुआ बेखुदी में कर दिया पिया करते थे कभी एक जाम से अब तलब बढ़ चुकी, दो आंखें चाहिये हाथ में शराब है आगोश में हो तुम अब फ...

Ghazal (मुकम्मल) दिल पर हमारे ज़ख़्म इक

दिल पर हमारे ज़ख़्म इक गहरा बना दिया, शहर-ए-वफ़ा जला के सहरा बना दिया। देखा जो उस तरफ़ तो जन्नत नज़र आई, मेरी हँसी पे उसने पहरा लगा दिया। ​परवाज़ जिसकी अर्श की हदों को छूती थी, सैयाद की निगाह ने पिंजरे में ला दिया। ​दुनिया को वो गिनाता रहा मेरी ख़ामियाँ, उल्फ़त में जिसके सामने सर को झुका दिया। ​उसकी नज़र से ही तबीयत में थी बहार, फेरी नज़र तो दिल को वीराना बना दिया। ​घबरा के रात ख़्वाब से हम यूँ ही जग गए, इक संग-दिल ने जान पे सदमा लगा दिया। ​सबको लगा कि मुझपे है साये का बद-असर, हम प्यार में थे पागल कि ख़ुद को भुला दिया। ​सोचा न था इस मोड़ से गुज़रेंगे हम 'सत्यं', हँसते हुए इंसान को मुर्दा बना दिया। ​आया न लब पे नाम कभी मेरे इश्क़ का, साहिल पे ख़ुद खड़ा रहा, मुझको डुबा दिया। 221 / 2121 / 1221 / 212 ​

Sher (मुकम्मल) एक कलाम सत्यं के नाम

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यह मंज़र भी किसी दिन मैं दिखाऊँगा उसे किसी जाँबाज़ से रू-ब-रू कराऊँगा उसे ​छुपा रक्खा है इक इक्का अभी आस्तीन में ज़रूरत आ पडी तो खेल जाऊँगा उसे ख़ुदग़र्ज़ हैं वो लोग जो एहसान भूल गए लड़ा था जिनके वास्ते, वो इंसान भूल गए आँधियों से ये कहो कि अपनी हद में ही रहें शराफ़त हमनें क्या दिखाई, औक़ात भूल गए। दुश्मन को नज़र-ए-इनायत देते हैं हम ग़लती पे उसकी पर्दा गिरा देते हैं हम मिला न सकेगा वो नज़रें कभी हमसे नज़रों में उसकी उसे गिरा देते हैं हम सितारे गर्दिशों में हैं हमारे इन दिनों वरना, लुटाएं हैं बड़े एहसाँ यहाँ ख़ैरात की सूरत। रहा है शौक़ ही ख़तरों से खेलना, होते रहे सामना, सो मोहब्बत कर ली। कभी बे-बात सुनना, कभी छुप कर रोना इतना आसान नहीं है, 'सत्यं' होना हुनर चेहरे को पढ़ने का क्या ही खूब आया है, उजाले में छुपी हर सूरत को पहचानता हूँ मैं। रौनक़ न देखिए मिरी सूरत की ऐ जनाब, ग़म को छुपाने का मिरा, अंदाज़ है यह। मैंने क़सम उठाई थी गुनाह न करने की मालूम न था लोग मोहब्बत को जुर्म समझते हैं मारा हुआ मैं अपनी ही क़िस्मत का हूँ 'सत्यं', वरना जो ख़ुशनसीब हैं, वो उनके क़रीब ...

Nazm (आज़ाद) मुस्कुराहट पे मेरी पहरा बैठा दिया

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बैठा हुआ था सुकूँ से इक साए तले मैं, किसी ने जला दिया घरौंदा, सहरा बना दिया। कभी उस तरफ़ जो देखा तो जन्नत नज़र आई, किसी ने मेरी मुस्कुराहट पर पहरा लगा दिया। अर्श की बुलंदी पे था इक तेज़-परवाज़ कभी, एक सैय्याद की निगाहों ने पिंजरे में ला दिया। पीठ पीछे वो मेरी ख़ामियाँ गिनता रहा, मोहब्बत में जिसके आगे सिर अपना झुका दिया। उसकी नज़र से, मेरी तबीयत में बहार रहती थी फैर ली आंखें उधर, इधर वीराना बना दिया हम घबराकर ख़्वाब से आधी रात में जगते हैं एक सगंदिल ने, जां पे मेरी सदमा लगा दिया ख़्वाब अच्छे देखने का तो मुझको भी हक़ है फिर क्यों मेरे जज़्बात को उसने दबा दिया सबको लगा मुझपे किसी साए का असर है, उसके प्यार में पागल थे, ख़ुद को भुला दिया। सोचा न था इस मोड़ से भी गुज़रेंगे हम, सत्यं, हँसते हुए इक इंसान को मुर्दा बना दिया। कभी नाम भी न आता था मेरे लब पे मोहब्बत का, वो ख़ुद साहिल पे खड़ा रहा, मुझको डुबा दिया।

उद्धरण (quotation)

आत्म-संयम हेतु बुद्ध की शिक्षाएं ली है तो आत्म-सम्मान हेतु युद्ध की शिक्षाएं भी ली है मन विजय हेतु बुद्ध की शिक्षाएं ली है और  जन विजय हेतु युद्ध की शिक्षाएं ली है