Sher 6 (मुकम्मल)
शायद मिरी चाहत मिरे जानिब खड़ी है सच बोला था नज़मी ने वो मग़रूर बड़ी होगी देखो बेमिस्ल फ़ैसला ये ख़ुदाई का तोड़ते-तोड़ते मुझे वो ख़ुदा टूट गया मालूम है दिल की दहलीज़ उन्हें मगर ज़िद पे अड़े हैं कोई अब उनको पुकार ले उसने जब अपनी चाहत का इज़हार कर दिया अधूरी मेरी ग़ज़ल थी मुकम्मल हो गई मैं मुसाफ़िर हूँ तेरी रज़ा की किश्ती का चाहे साहिल पे ले चल चाहे डुबो दे मुझे एक मुद्दत से मैं ख़ामोश चला आता हूँ सोचा कह दूँ हाल-ए-दिल तड़पना ठीक नहीं गुज़रा है बदलते हुए हालात का हर मंज़र एक बस तेरी याद के मौसम के सिवा लिख दी है तब्दीलियाँ हर दौर ने हर शै पे एक बस तेरी याद के मौसम के सिवा उसे भूल जाने की करामात हो जाए बग़ैर इल्ज़ाम के ये सारी बात हो जाए