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Sher (मुकम्मल) एक कलाम सत्यं के नाम

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यह मंज़र भी किसी दिन मैं दिखाऊँगा उसे किसी जाँबाज़ से रू-ब-रू कराऊँगा उसे ​छुपा रक्खा है इक इक्का अभी आस्तीन में ज़रूरत आ पडी तो खेल जाऊँगा उसे ख़ुदग़र्ज़ हैं वो लोग जो एहसान भूल गए लड़ा था जिनके वास्ते, वो इंसान भूल गए आँधियों से ये कहो कि अपनी हद में ही रहें शराफ़त हमनें क्या दिखाई, औक़ात भूल गए। दुश्मन को नज़र-ए-इनायत देते हैं हम ग़लती पे उसकी पर्दा गिरा देते हैं हम मिला न सकेगा वो नज़रें कभी हमसे नज़रों में उसकी उसे गिरा देते हैं हम ​न पूछो मेरी दास्तां-ए-ग़म मुझसे मैं यूँ अश्क सबके गिराना नहीं चाहता लाख महफ़िल हो, हमें मतलब नहीं 'सत्यं' कोई तो अपनी नज़र के मयार का मिले। कभी बे-बात सुनना, कभी छुप कर रोना इतना आसान नहीं है, 'सत्यं' होना ​ मैं जिनके दिल में हूँ वो मेरे दिल में है, अभी कतार में वाक़िफ़ कई दीवाने हैं। सितारे गर्दिशों में हैं हमारे इन दिनों वरना, लुटाएं हैं बड़े एहसाँ यहाँ ख़ैरात की सूरत। रहा है शौक़ ही ख़तरों से खेलना, होते रहे सामना, सो मोहब्बत कर ली। ----------------------------------------------- मुक़द्दर ही मेरा ख़राब है शायद वरगना ख़ुशनसीब ह...

नज़्म/Nazm (आज़ाद) मुस्कुराहट पे मेरी पहरा बैठा दिया

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बैठा हुआ था सुकूँ से इक साए तले मैं, किसी ने जला दिया घरौंदा, सहरा बना दिया। कभी उस तरफ़ जो देखा तो जन्नत नज़र आई, किसी ने मेरी मुस्कुराहट पर पहरा लगा दिया। अर्श की बुलंदी पे था इक तेज़-परवाज़ कभी, एक सैय्याद की निगाहों ने पिंजरे में ला दिया। पीठ पीछे वो मेरी ख़ामियाँ गिनता रहा, मोहब्बत में जिसके आगे सिर अपना झुका दिया। उसकी नज़र से, मेरी तबीयत में बहार रहती थी फैर ली आंखें उधर, इधर वीराना बना दिया हम घबराकर ख़्वाब से आधी रात में जगते हैं एक सगंदिल ने, जां पे मेरी सदमा लगा दिया ख़्वाब अच्छे देखने का तो मुझको भी हक़ है फिर क्यों मेरे जज़्बात को उसने दबा दिया सबको लगा मुझपे किसी साए का असर है, उसके प्यार में पागल थे, ख़ुद को भुला दिया। सोचा न था इस मोड़ से भी गुज़रेंगे हम, सत्यं, हँसते हुए इक इंसान को मुर्दा बना दिया। कभी नाम भी न आता था मेरे लब पे मोहब्बत का, वो ख़ुद साहिल पे खड़ा रहा, मुझको डुबा दिया।

उद्धरण (quotation)

आत्म-संयम हेतु बुद्ध की शिक्षाएं ली है तो आत्म-सम्मान हेतु युद्ध की शिक्षाएं भी ली है मन विजय हेतु बुद्ध की शिक्षाएं ली है और  जन विजय हेतु युद्ध की शिक्षाएं ली है 

धीरे धीरे

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राहे-उल्फ़त में क़दम ना ज़ल्दबाज़ी में बढ़ा तुम चाहोगे निकालना तो फंस जाओगे धीरे-धीरे इश्क़ है यह जनाब शराब की क्या बिसात चढ़ गया है नशा तो अब उतरेगा धीरे-धीरे इत्तेदा ए ज़िंदगी में आते हैं उतार-चढ़ाव बहुत तपिश में तजुर्बे की जल संभल जाओगे धीरे-धीरे दबाई गई है कईं आवाज़ें मज़हब की आड़ में कईं औरत उठाने लगी है सिर अपना धीरे-धीरे खूबसूरती देखने वाले की नज़र में होती है सत्यं ये बात समझनी चाहिए हर नाज़नीं को धीरे-धीरे हमने अभी सपने बोएं है जिंदगी नइ बोई कोई मिल जाए हमसफ़र तो बसा लेंगे घर धीरे-धीरे मेरे जेहन पे छाया है खुमार तेरी मुहब्बत का काश! तू भी तड़प उठे मेरी मुहब्बत को धीरे-धीरे

Ghazal (मुकम्मल) अलग सोच ज़माने की

अलग सोच ज़माने की बना लेनी चाहिए, उठे जो भी सदाएँ, वो दबा देनी चाहिए। ज़रूरी नहीं शमशीर क़त्ल को ही उठे, दहशतगर्दी को भी लहरा देनी चाहिए। अँधेरों से जो लड़ते हैं, वही लाते हैं सहर, सदा सबको मिलकर उठा देनी चाहिए। फ़क़त बातें नहीं, हौसला भी चाहिए, अमल की राह आसान बना देनी चाहिए। मुहब्बत के चराग़ों से सजे हर एक दिल, ये नफ़रत की हवाएँ बुझा देनी चाहिए। ग़रीबों की दुआएँ ही ख़ज़ाना हैं असल, लागत चाहे जो भी हो उठा लेनी चाहिए। सत्यं इस दौर में इंसानियत की ख़ातिर, कलम को आज तलवार बना देनी चाहिए।

Ghazal (मुकम्मल) एक ही शख़्स से वो इश्क़

एक ही शख़्स से वो इश्क़ दोबारा होना यानी ख़सारे में फिर एक ख़सारा होना ​एक ही बार उसे देखा था आधी रात में फिर न मुमकिन हुआ जन्नत का नज़ारा होना ​रंगत-ए-रुख़्सार देती है पयाम-ए-उल्फ़त बज़्म में मुमकिन कहाँ तुमको इशारा होना ​दिल में उसके भी मोहब्बत थी ये जाना मैंने पर उसे मंज़ूर न था सिर्फ़ हमारा होना ​तेज़ लहरों की तरह वो तो निकल जाती है मेरी ख़्वाहिश दरिया से किनारा होना ​थक गया हूँ मैं बहुत हिज्र की राहों में अब अब क़यामत है अकेले ही गुज़ारा होना ​बेरुख़ी ने तेरी ग़ैरों का किया है मुझको मुश्किल है अब जान मेरी फिर तुम्हारा होना

Sher 8 (मुकम्मल) नई शायरी

मुद्दतों में आज जो देखा है आईना मैंने लोग तो बदल गए, ख़ुद को वही पाया मैंने वह हो रहे हैं बेरुख मुझसे जाने क्यों, जिन्हें करीब से देखने की तमन्ना है। लिखो हम पे कोई दीवान लिखो ​हम एक काग़ज़ पे नहीं आने वाले तलाश उसकी है जो बस मेरा हो जाए, नसीब ऐसा कोई शख़्स मुझको न हुआ। मेरी खुददारी ने मुझको हाथ फैलाने न दिया, मेरे मेयार पे झुक गए कई खुददार सिर। मुझे अब भी किसी से इश्क़ है पर, कोई हम सा हमें अपना न मिला। उठाते हैं जल्दबाज़ी में वो ऐसे कदम 'सत्यम' पहचान बनाने के चक्कर में पहचान गवाँ देते हैं देख लो हमारे सब्र की ज़रा ये इंतहा, हमने ज़िंदगी गुज़ार दी हमसफ़र के बग़ैर।