Ghazal (मुकम्मल) एक ही शख़्स से वो इश्क़
एक ही शख़्स से वो इश्क़ दोबारा होना यानी ख़सारे में फिर एक ख़सारा होना एक ही बार उसे देखा था आधी रात में फिर न मुमकिन हुआ जन्नत का नज़ारा होना रंगत-ए-रुख़्सार देती है पयाम-ए-उल्फ़त बज़्म में मुमकिन कहाँ तुमको इशारा होना दिल में उसके भी मोहब्बत थी ये जाना मैंने पर उसे मंज़ूर न था सिर्फ़ हमारा होना तेज़ लहरों की तरह वो तो निकल जाती है मेरी ख़्वाहिश दरिया से किनारा होना थक गया हूँ मैं बहुत हिज्र की राहों में अब अब क़यामत है अकेले ही गुज़ारा होना बेरुख़ी ने तेरी ग़ैरों का किया है मुझको मुश्किल है अब जान मेरी फिर तुम्हारा होना