Sher (मुकम्मल)
वो बेरुख़ ही हो जाते हैं मुझको देखकर, मैं बेख़ुद ही हो जाता हूँ जिनको देखकर। कुछ लोग जो दिल में आते नहीं हैं, कुछ लोग जो दिल से जाते नहीं हैं। जिसने मेरी आँखों से आँसू उतारे हैं मैं भी अपनी नज़र से उतार दूँगा उसे मैं अपने चेहरे पर सदा मुस्कान रखता हूँ अंदर से टूटा हूँ मगर दुश्मन परेशान रखता हूँ मैं समझता था वो समझता है मुझे, कौन खुदगर्ज भला समझता है मुझे। कैसी तौबा कैसा सज़्दा बेगुनाह के लिए सब बे-ईमानी है यारों एक तन्हा के लिए आज जाने गरज़ कैसी निकाल आई आसमां इक जमीं पर पिघलने लगा दर्दे-इश्क़ में मैं बद-हवास तो नहीं ला-इलाज हूं कुई बदज़ात तो नहीं यूं ही नइं कोई किनारा करता है इकला बाज़ अक्सर बुलंदी छूता है पैग़ाम यूं आया ख़ुदा का इश्क़ कर ले 'सत्यं' अब क्या खता मेरी बता दिल तुझपे आया मेरा क्या सुनाएँ तुमको दास्तान-ए-दिल लो अब शराफ़त छोड़ दी मैंने, तुम यारो अपनी हदें पहचानो। तबीयत मचल रही तो इज़हार कर, चारासाज़ी छोड़, किसी से प्यार कर। उससे इश्क़ है तो छुपाना कैसा, पर्दा गुनाहों पे रख, इबादत पे नहीं। प्यार की बस यही एक शर्त होनी चाहिए इंसाँ को इंसाँ की पहचान होनी चाहिए यह ब...