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Sher | बेवफाई, दर्द| Bewafai ki Dard Bhare Shayari

यह कैसी सज़ा मुझें वो शख़्स दे गया के क़त्ल भी ना किया और ज़िंदा भी ना छोड़ा कैसे निकालू दिल से बता तुझे सनम मैंने तो दर आये को भी गले लगाया है मत पूछ मेरी दास्तां ए ग़म मुझसे मैं बेवज़ह किसी के आंसू गिराना नहीं चाहता इस बार ग़ुनाह हमसे बड़ा संगीन हो गया उस बेवफ़ा पे फिर से हमें यकीन हो गया ग़र होती ख़्वाबों पे हुकूमत अपनी तो हर-शब तेरा दीदार मैं करता कईं मोड़ से गुज़रे राहे उल्फ़त में 'सत्यं' सोचा था मैंने यूं, आसानियां होंगी सुना है बिछुड़कर बढ़ जाती है मोहब्बत और वो तो ग़ैर के हो गए दो पल की जुदाई के बाद इक मुद्दत से ज़ुबां ख़ामोश है मेरी सोचा कह दूं हाले-दिल तड़प अच्छी नहीं होती

Sher (मुकम्मल)

मेरे हुजरे में ना रख सामान मुजरे का काफ़िरों की बस्ती में इक नेक रहने दे वज़ह ऐसी के लबों पर अपने चुप्पी रखता हूं मुझपे यह इल्ज़ाम है मैं हक़ जमाने लगता हूं मेरी नज़रें उसकी ज़ुल्फ़ में उलझ जाती हैं रातों को हम जागते हैं नींद कहाँ आती है इस कैसे मुकाम पर हम आ खड़े हुए तुझे दिल में बसा कर भी तन्हा ही लगते हैं मुश्किल है वफ़ा-ए-गुल की ज़िम्मेदारी खिलता सुबह शब तक मुरझा वो जाता हैं जफ़ा फ़रेब दर्द अश्क़ होंगे महफ़िलों की तरह  रस्ते में इश्क के मिलेंगे संग ए मीलों की तरह

Sher (✓) महिला । औरत

कई दर्द से रोज़ उभरती हूँ मैं, कई आँखों से छुप निकलती हूँ मैं। जियूँ अपने ही तौर से, आरज़ू थी, ना-मर्ज़ी मगर राह बदलती हूँ मैं।

Sher (मुकम्मल) राजनीति

ज़माने की अलग सोच बना देनी चाहिए, उठे जो भी सदाएँ वो दबा देनी चाहिए। ज़रूरी तो नहीं कत्ल को ही शमशीर उठे, दहशतगर्दी को भी लहरा देनी चाहिए। उजाले कफ़न ओढ़कर सोने लगे, सहारे सब सिर को झुका रोने लगे। जहाँ देखिए हर तरफ़ मातम है छाया, फ़रिश्ते ख़ुदा की मौत पर रोने लगे।

बरसों की शनासाई

एक शख़्स की और मेरी  शनासाई है, लड़ाई है दुनिया की ना माने तो वो प्यार भी कर सकता है सुना है वो शख़्स कान का बहुत कच्चा है किसी ग़ैर की बातों पे एतबार भी कर सकता है अपने दिल की बात कहने से पहले कईं दफ़ा सोचो सामने वाला बेफ़िक्री से इंकार भी कर सकता है उससे इश्क में सब कुछ ला-हासिल लगा मुझे काम पे रखने से पहले ख़बरदार भी तो कर सकता है वो रहता है हमेशा दुश्मनों के साथ मिलकर वो चाहे तो मुझे होशियार भी कर सकता है उसी का हाथ है यारों साज़िश-ओ- नवाज़िश में वो साबित मुझे धोखे से गुनहग़ार भी कर सकता है अब यूं ना दिखाओ डर सैलाबों का सरफ़रोशों को जान हथेली पे हो जिसकी दरिया पार भी कर सकता है

Sher (मुकम्मल)

वो बेरुख़ ही हो जाते हैं मुझको देखकर, मैं बेख़ुद ही हो जाता हूँ जिनको देखकर। कुछ लोग जो दिल में आते नहीं हैं, कुछ लोग जो दिल से जाते नहीं हैं। जिसने मेरी आँखों से आँसू उतारे हैं मैं भी अपनी नज़र से उतार दूँगा उसे ​मैं अपने चेहरे पर सदा मुस्कान रखता हूँ अंदर से टूटा हूँ मगर दुश्मन परेशान रखता हूँ मैं समझता था वो समझता है मुझे, कौन खुदगर्ज भला समझता है मुझे। कैसी तौबा कैसा सज़्दा बेगुनाह के लिए सब बे-ईमानी है यारों एक तन्हा के लिए आज जाने गरज़ कैसी निकाल आई आसमां इक जमीं पर पिघलने लगा दर्दे-इश्क़ में मैं बद-हवास तो नहीं ला-इलाज हूं कुई बदज़ात तो नहीं यूं ही नइं कोई किनारा करता है इकला बाज़ अक्सर बुलंदी छूता है पैग़ाम यूं आया ख़ुदा का इश्क़ कर ले 'सत्यं' अब क्या खता मेरी बता दिल तुझपे आया मेरा ​लो अब शराफ़त छोड़ दी मैंने, तुम यारो अपनी हदें पहचानो। तबीयत मचल रही तो इज़हार कर, चारासाज़ी छोड़, किसी से प्यार कर। उससे इश्क़ है तो छुपाना कैसा, पर्दा गुनाहों पे रख, इबादत पे नहीं। प्यार की बस यही एक शर्त होनी चाहिए इंसाँ को इंसाँ की पहचान होनी चाहिए यह बात जुदा है, वो अब नहीं आएँगे, पर दि...

Ghazal (✓) अब और क्या बाकी रहा कमाने में

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उलझ कर शाम वो मेरी, ढली है एक ज़माने में, भटकते ही रहे हम तो, इसी शहर-ए-पुराने में। ​मुक़द्दर से मिला जो भी, उसे हँस कर क़ुबूल तू कर गँवा मत ज़ीस्त को अपनी, यूँ नादाँ आज़माने में। ​सजाया शौक़ से हमने भी इक उतरन को बदन पर, ज़माना ढूँढता है अब सुकून बस नए-पुराने में। ​सिरहाने थे जो मेरे दो चराग़ाँ कर रहे उजाला, अँधेरे कामयाब आख़िर हुए हैं मुझे रुलाने में। गुनाहगारों से अब जो है भरा यह शहर सारा ही, लगा है हर कोई बस दूसरों की कमी गिनाने में। ​यह सिलसिला पुराना है, कोई आज की बात नहीं, है आफ़ताब से ही रोशन महताब हर ज़माने में। नशा है साहिबे मसनद पे यूँ झूठी हवाओं का, नादान लगे हैं यहाँ, मुरझाए गुल खिलाने में। ​मुक़द्दर भी संवारें उनके और सबको साथ रक्खा, बता अब और क्या बाक़ी रहा सत्यम कमाने में