धीरे धीरे
राहे-उल्फ़त में क़दम ना ज़ल्दबाज़ी में बढ़ा तुम चाहोगे निकालना तो फंस जाओगे धीरे-धीरे इश्क़ है यह जनाब शराब की क्या बिसात चढ़ गया है नशा तो अब उतरेगा धीरे-धीरे इत्तेदा ए ज़िंदगी में आते हैं उतार-चढ़ाव बहुत तपिश में तजुर्बे की जल संभल जाओगे धीरे-धीरे दबाई गई है कईं आवाज़ें मज़हब की आड़ में कईं औरत उठाने लगी है सिर अपना धीरे-धीरे खूबसूरती देखने वाले की नज़र में होती है सत्यं ये बात समझनी चाहिए हर नाज़नीं को धीरे-धीरे हमने अभी सपने बोएं है जिंदगी नइ बोई कोई मिल जाए हमसफ़र तो बसा लेंगे घर धीरे-धीरे मेरे जेहन पे छाया है खुमार तेरी मुहब्बत का काश! तू भी तड़प उठे मेरी मुहब्बत को धीरे-धीरे