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ख़ुदा | Khuda | Shayari

क्या खूब बख़्शी है, ए ख़ुदा ख़्यालों की नेमत तूने हर कोई जिसे चाहे मोहब्बत कर सकता है यह पैग़ाम आया ख़ुदा का मुहब्बत कर ले 'सत्यं' अब क्या कुसूर मेरा जो दिल उन पे आ गया पूछता जो ख़ुदा, तेरी रिज़ा क्या है तो सबसे पहले तेरा नाम मैं लेता तू दे सज़ा उनको या ख़ुदा ऐसी के प्यार उनका भी किसी बेखुद पर आए चल ले चल हाथ पकड़ कर, मुझको दर ख़ुदा के क़ाफ़िर था मैं, जो बेखुदी में सजदा उसे किया एक रोज़ उसे मांगेंगे, दुआ कर ख़ुदा से फ़िलहाल लुत्फ़ उठा रहा हूं, इंतज़ार का कोई ऐसी करामात ख़ुदा, उसे भूल जाने की कर के याद भी ना रहू और इल्ज़ाम भी ना सिर हो कुछ इस कदर खोया हूं, तेरी उल्फ़त में सितमग़र कोई कर रहा तहे-दिल से ख़ुदा की इबादत जैसे तुम सजदा करो उसे लिहाज़ ना हो ग़र ये मुमकिन है फिर कैसे किसी बुत को तुम ख़ुदा बनाते हो? ख़ुदा की रहमत है रुसवाई मेरे मुक़द्दर में वरना मासूम कोई सितमगर नहीं होता जो वक़्त हमने तेरी चाहत में गंवाया इबादत में लगाते तो ख़ुदा मिल जाता कह दे ख़ुदा उनसे चले आए मुझसे मिलने आंखे झपकती है मेरी कहीं देर ना हो हर कोई रखता है ख़्वाहिश इक बार उनको देखकर ख़ुदा करे बार-बार अब उनकी दीद हो

Sher (✓) बेवफाई, दर्द| Bewafai ki Dard Bhare Shayari

यह कैसी सजा मुझे वो शख्स दे गया, न तो क़त्ल किया उसने न ज़िंदा छोड़ा। ना पूछ मेरी दास्तान-ए-ग़म तू मुझसे, आंसू तुम्हारे बे-वजह मैं गिराना नहीं चाहता। हमसे यही गुनाह फिर संगीन हो गया, उस बेवफ़ा पे हमको फिर यक़ीन हो गया ​गर होती यारों ख़्वाबों पे हुकूमत अपनी हर-शब जानां मैं तेरा दीदार करता मेरे हुजरे में ना ला सामान मुजरे का, काफ़िरों की बस्ती में इक नेक रहने दे। वज़ह ऐसी कि लबों पर अपने चुप्पी रखता हूँ, मुझ पे इल्ज़ाम है कि मैं अब हक़ जताने लगता हूँ।

Sher (मुकम्मल)

मेरी नज़रें उसकी ज़ुल्फ़ में उलझ जाती हैं रातों को हम जागते हैं नींद कहाँ आती है इस कैसे मुकाम पर हम आ खड़े हुए तुझे दिल में बसा कर भी तन्हा ही लगते हैं जफ़ा, धोखे, फ़रेब-ओ-दर्द होंगे महफ़िलों जैसे, मिलेंगे राह-ए-उल्फ़त में ये बिखरे संग-ए-मीलों जैसे। मुश्किल है वफ़ा-ए-गुल की ज़िम्मेदारी खिलता सुबह शब तक मुरझा वो जाता हैं सुना है बिछुड़कर बढ़ जाती है मोहब्बत और वो तो ग़ैर के हो गए दो पल की जुदाई के बाद

Sher (✓) महिला । औरत

कई दर्द से रोज़ उभरती हूँ मैं, कई आँखों से छुप निकलती हूँ मैं। जियूँ अपने ही तौर से, आरज़ू थी, ना-मर्ज़ी मगर राह बदलती हूँ मैं।

Sher (मुकम्मल) राजनीति

ज़माने की अलग सोच बना देनी चाहिए, उठे जो भी सदाएँ वो दबा देनी चाहिए। ज़रूरी तो नहीं कत्ल को ही शमशीर उठे, दहशतगर्दी को भी लहरा देनी चाहिए। उजाले कफ़न ओढ़कर सोने लगे, सहारे सब सिर को झुका रोने लगे। जहाँ देखिए हर तरफ़ मातम है छाया, फ़रिश्ते ख़ुदा की मौत पर रोने लगे।

बरसों की शनासाई

एक शख़्स की और मेरी  शनासाई है, लड़ाई है दुनिया की ना माने तो वो प्यार भी कर सकता है सुना है वो शख़्स कान का बहुत कच्चा है किसी ग़ैर की बातों पे एतबार भी कर सकता है अपने दिल की बात कहने से पहले कईं दफ़ा सोचो सामने वाला बेफ़िक्री से इंकार भी कर सकता है उससे इश्क में सब कुछ ला-हासिल लगा मुझे काम पे रखने से पहले ख़बरदार भी तो कर सकता है वो रहता है हमेशा दुश्मनों के साथ मिलकर वो चाहे तो मुझे होशियार भी कर सकता है उसी का हाथ है यारों साज़िश-ओ- नवाज़िश में वो साबित मुझे धोखे से गुनहग़ार भी कर सकता है अब यूं ना दिखाओ डर सैलाबों का सरफ़रोशों को जान हथेली पे हो जिसकी दरिया पार भी कर सकता है

Sher (मुकम्मल)

वो बेरुख़ ही हो जाते हैं मुझको देखकर, मैं बेख़ुद ही हो जाता हूँ जिनको देखकर। कुछ लोग जो दिल में आते नहीं हैं, कुछ लोग जो दिल से जाते नहीं हैं। जिसने मेरी आँखों से आँसू उतारे हैं मैं भी अपनी नज़र से उतार दूँगा उसे ​मैं अपने चेहरे पर सदा मुस्कान रखता हूँ अंदर से टूटा हूँ मगर दुश्मन परेशान रखता हूँ मैं समझता था वो समझता है मुझे, कौन खुदगर्ज भला समझता है मुझे। कैसी तौबा कैसा सज़्दा बेगुनाह के लिए सब बे-ईमानी है यारों एक तन्हा के लिए आज जाने गरज़ कैसी निकाल आई आसमां इक जमीं पर पिघलने लगा दर्दे-इश्क़ में मैं बद-हवास तो नहीं ला-इलाज हूं कुई बदज़ात तो नहीं यूं ही नइं कोई किनारा करता है इकला बाज़ अक्सर बुलंदी छूता है पैग़ाम यूं आया ख़ुदा का इश्क़ कर ले 'सत्यं' अब क्या खता मेरी बता दिल तुझपे आया मेरा ​लो अब शराफ़त छोड़ दी मैंने, तुम यारो अपनी हदें पहचानो। तबीयत मचल रही तो इज़हार कर, चारासाज़ी छोड़, किसी से प्यार कर। उससे इश्क़ है तो छुपाना कैसा, पर्दा गुनाहों पे रख, इबादत पे नहीं। प्यार की बस यही एक शर्त होनी चाहिए इंसाँ को इंसाँ की पहचान होनी चाहिए यह बात जुदा है, वो अब नहीं आएँगे, पर दि...