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हम क्या उम्मीद करें?

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मेरे कांधे पे किसी मेहरबां ने हाथ तक ना रखा सरगोशी करें आगोश में कोई, हम क्या उम्मीद करें ख़्वाब उसने भी कोई मेरे नाम का देखा होगा हम यूं ही उसकी चाहत में हर रात नहीं जले ना दिन ढला ना शब गुज़री तन्हाई की कोई आके हमें बता दें हम करें तो क्या करें ये बात हमारी उल्फ़त की सारे जहां को है मालूम दीवारों की साज़िश है हम दोनों को ना पता चले अपनी हिफाज़त का ज़िम्मा अपने हाथ में लो सियासत का एतबार नहीं कब-किस ओर चाल चले जिम्मेदारियों ने मुझको सबसे दूर कर दिया अब तेरी फिक्र करें या मां की फिक्र करें एक उम्र गुज़ारी मुफलिसी की, जलाया लहू अपना हम यूं ही एक रात में तो शायर नहीं बने जब तक है तू सामने दो बात हंस के कर  क्या पता कल एक-दूसरे से हम मिले ना मिले

Ghazal (मुकम्मल) एक ही शख़्स से वो इश्क़

एक ही शख़्स से वो इश्क़ दोबारा होना यानी ख़सारे में फिर एक ख़सारा होना ​एक ही बार उसे देखा था आधी रात में फिर न मुमकिन हुआ जन्नत का नज़ारा होना ​रंगत-ए-रुख़्सार देती है पयाम-ए-उल्फ़त बज़्म में मुमकिन कहाँ तुमको इशारा होना ​दिल में उसके भी मोहब्बत थी ये जाना मैंने पर उसे मंज़ूर न था सिर्फ़ हमारा होना ​तेज़ लहरों की तरह वो तो निकल जाती है मेरी ख़्वाहिश दरिया से किनारा होना ​थक गया हूँ मैं बहुत हिज्र की राहों में अब अब क़यामत है अकेले ही गुज़ारा होना ​बेरुख़ी ने तेरी ग़ैरों का किया है मुझको मुश्किल है अब जान मेरी फिर तुम्हारा होना

नई शायरी | New Shayari

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मैंने मुद्दतों में आज आईना देखा लोग बदल गए मैं वैसा ही हूं, इतना देखा मुझे आज भी किसी-किसी से इश्क हो जाता है वो एक मुझे ही इश्क करने वाला ना मिला बादलों से कहदो उसके घर जाके बरसे के याद हमारी भी उस बेख़बर को  आए कुछ लोग जल्दबाजी में ऐसे कदम उठा लेते हैं पहचान बनाने के चक्कर में पहचान गवां देते हैं आफ़ताब अब उसके दरवाज़े की हिफ़ाज़त करता है चांद घटा से निकले भी तो निकले कैसे? सुना है के प्यार आंखों में दिखाई देता है पर कैसे साबित करूं सच्चा है या झूठा है लिखो हम पे कोई दीवान लिखो ​हम एक काग़ज़ पे नहीं आने वाले

बहका-बहका मौसम

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अपनी ख़्वाहिशों को यूं ना आज़माया कर कभी भीगने का मन हो तो भीग जाया कर तेरे बदन की शायरी में तमाम हरूफ बड़े कटीले हैं मैं शायर बड़ा गठीला हूं इज़ाज़्त दो कुछ अपना लिखूं हमें यूं लगा कि मोहब्बत का जमाना है फरवरी रोज़ ले लिया उसने पर रोज़ देने से मना कर दिया इन दिनों ही तो हम कुछ जुदा-जुदा से रहने लगे एक ज़माने में हमने फूलों की बहोत इज्जत की अब मैं अपने होठों को प्यासा नहीं रखता कई सहराओं से गुज़रा हूं दरिया तक आने में तेरे बदन पे जहाँ तिल है जानेमन, वहीं मेरा दिल है बेशक तू किसी से भी प्यार कर पर मुझे उस चीज से मत इनकार कर ता-उम्र साथ देना ना देना तो तेरी मर्जी है पर जरूरत के वक्त तो मत इनकार कर यह आलम शहनाई का होता तो अच्छा होता हिसाब जज़्बातों की भरपाई का होता तो अच्छा होता कमबख्त कंबल की आग भी अब बुझने लगी इस सर्दी इंतजाम रजाई का होता तो अच्छा होता ये सर्द रातें गरमा जाए तो क्या हो तन्हाई मेरी महक जाए तो क्या हो मैं तसव्वर में पढ़ रहा हूं हर-रात जिसे वही किताब हकीकत बन जाए तो क्या हो यही कमबख्त महीना था फरवरी इन्हीं दिनों छोड़ गई थी मुझे वो **मरी

रिश्तेदारी और मां-बाप शाइरी

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जिनके हाथ तजुर्बों से भरे होते हैं, ज़िंदगी के खेल में माहिर बड़े होते हैं। साथ रखना तुम हमेशा बुज़ुर्गों को अपने, बला खौफ खाती है गर ताबीज़ बँधे होते हैं बदनसीबी ने ख़ाक कर दिया था मुझे वो ख़िज़ाँ की आँच अब भी याद थी मुझे बढ़ता रहा मैं राह-ए-कामयाबी माँ की दुआओं का ही असर था मुझे कुछ इस क़दर हमने चिराग़ों को तालीम दी घर जल गए दुश्मन के, इल्ज़ाम हवा पर गया अपने माँ-बाप को हर सूरत ख़ुश रखा कर ऐसा न हो फ़र्ज़ की बद्दुआ लग जाए तुझे मेरे दिल से उठती है यही सदा बार बार गर है पिता सलामत, चाहत नहीं खुदा की मेरे अपने मेरी उम्र को छिपाते रहे बड़ों की नज़र में छोटे बच्चे ही होते हैं कई दिन से मुझे कोई दर्द नहीं मिला मलाल ये है कि अपनों से दूर हूँ मैं

Ghazal (मुकम्मल) मौसम फिर से सुहाना हो गया है

मौसम फिर से सुहाना हो गया है किसी पर दिल दीवाना हो गया है उसकी गली से गुज़रे थे हम इक दिन अब उसी से आना-जाना हो गया है दो घड़ी उसकी निगाहों में जो देखा दिल हमारा उसका निशाना हो गया है जब भी मिलने की करूँ बात उससे टालते-टालते ज़माना हो गया है ग़ैर से मिलने में है वो बे-तकल्लुफ़ मुझको मिलना भी बहाना हो गया है अब तू इज़हार करे या फिर इनकार तेरा दिल में ठिकाना हो गया है लोगों से छुप-छुप के तुझे देखता हूँ इश्क़ मेरा अब बहुत पुराना हो गया

Ghazal (मुकम्मल) मेरी तबीयत में बरकत हो गई है

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मेरी तबीयत में बरकत हो गई है चुनाँचे सबको वहशत हो गई है मेरी तारीफ़ से ख़ुद-मंसूब मसीहा को मेरे रुतबे से ही दिक़्क़त हो गई है वो जो करता था मोहब्बत से किनारा उसी शख़्स को पाने की हसरत हो गई है वफ़ा करके भी जो सहते रहे जुदाई उन्हीं जैसी अब मेरी क़िस्मत हो गई है जो कल तक था सभी का ही चहीता उसी को आज ख़ुद से नफ़रत हो गई है तलाशा हमने सुकून-ए-दिल बहुत ही प्यारी तेरे लबों की लज़्ज़त हो गई है क्या करूँ मैं तेरी कम-सिन जवानी का मुझ पे अब ख़ुदा की रहमत हो गई है अमीर-ए-शहर को सौंप दी सब विरासत वतन की बदतर हालत क़ुदरत हो गई है दैर-ओ-हरम में ढूँढते हैं हम ख़ुदाओं को मगर इंसाँ को इंसाँ से नफ़रत हो गई है