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Ghazal (मुकम्मल) मौसम फिर से सुहाना हो गया है

मौसम फिर से सुहाना हो गया है किसी पर दिल दीवाना हो गया है उसकी गली से गुज़रे थे हम इक दिन अब उसी से आना-जाना हो गया है दो घड़ी उसकी निगाहों में जो देखा दिल हमारा उसका निशाना हो गया है जब भी मिलने की करूँ बात उससे टालते-टालते ज़माना हो गया है ग़ैर से मिलने में है वो बे-तकल्लुफ़ मुझको मिलना भी बहाना हो गया है अब तू इज़हार करे या फिर इनकार तेरा दिल में ठिकाना हो गया है लोगों से छुप-छुप के तुझे देखता हूँ इश्क़ मेरा अब बहुत पुराना हो गया

Ghazal (मुकम्मल) मेरी तबीयत में बरकत हो गई है

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मेरी तबीयत में बरकत हो गई है चुनाँचे सबको वहशत हो गई है मेरी तारीफ़ से ख़ुद-मंसूब मसीहा को मेरे रुतबे से ही दिक़्क़त हो गई है वो जो करता था मोहब्बत से किनारा उसी शख़्स को पाने की हसरत हो गई है वफ़ा करके भी जो सहते रहे जुदाई उन्हीं जैसी अब मेरी क़िस्मत हो गई है जो कल तक था सभी का ही चहीता उसी को आज ख़ुद से नफ़रत हो गई है तलाशा हमने सुकून-ए-दिल बहुत ही प्यारी तेरे लबों की लज़्ज़त हो गई है क्या करूँ मैं तेरी कम-सिन जवानी का मुझ पे अब ख़ुदा की रहमत हो गई है अमीर-ए-शहर को सौंप दी सब विरासत वतन की बदतर हालत क़ुदरत हो गई है दैर-ओ-हरम में ढूँढते हैं हम ख़ुदाओं को मगर इंसाँ को इंसाँ से नफ़रत हो गई है

एक रोमांचक कहानी

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एक बार एक बच्चा मुझसे कोई कहानी सुनाने की ज़िद कर बैठा और ​दोस्तों वह कहानी कुछ इस प्रकार थी! यह उस समय की बात थी, जब बहुत काली रात थी। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी, पत्ता-पत्ता ठंड के कारण ठिठुर रहा था। मैं अपनी सेना की टुकड़ी के साथ जंगल में था, तब मुझको एक संदेश मिला कि दुश्मनों ने घेर लिया है तुमको, वे हमारी सीमाओं की ओर आगे बढ़ रहे हैं। मैंने जैसे ही संदेश सुना, मेरा शरीर काँप उठा। मैंने झट से अपने सैनिकों को तैयार किया और फिर एक छोटी पहाड़ी से हमला बोल दिया। चारों तरफ गोलियाँ चलने लगीं, मानो ठंडी रात में कोई भयानक तूफ़ान आ गया। हमारे सारे दुश्मन मारे गए। हमने चैन की साँस ली। हम जंगल में आगे बढ़ ही रहे थे कि दुश्मनों के टैंक नज़र आती है। मेरे सिपाही बहादुरी से लड़े, लेकिन सभी मारे जाते हैं। मैंने बड़ी बहादुरी से दुश्मन के टैंक्स को एक-एक कर नष्ट कर दिया। मैं बहुत थक चुका था। जंगल में शेर-भालू का भी डर था। थोड़ी दूरी पर मुझे पानी नज़र आया। मैंने अपनी बंदूक फेंकी और पानी पीने को आगे बढ़ा। मैंने जैसे ही झील की तरफ हाथ बढ़ाया और अंजलि भर पानी मुँह के पास लाया, अचानक एक भयानक-सा चेहरा मेरे ...

Sher 8 (मुकम्मल)

अपने कमरे में मैंने रूठा हुआ आईना देखा अक़्स अपना देख कर सोचा यह किसको देखा देख कर साज़िश मेरे जिस्म‑ओ‑मिज़ाज की होंठ तो चुप ही रहे, आँखों को गवारा न हुआ जिसने मेरी आँखों से आँसू उतारे हैं मैं भी अपनी नज़र से उतार दूँगा उसे क्या सुनाएँ तुमको दास्तान-ए-दिल   हम तो जीते जा रहे हैं ख़्वाहिशों के सहारे इक दरिया को नाज़ था अपनी रवानी पर समंदर से जो मिला, उसका गुमान खो गया इश्क़, प्यार, मोहब्बत, उल्फत, प्रेम सब में आधा हरफ़ है फिर मैं कैसे उम्मीद करूँ उससे मुकम्मल मोहब्बत की। अपने माँ-बाप को हर सूरत ख़ुश रखा कर ऐसा न हो फ़र्ज़ की बद्दुआ लग जाए तुझे एक परिंदा हूँ, मुझे आज़ाद ही रहने दो ज़ुल्फ़-ओ-दामन से मेरा वास्ता ही क्या मैं तपती ज़मीं हूँ, तू बादल है जानाँ   तू आए तो बरसे, मेरी प्यास बुझ जाए किसी से मिलना कभी इत्तेफ़ाक़ होता नहीं वही होता है जो ख़ुदा ने लिखा होता है सबके हिस्से हिस्से-दारी होनी चाहिए सबकी चादरो-दीवारी होनी चाहिए टूटी खाट उधडी ही रजाई क्युं ना हो आंखों में मगर 'सत्यं' ख़ुद्दारी होनी चाहिए

गर्मी पर शायरी

के मौसम गर्मी का बडा ही बे-दर्दी होता है ज़ालिम रज़ाई भी कतराती है नज़दीक आने में

धीरे धीरे

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राहे-उल्फ़त में क़दम ना ज़ल्दबाज़ी में बढ़ा तुम चाहोगे निकालना तो फंस जाओगे धीरे-धीरे इश्क़ है यह जनाब शराब की क्या बिसात चढ़ गया है नशा तो अब उतरेगा धीरे-धीरे इत्तेदा ए ज़िंदगी में आते हैं उतार-चढ़ाव बहुत तपिश में तजुर्बे की जल संभल जाओगे धीरे-धीरे दबाई गई है कईं आवाज़ें मज़हब की आड़ में कईं औरत उठाने लगी है सिर अपना धीरे-धीरे खूबसूरती देखने वाले की नज़र में होती है सत्यं ये बात समझनी चाहिए हर नाज़नीं को धीरे-धीरे हमने अभी सपने बोएं है जिंदगी नइ बोई कोई मिल जाए हमसफ़र तो बसा लेंगे घर धीरे-धीरे मेरे जेहन पे छाया है खुमार तेरी मुहब्बत का काश! तू भी तड़प उठे मेरी मुहब्बत को धीरे-धीरे

बहका-बहका मौसम

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अपनी ख़्वाहिशों को यूं ना आज़माया कर कभी भीगने का मन हो तो भीग जाया कर तेरे बदन की शायरी में तमाम हरूफ बड़े कटीले हैं मैं शायर बड़ा गठीला हूं इज़ाज़्त दो कुछ अपना लिखूं हमें यूं लगा कि मोहब्बत का जमाना है फरवरी रोज़ ले लिया उसने पर रोज़ देने से मना कर दिया इन दिनों ही तो हम कुछ जुदा-जुदा से रहने लगे एक ज़माने में हमने फूलों की बहोत इज्जत की अब मैं अपने होठों को प्यासा नहीं रखता कई सहराओं से गुज़रा हूं दरिया तक आने में तेरे बदन पे जहाँ तिल है जानेमन, वहीं मेरा दिल है बेशक तू किसी से भी प्यार कर पर मुझे उस चीज से मत इनकार कर ता-उम्र साथ देना ना देना तो तेरी मर्जी है पर जरूरत के वक्त तो मत इनकार कर यह आलम शहनाई का होता तो अच्छा होता हिसाब जज़्बातों की भरपाई का होता तो अच्छा होता कमबख्त कंबल की आग भी अब बुझने लगी इस सर्दी इंतजाम रजाई का होता तो अच्छा होता ये सर्द रातें गरमा जाए तो क्या हो तन्हाई मेरी महक जाए तो क्या हो मैं तसव्वर में पढ़ रहा हूं हर-रात जिसे वही किताब हकीकत बन जाए तो क्या हो यही कमबख्त महीना था फरवरी इन्हीं दिनों छोड़ गई थी मुझे वो **मरी