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Sher (मुकम्मल) एक कलाम सत्यं के नाम

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ये मंज़र भी किसी दिन मैं दिखाऊँगा उसे किसी जाँबाज़ से रू-ब-रू कराऊँगा उसे ​अभी तो हुक्म का इक्का छुपा है आस्तीं में ज़रूरत पड़ गई तो फिर खेल जाऊँगा उसे ख़ुदग़र्ज़ हैं वो लोग जो एहसान भूल गए लड़ा था जिनके वास्ते, वो इंसान भूल गए आँधियों से ये कहो कि अपनी हद में ही रहें शराफ़त हमनें क्या दिखाई, औक़ात भूल गए। दुश्मन को भी नज़र-ए-इनायत देते हैं हम गुस्ताख़ी पे उसकी ख़ुद ही पर्दा देते हैं हम शर्मिंदा ही रहेगा जब भी सामना होगा इज़्ज़त उसकी उसी की नज़रों में गिरा देते हैं हम पूछ कर गुज़री वो दास्ताँ, सत्यं इक शायर को रुलाने का ख़याल अच्छा है मैं अब किसी से कोई उम्मीद नहीं रखता मेरे मयार के मुताबिक कोई मेरी नज़र में नहीं जिल्द देखकर भला क्या साबित करोगे तुम बंद किताबों पर कोई फ़ैसला नहीं लिया जाता कभी बे-बात सुनना, कभी छुप कर रोना इतना आसान नहीं है, सत्यं होना दुश्मन को भी मोहब्बत की सज़ा देते हैं हम नज़र में उसकी अपनी दीद शर्मिंदगी बना देते हैं हम जिनका दिल है घर मेरा, वो दिल के अंदर हैं अभी और बहुत हैं चाहत, ऐसे दीवानों के पैदाइशी शौक़ है ख़तरों से खेलना होते रहे सामना, सो मोहब्बत कर ली इ...

उद्धरण (quotation)

आत्म-संयम हेतु बुद्ध की शिक्षाएं ली है तो आत्म-सम्मान हेतु युद्ध की शिक्षाएं भी ली है मन विजय हेतु बुद्ध की शिक्षाएं ली है और  जन विजय हेतु युद्ध की शिक्षाएं ली है 

धीरे धीरे

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राहे-उल्फ़त में क़दम ना ज़ल्दबाज़ी में बढ़ा तुम चाहोगे निकालना तो फंस जाओगे धीरे-धीरे इश्क़ है यह जनाब शराब की क्या बिसात चढ़ गया है नशा तो अब उतरेगा धीरे-धीरे इत्तेदा ए ज़िंदगी में आते हैं उतार-चढ़ाव बहुत तपिश में तजुर्बे की जल संभल जाओगे धीरे-धीरे दबाई गई है कईं आवाज़ें मज़हब की आड़ में कईं औरत उठाने लगी है सिर अपना धीरे-धीरे खूबसूरती देखने वाले की नज़र में होती है सत्यं ये बात समझनी चाहिए हर नाज़नीं को धीरे-धीरे हमने अभी सपने बोएं है जिंदगी नइ बोई कोई मिल जाए हमसफ़र तो बसा लेंगे घर धीरे-धीरे मेरे जेहन पे छाया है खुमार तेरी मुहब्बत का काश! तू भी तड़प उठे मेरी मुहब्बत को धीरे-धीरे

Ghazal (मुकम्मल) अलग सोच ज़माने की

अलग सोच ज़माने की बना लेनी चाहिए, उठे जो भी सदाएँ, वो दबा देनी चाहिए। ज़रूरी नहीं शमशीर क़त्ल को ही उठे, दहशतगर्दी को भी लहरा देनी चाहिए। अँधेरों से जो लड़ते हैं, वही लाते हैं सहर, सदा सबको मिलकर उठा देनी चाहिए। फ़क़त बातें नहीं, हौसला भी चाहिए, अमल की राह आसान बना देनी चाहिए। मुहब्बत के चराग़ों से सजे हर एक दिल, ये नफ़रत की हवाएँ बुझा देनी चाहिए। ग़रीबों की दुआएँ ही ख़ज़ाना हैं असल, लागत चाहे जो भी हो उठा लेनी चाहिए। सत्यं इस दौर में इंसानियत की ख़ातिर, कलम को आज तलवार बना देनी चाहिए।

Ghazal (मुकम्मल) एक ही शख़्स से वो इश्क़

एक ही शख़्स से वो इश्क़ दोबारा होना यानी ख़सारे में फिर एक ख़सारा होना ​एक ही बार उसे देखा था आधी रात में फिर न मुमकिन हुआ जन्नत का नज़ारा होना ​रंगत-ए-रुख़्सार देती है पयाम-ए-उल्फ़त बज़्म में मुमकिन कहाँ तुमको इशारा होना ​दिल में उसके भी मोहब्बत थी ये जाना मैंने पर उसे मंज़ूर न था सिर्फ़ हमारा होना ​तेज़ लहरों की तरह वो तो निकल जाती है मेरी ख़्वाहिश दरिया से किनारा होना ​थक गया हूँ मैं बहुत हिज्र की राहों में अब अब क़यामत है अकेले ही गुज़ारा होना ​बेरुख़ी ने तेरी ग़ैरों का किया है मुझको मुश्किल है अब जान मेरी फिर तुम्हारा होना

Sher 8 (मुकम्मल) नई शायरी

मुद्दतों में आज जो देखा है आईना मैंने लोग तो बदल गए, ख़ुद को वही पाया मैंने वह हो रहे हैं बेरुख मुझसे जाने क्यों, जिन्हें करीब से देखने की तमन्ना है। लिखो हम पे कोई दीवान लिखो ​हम एक काग़ज़ पे नहीं आने वाले तलाश उसकी है जो बस मेरा हो जाए, नसीब ऐसा कोई शख़्स मुझको न हुआ। मेरी खुददारी ने मुझको हाथ फैलाने न दिया, मेरे मेयार पे झुक गए कई खुददार सिर। मुझे अब भी किसी से इश्क़ है पर, कोई हम सा हमें अपना न मिला। उठाते हैं जल्दबाज़ी में वो ऐसे कदम 'सत्यम' पहचान बनाने के चक्कर में पहचान गवाँ देते हैं देख लो हमारे सब्र की ज़रा ये इंतहा, हमने ज़िंदगी गुज़ार दी हमसफ़र के बग़ैर।

बहका-बहका मौसम

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अपनी ख़्वाहिशों को यूं ना आज़माया कर कभी भीगने का मन हो तो भीग जाया कर तेरे बदन की शायरी में तमाम हरूफ बड़े कटीले हैं मैं शायर बड़ा गठीला हूं इज़ाज़्त दो कुछ अपना लिखूं हमें यूं लगा कि मोहब्बत का जमाना है फरवरी रोज़ ले लिया उसने पर रोज़ देने से मना कर दिया इन दिनों ही तो हम कुछ जुदा-जुदा से रहने लगे एक ज़माने में हमने फूलों की बहोत इज्जत की अब मैं अपने होठों को प्यासा नहीं रखता कई सहराओं से गुज़रा हूं दरिया तक आने में तेरे बदन पे जहाँ तिल है जानेमन, वहीं मेरा दिल है बेशक तू किसी से भी प्यार कर पर मुझे उस चीज से मत इनकार कर ता-उम्र साथ देना ना देना तो तेरी मर्जी है पर जरूरत के वक्त तो मत इनकार कर यह आलम शहनाई का होता तो अच्छा होता हिसाब जज़्बातों की भरपाई का होता तो अच्छा होता कमबख्त कंबल की आग भी अब बुझने लगी इस सर्दी इंतजाम रजाई का होता तो अच्छा होता ये सर्द रातें गरमा जाए तो क्या हो तन्हाई मेरी महक जाए तो क्या हो मैं तसव्वर में पढ़ रहा हूं हर-रात जिसे वही किताब हकीकत बन जाए तो क्या हो यही कमबख्त महीना था फरवरी इन्हीं दिनों छोड़ गई थी मुझे वो **मरी