Sher (मुकम्मल) एक कलाम सत्यं के नाम
यह मंज़र भी किसी दिन मैं दिखाऊँगा उसे किसी जाँबाज़ से रू-ब-रू कराऊँगा उसे छुपा रक्खा है इक इक्का अभी आस्तीन में ज़रूरत आ पडी तो खेल जाऊँगा उसे ख़ुदग़र्ज़ हैं वो लोग जो एहसान भूल गए लड़ा था जिनके वास्ते, वो इंसान भूल गए आँधियों से ये कहो कि अपनी हद में ही रहें शराफ़त हमनें क्या दिखाई, औक़ात भूल गए। दुश्मन को नज़र-ए-इनायत देते हैं हम ग़लती पे उसकी पर्दा गिरा देते हैं हम मिला न सकेगा वो नज़रें कभी हमसे नज़रों में उसकी उसे गिरा देते हैं हम सितारे गर्दिशों में हैं हमारे इन दिनों वरना, लुटाएं हैं बड़े एहसाँ यहाँ ख़ैरात की सूरत। रहा है शौक़ ही ख़तरों से खेलना, होते रहे सामना, सो मोहब्बत कर ली। कभी बे-बात सुनना, कभी छुप कर रोना इतना आसान नहीं है, 'सत्यं' होना हुनर चेहरे को पढ़ने का क्या ही खूब आया है, उजाले में छुपी हर सूरत को पहचानता हूँ मैं। रौनक़ न देखिए मिरी सूरत की ऐ जनाब, ग़म को छुपाने का मिरा, अंदाज़ है यह। मैंने क़सम उठाई थी गुनाह न करने की मालूम न था लोग मोहब्बत को जुर्म समझते हैं मारा हुआ मैं अपनी ही क़िस्मत का हूँ 'सत्यं', वरना जो ख़ुशनसीब हैं, वो उनके क़रीब ...