शेर (4 line)
वो मेरी हद-ए-तसव्वुर से गुज़रता क्यों नहीं नशा उसके अन्दाज़ का उतरता क्यों नहीं मैं हैरान हूँ ये सोचकर उसके बारे में ढलता है वक़्त, हुस्न उसका ढलता क्यों नहीं उजाले कफ़न ओढ़कर सोने लगे सहारे सिरों को झुका रोने लगे जहाँ देखो हर तरफ मातम है छाया फ़रिश्ते ख़ुदा की मौत पर रोने लगे अलग सोच ज़माने की बना लेनी चाहिए, उठे जो भी सदाएँ, वो दबा देनी चाहिए। ज़रूरी नहीं शमशीर क़त्ल को ही उठे, दहशतगर्दी को भी लहरा देनी चाहिए। मेरे दिल में वो शम्अ-ए-मुहब्बत जलाता रहा मेरे जुनून पर कामयाबी का रास्ता बनाता रहा जिसे लेकर गया था मैं एक रोज़ बुलंदी पर वही अपनी नज़र से मुझे गिराता रहा ख़ामोशियाँ सुनो तो सुनाई देती हैं ख़्वाहिशें आँखों में दिखाई देती हैं तुम मानो या न मानो कोई बात नहीं तेरी आवाज़ मोहब्बत की गवाही देती है एक ज़माना लगा मुझे, तेरी मोहब्बत कमाने में वक़्त नहीं लगता था मुझे वक़्त गवाने में तेरी सारी तस्वीरें जला डाली मैंने एक-एक कर बाख़ुदा हाथ कांपने लगे, आख़िरी तस्वीर जलाने में मेरे मुंह से जो निकले हर बात दुआ हो जाए सज़ा ऐसी मिले उसे, वो रिहा हो जाए वो लोग जो समझते हैं, उनका ही दिल धड़कता ह...