Sher (मुकम्मल)
ज़ख़्म मेरे अब मुस्कुराने लगे वो हमें और भी आज़माने लगे सजाए हैं जो फूल उसने बालों में भँवरे आगे-पीछे गुनगुनाने लगे दर्द-ए-दिल अब मैं सुनाने से रहा अश्क आँखों के दिखाने से रहा होगी बरकत जाम में मेरे कभी जूठे प्याले मुँह लगाने से रहा तुझे अपने दिल में बसा रखा है, खज़ाना जहाँ से छुपा रखा है। ज़माना खड़ा है खिलाफ़ अब मेरे, मगर हाथ तुझसे मिला रखा है। सबके हिस्से हिस्से-दारी होनी चाहिए सबकी चादर-ओ-दीवारी होनी चाहिए बर्तन खाली चूल्हा ठंडा ही सही आँखों में 'सत्यं' ख़ुद्दारी होनी चाहिए --------------------------