नशा | Nasha | शराब और आंखें
दर्द-ए-दिल अब मैं सुनाने से रहा अश्क आँखों के दिखाने से रहा होगी बरकत पैमाने में कभी जूठे प्याले मुँह लगाने से रहा तुम बैठी रहो मेरी नज़रों के सामने, आज अपना मन है मदहोश हो जाने का। मय पी कर सँभलते ही नहीं जज़्बात मेरे, होश में रहता हूँ तो ख़ामोश ही रहता हूँ। शराब पी कर भी जानाँ बहुत होश में हूँ, तू आँखों से ना पिला, बहकने का डर है। बंद है मय-कदा, और दूर उसका घर भी है, याद उसकी आज मुझको क़त्ल कर के छोड़ेगी। हर कोशिश मेरी बेकार रही संभल पाने की, कि हम डूब ही गए तेरी आँखों की गहराई में। तेरी आँखें नहीं तो क्या कोई जाम ही सही, अब सहारा कोई तो हो जिए जाने के लिए। ******************* मत फूंक मय से, अपना जिग़र ,सत्यं, बेख़ुद ही होना है तो इश्क़ में जला इस तुम ये कैसे सियासती लफ़्ज़ों में बात करती हो शराब छोड़ने को कहती हो और पास भी आती नहीं के शराब जो हराम थी, हलाल हो गई इजहारे-मोहब्बत होश में ना हुआ बेखुदी में कर दिया पिया करते थे कभी एक जाम से अब तलब बढ़ चुकी, दो आंखें चाहिये हाथ में शराब है आगोश में हो तुम अब फैसला तुम ही करो मैं कौन सी को छोड़ दूं आँखों में उतर जा मेरी या जाम में उतार मु...