रिश्तेदारी और मां-बाप शाइरी












जिनके हाथ तजुर्बों से भरे होते हैं,
ज़िंदगी के खेल में माहिर बड़े होते हैं।
साथ रखना तुम हमेशा बुज़ुर्गों को अपने,
बला खौफ खाती है गर ताबीज़ बँधे होते हैं

बदनसीबी ने ख़ाक कर दिया था मुझे
वो ख़िज़ाँ की आँच अब भी याद थी मुझे
बढ़ता रहा मैं राह-ए-कामयाबी
माँ की दुआओं का ही असर था मुझे

अपने आज सब सरफरोशी हो गए
सारे मिरे अरमां इक खमोशी हो गए
रिश्ते लहू के पूछता अब कोई नहीं
मौसी बुआ चाचा, पड़ोसी हो गए

कुछ इस क़दर हमने चिराग़ों को तालीम दी
घर जल गए दुश्मन के, इल्ज़ाम हवा पर गया

अपने माँ-बाप को हर सूरत ख़ुश रखा कर
ऐसा न हो फ़र्ज़ की बद्दुआ लग जाए तुझे

मेरे दिल से उठती है यही सदा बार बार
गर है पिता सलामत, चाहत नहीं खुदा की

मेरे अपने मेरी उम्र को छिपाते रहे
बड़ों की नज़र में छोटे बच्चे ही होते हैं

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