Sher (मुकम्मल) नई शायरी

मुद्दतों में आज जो देखा है आईना मैंने
लोग तो बदल गए, ख़ुद को वही पाया मैंने

वो हो रहे हैं बेरुख मुझसे जाने क्यों,
जिन्हें करीब से देखने की तमन्ना है।

लिखो हम पे कोई दीवान लिखो
​हम एक काग़ज़ पे नहीं आने वाले

तलाश उसकी है जो बस मेरा हो जाए,
नसीब ऐसा कोई शख़्स मुझको न हुआ।

देख लो हमारे सब्र की ज़रा ये इंतहा,
हमने ज़िंदगी गुज़ार दी हमसफ़र के बग़ैर।

सज्दे की हक़ीक़त न जिन्हें मालूम,
वह लगे हैं बेईमानों को ख़ुदा बनाने में।

कब तक मुझे इन बंदिशों की हयात में जीना होगा,
किस फ़र्ज़ से ग़ैरत के नाम जहन्नुम में जीना होगा।

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