Sher 8 (मुकम्मल) नई शायरी
मुद्दतों में आज जो देखा है आईना मैंने
लोग तो बदल गए, ख़ुद को वही पाया मैंने
लोग तो बदल गए, ख़ुद को वही पाया मैंने
वह हो रहे हैं बेरुख मुझसे जाने क्यों,
जिन्हें करीब से देखने की तमन्ना है।
लिखो हम पे कोई दीवान लिखो
हम एक काग़ज़ पे नहीं आने वाले
मेरी खुददारी ने मुझको हाथ फैलाने न दिया,
मेरे मेयार पे झुक गए कई खुददार सिर।
मुझे अब भी किसी से इश्क़ है पर,
कोई हम सा हमें अपना न मिला।
उठाते हैं जल्दबाज़ी में वो ऐसे कदम 'सत्यम'
पहचान बनाने के चक्कर में पहचान गवाँ देते हैं
हम एक काग़ज़ पे नहीं आने वाले
तलाश उसकी है जो बस मेरा हो जाए,
नसीब ऐसा कोई शख़्स मुझको न हुआ।
मेरी खुददारी ने मुझको हाथ फैलाने न दिया,
मेरे मेयार पे झुक गए कई खुददार सिर।
मुझे अब भी किसी से इश्क़ है पर,
कोई हम सा हमें अपना न मिला।
उठाते हैं जल्दबाज़ी में वो ऐसे कदम 'सत्यम'
पहचान बनाने के चक्कर में पहचान गवाँ देते हैं
देख लो हमारे सब्र की ज़रा ये इंतहा,
हमने ज़िंदगी गुज़ार दी हमसफ़र के बग़ैर।
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