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शेर । गर्मी

के मौसम गर्मी का बडा ही बे-दर्दी होता है ज़ालिम रज़ाई भी कतराती है नज़दीक आने में

शेर । बाज़

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कल मिरी परवाज़ ऊंचाई छू लेगी आज मैं नाख़ून-ओ-पंख नोच रहा हूं यूं ही नइं कोई किनारा करता है बाज़ इकला ही बुलंदी छूता है चंद कव्वों पे यहां नइं नइं रवानी आयी है बाज़ से टकरा रहे हैं मौत दर तक लायी है हवा चाहे जिधर भी उडे ज़माने की यहां लेकिन रियासत ए फ़लक तो बाज़ के क़दमों में रहती है

Sher | अंबेडकर साहब | Ambedkar Sahab Shayari

जिसका कोई जवाब न हो, ऐसा कोई सवाल मिले, वो राह दिखाती लोगों को, जलती कोई मशाल मिले। मैंने इतिहास के पन्नों को कई बार पलटकर देखा, 'बाबा साहब'-सी दुनिया में दूजी न कोई मिसाल मिले। एक बाग़बाँ सूखे पेड़ों पर लहू की बारिश करता रहा, कतरा-कतरा उम्मीद की क्यारियों में भरता रहा। सूरज भी थक के उठता है रातभर आराम के बाद, वो मसीहा हमारी ख़ातिर दिन-रात एक करता रहा। दिया न ख़ुदा ने जो, एक इंसान दे गया, मुस्कुराहट का अपनी वो बलिदान दे गया। काल को दे दी क़ुर्बानी अपने लाल की, बदले में हमें ख़ुशियों का वरदान दे गया। ख़ुदाओं के शहर में वो ख़ुदा से ज़्यादा दे गया, औरत को, पिछड़ों को जीने का इरादा दे गया। ये ब्रह्मास्त्र भी ऊँच-नीच का कल टूट ही जाएगा, वो जाते-जाते संविधान की मज़बूत ढाल दे गया। वो शख़्स हर शख़्स की तक़दीर हो गया, पढ़-लिखकर इंसाफ़ की शमशीर हो गया। कल्पना में सुनी थी हम ने लक्ष्मण रेखा, बाबा का लिखा पत्थर की लकीर हो गया। गुम अंधेरों में थी गुज़रती ज़िंदगी मेरी, अब सवेरे की राह पर मेरा सफ़र है। खुल गए सब रास्ते जहां में मेरे लिए, ये मेरे बाबा की हिदायत का असर है। एक फ़रिश्ते ने अंधेरों...

Ghazal (मुकम्मल) ता-उम्र जो मिला ज़ख़्म

ता-उम्र जो मिला ज़ख़्म, निशानी की तरह, मैं ख़ून था जो बहा दिया पानी की तरह। मैंने साथ रहने की अपनों से मिन्नतें कीं, वो बात भी करते रहे मेहरबानी की तरह। चाहे जितना भी तुम अहम किरदार बनो, तुम्हें भुला दिया जाएगा कहानी की तरह। मिट्टी को मिलना है इक दिन मिट्टी में, ग़ुरूर भी ढल जाएगा जवानी की तरह। फिर उनसे तर्क-ए-तअल्लुक़ ठीक नहीं, याद रखना है अगर बात पुरानी की तरह। मुझे ठुकरा के ग़ुरबत में गुज़ारा करती है, जो मुझ पे हुकूमत करती थीं रानी की तरह। तू भी दुनिया के रंग मुझको दिखाने लगी, मैं भी छोड़ दूँगा तुझे एक दीवानी की तरह।

Sher | सर्दी पर शायरी | जाडे पे शेर शायरी

इस बार की सर्दी हिज्र में ऐसी कट रही है मैं यहाँ तप रहा जुदा वो वहाँ तप रही है यह आलम शहनाई का होता तो अच्छा होता, हिसाब जज़्बात की भरपाई का होता तो अच्छा होता। कमबख़्त कंबल की आग भी अब तो बुझने लगी है, इस सर्दी इंतज़ाम रज़ाई का होता तो अच्छा होता। कड़ी सर्दी, तेरी फ़िक्र और मेरा दिल टूटना हर मौसम मेरे ख़िलाफ़ है, ख़ुदा ख़ैर करे यूँ तो जायज़ है मेरे जिस्म की ये कंपकंपाहट, ‘सत्यं’, एक तो सर्दी बहुत है और सामने वो भी खड़ी है। अबकी बार मौसम में क्या तब्दीली आई है बाहर सर्दी कड़ाके की, अंदर गरमी छाई है उम्मीद थी कि अगले बरस बना लेगा रज़ाई अपनी, वो शख़्स सर्दी से लड़ा पर महँगाई से मर गया।

Sher | अंबेडकर साहब के परिनिर्वाण पे शायरी | Baba Sahab Ambedkar Ji ki Shayari

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दुनिया में कहीं ऐसा नज़ारा न हुआ, बे-सहारों का कोई सच्चा सहारा न हुआ। बाबा बहुत आए इस ज़माने में मगर, बाबा भीम जैसा कोई दोबारा न हुआ। खुदगर्ज़ बड़े हैं लोग जो एहसान भूल गए, हर क़ौम की खातिर दिया जो बलिदान भूल गए। आँधियों से गुज़ारिश है अपनी हद में ही रहें, बाबा साहब की क्या आँख लगी औक़ात भूल गए वो शख़्स हमें सदियों की मिसाल दे गया, संविधान रचा, समता की मशाल दे गया। नींद से उठा वो फ़रिश्ता तूफ़ान की तरह, और सारी बलाएँ अपने साथ ले गया। मेरी उस निशानी को अपनी जान समझ लेना, हिफ़ाज़त करना उसकी यही ईमान समझ लेना। क्यों रोते हो मेरे बच्चों, मैं गुज़रा नहीं अभी तक, गर संविधान बदले तो मुझे बेजान समझ लेना। दुश्मन की साज़िश को उसने नाकाम कर दिया, जो भी आया पनाह में, उसे माफ़ कर दिया। ना शमशीर उठाई, ना भीम ने खंजर उठाया, बस इल्म की ताकत से हर इंसाफ़ कर दिया। कुछ फ़रिश्ता कहते हैं उनको, कुछ मसीहा कहते हैं, सबका अपना बड़प्पन है, सब बड़प्पन में रहते हैं। छुपकर भी न छुपने वाला वो सूरज एक ऐसा उगा, जिसको अदब से दुनिया वाले ‘बाबा साहब’ कहते हैं। तेरी नापाक साज़िश और इरादे को समझ रखा है, बड़ी ग़लतफ़हमी मे...

Sher 12

उससे इक-तरफ़ा मोहब्बत का सिला यूं मिला यारों, अज़िय्यत, शर्रिय्यत, फ़ज़ीहत मिली और तो कुछ भी नहीं। न शराफ़त उसने छोड़ी, न जिस्म की नुमाइश की, एक दौलतमंद ने हरगिज़ न दौलत की आज़माइश की। उसने मेरी वफ़ा का तमाशा बना दिया, मैं समझा कि मोहब्बत महफ़ूज़ हाथों में है। मालूम है मेरे दिल की दहलीज़ तक उसे, लेकिन अड़े हैं ज़िद पे कि हम पुकार लें उसे। कल जितनी गरमी थी, आज उतनी ही नरमी है, वो दौर बहाव का था, ये दौर ठहराव का है। मेरी ख़ुश्क आँखों ने बदलता दौर देखा है, हमने कुछ और देखा था, तुमने कुछ और देखा है। उफ़! मोहब्बत भी बहुत मजबूरियों का सौदा है, हर सूरत दिल को दिल से बदलना पड़ता है। इस तरह से लोग अपना फ़र्ज़ निभा रहे हैं, बातों से पेट भर रहे हैं, आँसू पिला रहे हैं। हम शायरों को पेड़ गिनना भी जरूरी है  हमारी हदे सिर्फ आम खाने तक तो नहीं जी का क्या है, कहीं भी लगा बैठेंगे हाथ उसने बढ़ाया तो मिला बैठेंगे मुझे यही इक मरज़ लगा रहता है तेरा ख़याल मेरा फ़र्ज़ बना रहता है कर तालीम की तामील में हर शख़्स झुका करे आलम-ए-तमाम क़ायल हो तेरे ख़याल का हम उजालों को बढ़ाते जा रहे हैं अंधेरे सिर को धुनते जा...

Sher 11 ना-खुदाई (मुकम्मल)

बात जब से उस से बनी है, ज़माने से तनातनी है, मैं भी हूँ वफ़ादार उस से, वो भी सनातनी है। ना काफ़िर हूँ, ना जन्नत का त़ालिब हूँ मैं, एक क़लंदर हूँ, अपने दिल का मालिक हूँ मैं

Sher 9 (मुकम्मल)

ग़ज़ल उगती नहीं हरगिज़ बंजर ज़मीन से, यह क़सीदा तजुर्बे के हाथ से बुना जाता है माँगी   जा   रही   है   राय   मेरे   बारे   में , ग़लत   आदमी   मुझे   ग़लत   बता   रहे   हैं । मुफ़लिसी में मोहब्बत का अंजाम यूँ हुआ मैं चलता रहा और  फ़ासले  बढ़ते गए यह फ़र्क तो इंसानी नज़रिये का है सत्यं, वरगना हिदायत-ए-क़ुरआन-ओ-पुराण में ज़रा भी फ़र्क नहीं। बहुत ज़ालिम है दुनिया, ज़रा किनारा करो, खिलते चेहरों से यह हँसी चुरा लेती है। हाँ, ये झूठ है कि मैं तुम पर मरता हूँ, तुम सच को तो सच मानने से रहे। कोई सिमट जाए मेरी सूनी बाहों में, है कोई दुनिया में बदनाम होने वाला? बस यही फ़लसफ़ा सर उठाए हुए हैं हम, मोहब्बत से, ज़माने से शिकस्त खाए हुए हैं हम।

Ghazal (मुकम्मल) इस बहार में नख़रे

इस बहार में नख़रे मुरझाए गुल पे आ गए, हमसे हुई ग़लती कि हम खुल के आ गए। जो उठाए थे सिर पे गुनाहों का बोझ वो, जा मिले हुकूमत से पाक धुल के आ गए। उसके दिल में पले-बड़े ख्व़ाब बग़ावत के, जुबाँ से अल्फ़ाज़ के सहारे घुल के आ गए। एक हुजूम था मगर कोई भी अपना न था, ग़ैर के साथ ग़ैर से ही मिल-जुल के आ गए।

शेर

वो अब सामने से भी गुजरे तो धड़कन तेज़ नहीं होती वरना तस्वीर से भी होती थी घंटो बातें कभी कभी एक आईने को मैंने आईना दिखा दिया सब में नुक्स निकालता फिरता था शौक भुला दिया मैं अपने चेहरे पर खुशी की झलक रखता हूं अंदर से टूटा हूं मगर दुश्मन को परेशां रखता हूं मजबूरियों पे पाबंद हूं और चुप-चुप रहा नहीं जाता फ़र्क इतना है तुम कह देते हो, हमसे कहा नहीं जाता एतबार कर पैग़ाम ए मोहब्बत जिसके हाथों भेजा वो क़ासिद भी कमबख़्त मेरा रक़ीब निकला क्यों लगाये मैंने ख़्वाइशों के मेले मालूम था जब ख़्वाब हक़ीक़त नहीं होतें

Sher | हास्य शेरो-शायरी | Funny and Comedy Sher Shayari

मैं तेरा सिर अपने कांधे पे तो रख लूं पर क्या करूं तेरी ज़ुल्फ़ों में जूं बहुत है यह एहसान कर दे कहना मान ले मेरा कहीं डूब मर जाके, के मुंह दिखे ना दिखे ना तेरा वो एक हंसी ना, दूसरी हंस गई मैं पटा रहा था तीसरी को, चौथी पट गई जिंदा रहते वो इज़हारे-मोहब्बत ना कर सकी अब भूत बनके मेरे पीछे पड़ी है शे'र तो मैं मार दूं, तकरार से डरता हूं कहीं सज़ा ना दे दे मुझको, सरकार से डरता हूं यह सच है दोस्तों ख़ुदा सबसे बड़ा है वरना सिकंदर जैसे शाह बुखार से ना मारे जाते इतना सूख गया हूं तेरी बेवफ़ाई से के बस जी रहा हूं हकीम की दवाई से एक तो वो बदशक्ल है फिर ऊपर से बेअक़्ल है

Diwan E Satyam | Best Shayari ever

मैंने मुद्दतों में आज आईना देखा लोग बदल गए मैं वैसा ही हूं, इतना देखा नज़रे अब भी उसकी तलाश में लगी रहती है मैं लोगों के बीच घिरा रहता हूं, ये राहगीरों पे टिकी रहती है आफताब अब उसके दरवाज़े की हिफ़जत करता है चांद घटा से निकले भी तो निकले कैसे? कुछ लोग जल्दबाजी में ऐसे कदम उठा लेते हैं पहचान बनाने के चक्कर में पहचान गवां देते हैं सुना है के प्यार आंखों में दिखाई देता है पर कैसे साबित करूं सच्चा है या झूठा है हम अपनी नींद से भी समझौता करने लगे इन सोए हुओं को भी जगाना जरूरी है

Best Sher | Diwan E Satyam

मेरे दुश्मन ही नहीं एक मुझको ग़म देते हैं अब तो इनमें सितमग़र तेरा नाम भी आने लगा कभी सिगरेट कभी शराब हर रोज़ नए तज़ुर्बें करता हूं तेरे ग़म में सितमगर अपने रुतबे से भी गिर गया मैं      अपने जज़्बात पे उसूलों सा क़ायम रहा मैं तुम क्या जानो मर-मरके ये रस्म निभाई है ना मदहोशी का ना सरगोशी का मौसम मुझे मिला ये कैसी ग़म की हवा चली हर पल खिज़ा-खिज़ा मिला मैं भी ख़्वाहिशों के शहर में तू भी ख़्वाहिशों के शहर में घर अपना बनाने चले हैं इस तपती हुई दोपहर में ये मेरा बांकपन, शोख़पन, सब कुंवारापन है पर ये शादीशुदा कह रहे हैं आवारापन हैं

Sher | दर्द भरी शायरी | Best Sad Sher ever

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मैंने ज़माने की हर शय को बदलते देखा है इक तेरी याद के मौसम के सिवा क्यों लगाये मैंने ख़्वाहिशों के मेले मालूम था जब ख़्वाब हक़ीक़त नहीं होतें कैसे निकालूं दिल से बता तुझें सनम मैंने तो दर आये को भी गले लगाया है क्या सुनाए तुमको दास्ताने-दिल जीये जा रहे हैं ख़्वाहिशों के सहारे एक रोज़ उन्हें मांगेंगे दुआ कर खुदा से फ़िलहाल लुत्फ़ उठा रहा हूं इंतज़ार का मत मार पत्थर पे अपना सिर सत्यं चोट पहुंचेगी तुझे दर्द होगा बहुत वक़्त गुज़ार लूंगा किसी भी मुकाम पे मग़र होगी बड़ी दिक्कत शाम के ढ़लते

Sher | दीवान ए शायरी | Diwan E Shayari

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तमाम कोशिशें बेकार ही रही संभल पाने की जब डूब गए हम तेरी आंखों की गहराई में अपनी ख़्वाइशों को यूं ना आज़माया कर कभी भीगने का मन हो तो भीख जाया कर कोई पूछ बैठा के ग़ज़ल क्या है? मैंने इशारों में अपने दिल के राज़ खोल दिए पूछता जो ख़ुदा तेरी रज़ा क्या है तो सबसे पहले तेरा नाम मैं लेता तेरे दीदार में कोई बात है, शायद लड़खड़ाता है जिस्म मेरा इज़ाज़त के बिना यह कैसी सज़ा मुझें वो शख़्स दे गया  के क़त्ल भी ना किया और ज़िंदा भी ना छोड़ा कल रात तेरी याद ने कुछ इस कदर सताया के आज सुबह हम देर तक सोए कई रात हमने आंखों में गुज़ार दी के तेरा ख़्याल आए तो दूजा ना हो कोई

ख़ुदा | Khuda | Shayari

क्या खूब बख़्शी है, ए ख़ुदा ख़्यालों की नेमत तूने हर कोई जिसे चाहे मोहब्बत कर सकता है यह पैग़ाम आया ख़ुदा का मुहब्बत कर ले 'सत्यं' अब क्या कुसूर मेरा जो दिल उन पे आ गया पूछता जो ख़ुदा, तेरी रिज़ा क्या है तो सबसे पहले तेरा नाम मैं लेता तू दे सज़ा उनको या ख़ुदा ऐसी के प्यार उनका भी किसी बेखुद पर आए चल ले चल हाथ पकड़ कर, मुझको दर ख़ुदा के क़ाफ़िर था मैं, जो बेखुदी में सजदा उसे किया एक रोज़ उसे मांगेंगे, दुआ कर ख़ुदा से फ़िलहाल लुत्फ़ उठा रहा हूं, इंतज़ार का कोई ऐसी करामात ख़ुदा, उसे भूल जाने की कर के याद भी ना रहू और इल्ज़ाम भी ना सिर हो कुछ इस कदर खोया हूं, तेरी उल्फ़त में सितमग़र कोई कर रहा तहे-दिल से ख़ुदा की इबादत जैसे तुम सजदा करो उसे लिहाज़ ना हो ग़र ये मुमकिन है फिर कैसे किसी बुत को तुम ख़ुदा बनाते हो? ख़ुदा की रहमत है रुसवाई मेरे मुक़द्दर में वरना मासूम कोई सितमगर नहीं होता जो वक़्त हमने तेरी चाहत में गंवाया इबादत में लगाते तो ख़ुदा मिल जाता कह दे ख़ुदा उनसे चले आए मुझसे मिलने आंखे झपकती है मेरी कहीं देर ना हो हर कोई रखता है ख़्वाहिश इक बार उनको देखकर ख़ुदा करे बार-बार अब उनकी दीद हो

Sher | जिंदगी शायरी । Unki Shayari

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हर किसी के रुतबे में थोड़ा फ़र्क होता है कोई उन्नीस होता है, कोई बीस होता है मैंने जलाया है यह चिराग तेरी सलामती के वास्ते तू भी कोई काम ऐसा कर जिससे किसी को दुआ मिले मेरी इन खुश्क आंखों ने एक सदी का दौर देखा है कब्रिस्तान में लेटी लाशों का नज़ारा कुछ और देखा है उम्र-तजुर्बा-बदन नाज़ुक-नाज़ुक तेरा मत खेल पत्थर से चोट पहुंचेगी बहुत तेरी उम्र क्या है, हस्ती क्या है? कुछ नहीं दो पल की ज़िदगी है बस, ख़बर कुछ नहीं अब होगी तेरी रुसवाइयां महफिले-आवाम 'सत्यं' बेखुदी में बढ़कर उनका दामन जो थामा है हमसे ना पूछो इस दौर में कैसी गुजर रही है? जिंदगी बस यूं ही उतार-चढ़ाव में उलझ रही है

Sher | ever (Diwan E Satyam)

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हम बेखुदी में जिसको सज़दा करते रहे कभी ग़ौर से ना देखा पत्थर का बुत है वो तू दे सज़ा उनको  या ख़ुदा ऐसी के प्यार उनका भी  किसी बेख़ुद पर आए शायद आज मेरी दुआ रंग ला रही है मैंने तड़पते देखा है उसे  किसी के प्यार में कह दे ख़ुदा उनसे  चले आए मुझसे मिलने आंखे झपकती है मेरी  कहीं देर ना हो मैंने कसम उठायी थी ना ग़ुनाह करने की मालूम ना था  लोग मोहब्बत को ज़ुर्म समझते हैं कईं मोड़ से गुज़रे  राहे उल्फ़त में  ' सत्यं ' सोचा था मैंने यूं  आसानियां होंगी

Sher | Diwan E Satyam | Best Sher ever | शेर

हम बेखुदी में जिसको सज़दा रहे करते कभी ग़ौर से ना देखा पत्थर का बुत है वो कईं मोड़ से गुज़रे राहे उल्फ़त में 'सत्यं' सोचा था मैंने यूं, आसानियां होंगी ना करते हम इतनी मोहब्बत उनसे मालूम होता ग़र वो मग़रूर हो जाएंगे उन्हें मालूम हो गया हमें सुकून मिलता है तो ज़ालिम हंसी भी अपनी दबाने लगे शायद आज मेरी दुआ रंग ला रही है मैंने तड़पते देखा है उसे किसी के प्यार में मैंने कसम उठायी थी ना ग़ुनाह करने की मालूम ना था लोग मोहब्बत को ज़ुर्म समझते हैं क्या खूब बख़्शी है ए ख़ुदा, ख़्यालों की नेमत तूने हर कोई जिसे चाहे, मोहब्बत कर सकता है

Sher | बेवफाई, दर्द| Bewafai ki Dard Bhare Shayari

यह कैसे मुकाम पे हम आ खड़े हुए तुम्हें दिल में बसाकर भी तन्हा से लगते हैं यह कैसी सज़ा मुझें वो शख़्स दे गया के क़त्ल भी ना किया और ज़िंदा भी ना छोड़ा कैसे निकालू दिल से बता तुझे सनम मैंने तो दर आये को भी गले लगाया है मत पूछ मेरी दास्तां ए ग़म मुझसे मैं बेवज़ह किसी के आंसू गिराना नहीं चाहता इस बार ग़ुनाह हमसे बड़ा संगीन हो गया उस बेवफ़ा पे फिर से हमें यकीन हो गया ग़र होती ख़्वाबों पे हुकूमत अपनी तो हर-शब तेरा दीदार मैं करता कईं मोड़ से गुज़रे राहे उल्फ़त में 'सत्यं' सोचा था मैंने यूं, आसानियां होंगी सुना है बिछुड़कर बढ़ जाती है मोहब्बत और वो तो ग़ैर के हो गए दो पल की जुदाई के बाद इक मुद्दत से ज़ुबां ख़ामोश है मेरी सोचा कह दूं हाले-दिल तड़प अच्छी नहीं होती

Sher | Best Sher ever from Diwan E Satyam

हर कोई रखता है ख़्वाहिश एक बार उनको देखकर के खुदा करे बार-बार अब उनकी दीद हो तमाम कोशिशें बेकार ही रही संभल पाने की जब डूब गए हम तेरी आंखों की गहराई में शायद मेरी हसीना मेरे सामने खड़ी है इक मौलवी ने कहा था वो मगरूर बड़ी होगी मुद्दत हुई उनके पहलू से जुदाई मेरी एक ज़माना था निग़ाह भरकर देखा किए नादां भी बड़ी-बड़ी चीज़ चुरा लेते हैं दिल के साथ-साथ नींद उड़ा लेते है हमने ही ना चाहा हासिल तुझे करना वरना दिल में ठान लेने से क्या कुछ नहीं होता मानकर उसकी बात मैं दूर चला आया पर तजुर्बा नहीं ज़रा ख़्वाहिशों को मिटाने का मेरे दुश्मन ही नहीं एक मुझको ग़म देते हैं अब तो इनमें सितमग़र तेरा नाम भी आने लगा

Sher | शायरी | Sher Shayari | 10 Best Sher ever | शेर

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जिनका दिल है घर मेरा वो दिल के अंदर हैं अभी और बहोत है चाहत ऐसे दीवानों की इक दिल-दरिया को नाज़ था अपनी रवानी पे ठहराव मेरे समंदरे-ग़म देखा, शर्मसार हो चली कोई पूछ बैठा के ग़ज़ल क्या है? मैंने इशारों में अपने दिल के राज़ खोल दिए तेरी उमर क्या है? हस्ती क्या है? कुछ नहीं दो पल की ज़िदगी है बस ख़बर कुछ नहीं मैं एक मुसाफ़िर हूं तेरी रज़ा की किश्ती का चाहे साहिल पे ले चल चाहे डुबा दे मुझें यह पैग़ाम आया ख़ुदा का मुहब्बत कर ले 'सत्यं' अब क्या कुसूर मेरा जो दिल उन पे आ गया एतबार कर पैग़ाम ए मोहब्बत जिसके हाथों भेजा वो क़ासिद भी कमबख़्त मेरा रक़ीब निकला

Sher | Kuchh Dilkash Sher

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मालूम होता ग़र ये खेल लकीरों का तो ज़ख्मी कर हाथों को तेरी तक़दीर लिख लेता पैदाइशी शौक है ख़तरों से खेलना होता रहे सामना सो मोहब्बत कर ली हर रोज़ गुजरे हम मुश्किलों के दौर से इन ख्वाहिशों ने शौक अपना मोहब्बत बना दिया कुछ देर अपने दामन की छांव में ले ले मैं ज़िंदगी के सहरा में भटका हूं बहुत दूर ये ख्वाहिश लिए दिलों पे होगी हुक़ूमत अपनी दौरे-शामत से गुजरे इस कशमकश में घिरकर मैंने चंद रोज़ में देखे हैं कई मोड़ अनजाने गुजरी है ज़िंदगी कई दौर से मेरी खुशनशीब हैं वो जो इसमें सुकूं पाते हैं वरना मोहब्बत को आता नहीं ग़म देने के सिवा

Sher | Diwan E Satyam

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तेरी तस्वीर में और तुझमें इतना ही फ़र्क है तू रूबरू होती है तो दो बात होती हैं तुम सज़दा करो उसे लिहाज़ ना हो ग़र ये मुमकिन है फिर कैसे किसी बुत को तुम खु़दा बनाते हो फट चुका पन्ना ए ऐतबार किताबे-उल्फत से टूट चुकी कलम जो किसी की शान में लिखती थी गुजरा किए हम राह से यह ख़्वाहिश लेकर रोज़ आज तो किसी सूरत उनसे मुलाक़ात होगी कुछ इस क़दर उलझा दराज़ मुसीबत 'सत्यं' के लोग मुझें दीवाना समझ बैठें तुम भी तोड़ दो दिल मेरा जाओ खुश रहो दर्द में ही पला हूं अब एहसास नहीं होता शायद मिल रही है सज़ा मुझे उस कुसूर की तोड़ा था मैंने दिल एक बेबस ग़रीब का  

Sher | शायरी ज़रा हटके | Shayari Zara Hatke

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मैंने हर सहर सैर सहरा-ए-शहर में की ये सोचकर वो इक दिन रू-ब-रू होंगे आंखें आंखों-आंखों में आंखों से मिलने लगी आंखों से शर्माकर आंखें आंखों में झुकने लगी बदले में दिल के हमारा भी दिल गया खोया कुछ नहीं दिल का करार मिल गया के नशा तेरे प्यार के पागलपन का ही था एक सर-बुलंद, परस्तिश में, सरफ़रोश बन गया मेरी ग़ैरत से ना इस कदर उलझा करो तुम जब उतरती है तो लोग नज़र से उतर जाते हैं एक तो ग़मे-आशिक़ी और ये मुफ़लिसी सितम इतना ना जी सकता हूं, ना पी सकता हूं

Diwan E Satyam 10 Best Sher ever | शेर

कोई ऐसी करामात ख़ुदा उसे भूल जाने की कर के याद भी ना रहू और इल्ज़ाम भी ना सर हो जो वक़्त हमने तेरी चाहत में गंवाया इबादत में लगाते तो ख़ुदा मिल जाता मुझे ज़िदगी ने ग़म के सिवा कुछ ना दिया तेरी उल्फ़त भी ज़ालिम कुछ ऐसी ही निकली हम छोड़ आए हैं तेरी याद साहिल पे ग़म के भंवर ने दिल घेरा है जब से पूछकर गुज़री दास्तां 'सत्यं' इक शायर को रुला देने का ख़्याल अच्छा है मालूम था वो मुझको चाहते हैं बेशुमार पर फ़ैसला ना दिल लगाने का कर लिया उसने दुश्मन को भी हम ख़ालिश मोहब्बत सज़ा देते हैं नज़रों में उसकी अपनी दीद शर्मिंदगी बना देते हैं इक रोज़ मुझे ख़्याल आया चल तुझको छोड़ दूं ये सोचकर मैं भी न तुझे ख़ुद में तोड़ दूं क्या करोगे तुम मेरा नाम जानकर बे-आसरा हूं कोई ठिकाना नहीं मेरा एक मुद्दत से ज़ुबां ख़ामोश है मेरी सोचा कह दूं हाल-ए-दिल तड़प अच्छी नहीं होती  

Sher | शायरी जो दिल छू ले | Shayari Jo Dil Chhoo Le

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वो देते हैं नसीहत मोड लो कदम दर्दनांक राहे-उल्फ़त से दलील जाहिर करती हैं तजुर्बा यूं ही नहीं बनता हमने चरागों को तालीम कुछ ऐसी दे रखी थी के घर जल गए दुश्मन के इल्ज़ाम भी हवाओं पे गया देख कर साज़िश मेरे जिस्म और मिज़ाज की होठ चुपचाप सहते रहे आंखों को गवारा ना हुआ रौनक ना देखिए मेरी सूरत की ए जनाब मेरे ग़म को छुपाने का राज़़ है ये मैं अपने चेहरे पर खुशी की झलक रखता हूं अंदर से टूटा हूं मगर दुश्मन को परेशां रखता हूं मत पूछ तू मेरी दास्तां-ए-ग़़म मुझसे मैं बेवजह किसी के आंसू गिराना नहीं चाहता मैंने फिराई थी यूं ही रेत में उंगलियां ग़ौर से देखा तो तेरा अक़्स बन गया

तेरी मेरी शायरी | Teri Meri Shayari

जिनका घर है दिल मेरा, वो दूर जा बैठे भला कैसे किसी अजनबी को, मैं पनाह दूं वो शख़्स ना समझा मेरे गहरे जज़्बात को दर्द छुपाना भी बहुत तजुर्बे के बाद आया कब छलक पड़े आंसू, ख़बर तक ना हुई सिसकी भी, जुबां से ना होकर गुज़री ना दे ग़मे-मोहब्बत की आंच मुझे जाने कितने शोलें दिल में बुझा दिए मैंने फूल असली भी हैं नकली भी दुनिया में अब फैसला सिर तुम्हारे सूरत पे मरो या सीरत पे मालूम होता ग़र ये खेल लकीरों का तो ज़ख्मी कर हाथों को तेरी तक़दीर लिख लेता

Best Sher ever from Diwan E Satyam

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पूछता जो खुदा तेरी रजा क्या है तो सबसे पहले तेरा नाम मैं लेता कई बिगड़े मुक़द्दर मैंने संवरते देखें हैं बाखुदा अपनी मोहब्बत का साथ पाकर कितने नादान हैं वो हम पे मरते हैं बेरुखी को भी मेरी सादगी समझते हैं फुर्सत में तुम पे कोई नग़मा लिखेंगे कई बार तहे दिल से सोचने के बाद कई रात हमने आंखों में गुज़ार दी के तेरा ख़्याल आए तो दूजा ना हो कोई ख़्वाबों की दुनिया में तो जीना है मुमकिन कोई बात ऐसी कर जो हक़ीक़त बयां करें क्या दूं अब तुमको मिसाले-मोहब्बत किसी का आंखों को जचना ही प्यार होता है तेरे दीदार में कोई बात है शायद लड़खड़ाता है जिस्म मेरा इज़ाज़त के बिना कुछ इस कदर खोया हूं तेरी उल्फ़त में सितमगर कोई कर रहा हो तहे-दिल से खुदा की इबादत जैसे

उनकी शायरी | Unki Shayari | Best Sher ever from Diwan E Satyam

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चल ले चल हाथ पकड़ कर मुझको दर खुदा के काफि़र था मैं जो बेखुदी में सज़दा उसे किया हर ख़्वाहिश मेरी दिल में ही पलती रही हर रोज़ ज़िदगी भी बस उम्मीद पे चलती रही मत पूछ मेरी दास्तां ए ग़म मुझसे मैं बेवजह किसी के आंसू गिराना नहीं चाहता कई शाम हमने चरागों को देखा है देर तक कभी टिमटिमाते हुए कभी मुस्कुराते हुए जिंदगी है कांटो की राह फूल भी मिल सकते हैं कहीं चलता जा-चलता जा दिल में यही आश लिए मालूम है घर की दहलीज़ उन्हें लेकिन ज़िद पे अड़े हैं कोई उनको पुकार ले कल रात तेरी याद ने कुछ इस कदर सताया के आज सुबह हम देर तक सोए _________________________ वीडियो देखने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें : https://youtu.be/cLf3GQPHEz8

Diwan E Satyam (Sher)

आज न जाने क्या गरज निकल आई धरती की तरफ आसमान पिंघलने लगा के नशा तेरे प्यार के पागलपन का ही था एक सर-बुलंद, परस्तिश में, सरफ़रोश बन गया. हाथ में शराब है, आगोश में हो तुम  अब फैसला तुम ही करो मैं कौन सी को छोड़ दूं हरेक रंग के फूल से इश्क़ है मुझे मैंने मुहब्बत के रास्ते कभी रंगत को ना आने दिया इन दिनों ही हम कुछ जुदा-जुदा से रहने लगे एक जमाने में हमने फूलों की बहोत इज्जत की

ज़िंदगी शायरी

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जिनके हाथ तजुर्बे से भरे होते हैं जिंदगी के खेल में माहीर वही लोग बडे होते हैं साथ रखना हमेशा बुजुर्गों को अपने बलाएं छूती नहीं, जिन हाथ में ताबीज़ बंधे होते हैं एक उलझन-सी है जो रास्ता भटका देती है उलझी बात को और उलझा देता है हवाएं ऐसी भी है यहां जो छुप‌ के चलती हैं कोई भटकती चिंगारी जहां मिली, सुलगा देती है परिंदे याद करेंगे, ढूंढेंगे मेरा निशां कुछ इस क़दर उनके ज़ेहन में उतर जाऊंगा लोग लगे हैं काटने इस बरगद की जड़ें मैं शाखों से उग जाऊंगा समंदर की गहराई में छुपे होते हैं कई यह राज़ दरिया से अलग एक पहचान बनानी पड़ती है जरूरत कैसी-कैसी निकल आती है घर-बार में मजबूरियां शराफ़त को भी ले आती है बाज़ार में आज न जाने क्या ग़रज़ निकल आई धरती की तरफ़ आसमां पिंघलने लगा चार दिन लाए थे खुदा से लिखवाकर हयात में दो सनम-परस्ती में गुजर गए, दो खुदा-परस्ती में समंदर बड़ी खामोशी से जख़्मों को छुपाता हैं दरिया थोड़ा बह लेती है तो रो देती है यह शहर भी बड़ा अजीब है मसीहाओं का गुनहगार बेगुनाहों को आइना दिखा रहे हैं मेरी ग़ैरत से ना इस कदर उलझा करो तुम जब उतरती है तो लोग नज़र से उतर जाते हैं एक तो ग़मे-...

Ghazal (मुकम्मल) सबके कर्ज़ उतारे जा रहे हैं (बहर ए मीर)

सब के क़र्ज़ उतारे जा रहे हैं कुछ बे-फ़र्ज़ उतारे जा रहे हैं अपने हाल तो यारों गर्दिश में उनके ख़्वाब संवारे जा रहे हैं कोई भी नहीं दुनिया में अपना तन्हा वक़्त गुज़ारे जा रहे हैं रिश्ते छूट रहे हाथ से मेरे हम ग़ैरों को पुकारे जा रहे हैं हाल-ए-दिल सुनाया यूँ सिला मिला उसके दिल से किनारे जा रहे हैं मिटा रहा है वो कश्ती-ए-वफ़ा हम दरिया में उतारे जा रहे हैं जाऊँ जिधर सदा आती है यही देखो इश्क़ के मारे जा रहे हैं

Sher 5 (बहर ए मीर)

-- बहर ए मीर -- बादलों उसके भी घर जा कर बरसो याद मिरी उस बेख़बर को भी तो आए वह बेरुखी करते हैं मुझसे जाने क्यों जिसे करीब से तमन्ना देखने की है जिनका घर है दिल मेरा वो दूर जा बैठे भला कैसे किसी अजनबी को मैं पनाह दूं तमाम कोशिशें बेकार ही रही संभल पाने की जब डूब गए हम तेरी आंखों की गहराई में

Sher 3 (मुकम्मल)

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हम बेख़ुदी में जिसको सज़दा करते रहे कभी गौर से ना देखा पत्थर बुत है वो तुझे सताने की मुझे बर्दाश्त की नेमत अता की है ख़ुदा ने हर इंसान बड़ी फ़ुर्सत लगाकर ही बनाया है झूठ नापने का अगर कोई पैमाना होता मिरी मुस्कुराहट को उसने ज़रा जाना होता हज़ारों मुहब्बत मिरे हिस्से आयी लेकिन जिसे टूट कर चाहा मैंने मिरा ना हुआ मैंने फिरायी थी 'सत्यं' रेत में उंगलियां ग़ौर से देखा तो तेरा अक़्स उभरने लगा पूछता जो ख़ुदा तेरी रज़ा क्या है जानां अव्वल तिरा नाम मैं लेता तक़दीर ही मेरी मुझसे ख़फ़ा है वर्ना खुशदिल तो हमारे रक़ीब हैं होता ग़र मालूम किस्मत की लकीरों का तो ज़ख्मी करके हाथ तिरी तक़दीर मैं लिख लेता ख़ुदा की है रहमत ये मेरे मुक़द्दर में वगरना सितमगर वो मासूम ना होता

Sher 2 (मुकम्मल)

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बात लफ़्ज़ों में हो लाज़िमी तो नहीं ख़मुशी भी कहती है हाल ए दिल यहां दिल बड़ा चाहिए इश्क़ उनसे छुपाने को हर किसी से तो यह तूफ़ां संभाला नहीं जाता जब तुझे आदत मेरी लग जाएगी तू मिरी हालत को समझ पाएगी जब भी फुर्क़त ने तेरी सताया मुझे मूंद कर आंखें सूरत तिरी देखा किये तेरे रुख़ पे जज़्बात की शबनम लिपटी है, अब मैं प्यार समझूँ या परेशानी कहूँ इसे मुझे कोई बेबाक ही सा समझ रक्खा है? फिर इश्क़ तुझे खाक़ ही सा समझ रक्खा है? प्यार क्या है ये बीमार को पता है शिफ़ा है या सज़ा समझदार को पता है

ग़ज़ल (मुकम्मल) सबके हिस्से हिस्सेदारी होनी चाहिए

सबके हिस्से हिस्सेदारी होनी चाहिए सबकी अपनी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए ख़ुद की ख़ातिर ख़ुद से भी फ़ुर्सत मांगा करो आंखों में इतनी ख़ुद्दारी होनी चाहिए इक मैं ही बेइंतेहा तुझपे मरता रहूं मिरे दिल पे तिरी दावेदारी होनी चाहिए रस्ता लंबा है दोनों की मंज़िल एक है हम में कोई रिश्तेदारी होनी चाहिए धोखा अपने ही दे देते हैं अक्सर यहां अपनी मुट्ठी में दुनियादारी होनी चाहिए कुछ ऐसे कर कायम हरसू अपना रुतबा हर गली कूचे में ताबेदारी होनी चाहिए

अंधेरे का सूरज (ग़ज़ल) मुकम्मल

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अंधेरे का सूरज निकाला जा रहा है، संभले हालात को संभाला जा रहा है। सच को हर सूरत छुपाया जाता है، झूठ का अख़बार निकाला जा रहा है। कट रही उँगलियाँ, नोचे जा रहे जिस्म، ग़रीब को दहशत में ढाला जा रहा है। मौसम की नज़ाकत समझो दौर-ए-हाज़िर में، पगड़ियों को सरे-आम उछाला जा रहा है। कल उँगली पकड़ जिनके यतीम बड़े हुए، उनकी परवरिश में नुक़्स निकाला जा रहा है। कई साँप जकड़े हैं इस सोने की चिड़िया को، पालने वाले पर इल्ज़ाम डाला जा रहा है। रखो नज़र दहलीज़ पर ये दौर तुम्हारा है، हमारी पुरानी आँखों का उजाला जा रहा है। मिसाले-मोहब्बत इस क़दर करो क़ायम، जो देखे यही कहे—हिंदुस्तान वाला जा रहा है।