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Showing posts from July, 2026

बरसों की शनासाई

एक शख़्स की और मेरी  शनासाई है, लड़ाई है दुनिया की ना माने तो वो प्यार भी कर सकता है सुना है वो शख़्स कान का बहुत कच्चा है किसी ग़ैर की बातों पे एतबार भी कर सकता है अपने दिल की बात कहने से पहले कईं दफ़ा सोचो सामने वाला बेफ़िक्री से इंकार भी कर सकता है उससे इश्क में सब कुछ ला-हासिल लगा मुझे काम पे रखने से पहले ख़बरदार भी तो कर सकता है वो रहता है हमेशा दुश्मनों के साथ मिलकर वो चाहे तो मुझे होशियार भी कर सकता है उसी का हाथ है यारों साज़िश-ओ- नवाज़िश में वो साबित मुझे धोखे से गुनहग़ार भी कर सकता है अब यूं ना दिखाओ डर सैलाबों का सरफ़रोशों को जान हथेली पे हो जिसकी दरिया पार भी कर सकता है

Sher (मुकम्मल)

वो बेरुख़ ही हो जाते हैं मुझको देखकर, मैं बेख़ुद ही हो जाता हूँ जिनको देखकर। कुछ लोग जो दिल में आते नहीं हैं, कुछ लोग जो दिल से जाते नहीं हैं। जिसने मेरी आँखों से आँसू उतारे हैं मैं भी अपनी नज़र से उतार दूँगा उसे ​मैं अपने चेहरे पर सदा मुस्कान रखता हूँ अंदर से टूटा हूँ मगर दुश्मन परेशान रखता हूँ मैं समझता था वो समझता है मुझे, कौन खुदगर्ज भला समझता है मुझे। कैसी तौबा कैसा सज़्दा बेगुनाह के लिए सब बे-ईमानी है यारों एक तन्हा के लिए आज जाने गरज़ कैसी निकाल आई आसमां इक जमीं पर पिघलने लगा दर्दे-इश्क़ में मैं बद-हवास तो नहीं ला-इलाज हूं कुई बदज़ात तो नहीं यूं ही नइं कोई किनारा करता है इकला बाज़ अक्सर बुलंदी छूता है पैग़ाम यूं आया ख़ुदा का इश्क़ कर ले 'सत्यं' अब क्या खता मेरी बता दिल तुझपे आया मेरा ​लो अब शराफ़त छोड़ दी मैंने, तुम यारो अपनी हदें पहचानो। तबीयत मचल रही तो इज़हार कर, चारासाज़ी छोड़, किसी से प्यार कर। उससे इश्क़ है तो छुपाना कैसा, पर्दा गुनाहों पे रख, इबादत पे नहीं। प्यार की बस यही एक शर्त होनी चाहिए इंसाँ को इंसाँ की पहचान होनी चाहिए यह बात जुदा है, वो अब नहीं आएँगे, पर दि...

Ghazal (✓) अब और क्या बाकी रहा कमाने में

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उलझ कर शाम वो मेरी, ढली है एक ज़माने में, भटकते ही रहे हम तो, इसी शहर-ए-पुराने में। ​मुक़द्दर से मिला जो भी, उसे हँस कर क़ुबूल तू कर गँवा मत ज़ीस्त को अपनी, यूँ नादाँ आज़माने में। ​सजाया शौक़ से हमने भी इक उतरन को बदन पर, ज़माना ढूँढता है अब सुकून बस नए-पुराने में। ​सिरहाने थे जो मेरे दो चराग़ाँ कर रहे उजाला, अँधेरे कामयाब आख़िर हुए हैं मुझे रुलाने में। गुनाहगारों से अब जो है भरा यह शहर सारा ही, लगा है हर कोई बस दूसरों की कमी गिनाने में। ​यह सिलसिला पुराना है, कोई आज की बात नहीं, है आफ़ताब से ही रोशन महताब हर ज़माने में। नशा है साहिबे मसनद पे यूँ झूठी हवाओं का, नादान लगे हैं यहाँ, मुरझाए गुल खिलाने में। ​मुक़द्दर भी संवारें उनके और सबको साथ रक्खा, बता अब और क्या बाक़ी रहा सत्यम कमाने में

Sher (मुकम्मल)

शायद मिरी चाहत मिरे जानिब खड़ी है सच बोला था नज़मी ने वो मग़रूर बड़ी होगी देखो बेमिस्ल फ़ैसला ये ख़ुदाई का तोड़ते-तोड़ते मुझे वो ख़ुदा टूट गया मालूम है दिल की दहलीज़ उन्हें मगर ज़िद पे अड़े हैं कोई अब उनको पुकार ले उसने जब अपनी चाहत का इज़हार कर दिया अधूरी मेरी ग़ज़ल थी मुकम्मल हो गई मैं मुसाफ़िर हूँ तेरी रज़ा की किश्ती का चाहे साहिल पे ले चल चाहे डुबो दे मुझे एक मुद्दत से मैं ख़ामोश चला आता हूँ  सोचा कह दूँ हाल-ए-दिल तड़पना ठीक नहीं गुज़रा है बदलते हुए हालात का हर मंज़र एक बस तेरी याद के मौसम के सिवा लिख दी है तब्दीलियाँ हर दौर ने हर शै पे एक बस तेरी याद के मौसम के सिवा उसे भूल जाने की करामात हो जाए बग़ैर इल्ज़ाम के ये सारी बात हो जाए

Sher (✓)

यूँ आसाँ नहीं होता, सच-झूठ समझ पाना कई नक़ाब पड़े हैं, एक चेहरे पे आजकल नादानी में जो लोग क़दम उठा लेते हैं। पहचान की ख़ातिर पहचान गवाँ देते हैं, ​ तू भी छोड़ देना मुझे एक ज़माने के बाद, उतर जाएगा नशा मेरा आज़माने के बाद। चाहता हूँ ख़ुद से ही अब मैं रिहाई पाना, छीन ली है एक शख़्स ने आज़ादी मेरी। संभाला है ख़ुद को हमने क्या क्या देखकर किया नहीं गुनाह कोई ख़ुद को तन्हा देखकर हज़ार ग़म हैं और एक मुसीबत भी तो है, जिसको चाहूं मैं, वही दूर चला जाता है। क्यों लगाएं मैंने ये ख़्वाहिशों के मेले, मालूम था जब ख़्वाब हक़ीक़त नहीं होते। कैसे निकालूँ दिल से, बता तुझे ऐ सनम मैंने तो दर-आए को भी गले लगाया है

Sher | दीवान ए सत्यं | Diwan E Satyam | Anil Satyam

मेरे दुश्मन ही नहीं एक, मुझको ग़म देते हैं अब तो इनमें सितमग़र तेरा नाम भी आने लगा कभी सिगरेट कभी शराब हर रोज़ नए तज़ुर्बें करता हूं तेरे ग़म में सितमगर अपने रुतबे से भी गिर गया मैं मैं भी ख़्वाहिशों के शहर में, तू भी ख़्वाहिशों के शहर में घर अपना बनाने चले हैं, इस तपती हुई दोपहर में

Sher | 4 लाइन शायरी

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तुझे अपने दिल में बसा रखा है, खज़ाना जहाँ से छुपा रखा है। ​ज़माना खड़ा है खिलाफ़ अब मेरे, मगर हाथ तुझसे मिला रखा है। मिला एक मुझको भी ऐसा दिलदार लगा हूँ मैं जीने उसी का किरदार उसी का अक्स अब ज़ेहन में बसा है जुमेरात, जुमा, हो थावर, इतवार मोहब्बत जिससे भी मुझको ज़रा हो जाती है, वह मेरी जान से ज़्यादा मुझे हो जाती है। उसे पलकों पे अपनी मैं बिठा कर रखता हूँ, जो मेरी हो जाती है मेरी हो जाती है। कई दर्द से रोज़ उभरती हूँ मैं, कई आँखों से छुप निकलती हूँ मैं। जियूँ अपने ही तौर से, आरज़ू थी, ना-मर्ज़ी मगर राह बदलती हूँ मैं। मैं सितारों से सरगोशी करता हूं, जुगनुओं को रातभर खलता हूं। न देखो मुझे इतना गौर से यार मैं आंखों पर असर करता हूं। उसके सच झूठ में बदलने लगे, सोचते ही आँसू निकलने लगे। वो बेवफ़ा करता था वफ़ा की बात, आज सोचा तो दम ही निकलने लगे। सबके हिस्से हिस्से-दारी होनी चाहिए सबकी चादर-ओ-दीवारी होनी चाहिए बर्तन खाली चूल्हा ठंडा ही सही आँखों में 'सत्यं' ख़ुद्दारी होनी चाहिए ज़ख़्म मेरे अब मुस्कुराने लगे वो हमें और भी आज़माने लगे ​सजाए उसने फूल अपने बालों में भँवरे आगे-पीछे गुनगु...

Sher (शरारत)

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अपनी ख़्वाहिशों को यूं ना आज़माया कर कभी भीगने का मन हो तो भीग जाया कर तेरे बदन की शायरी में तमाम हरूफ बड़े कटीले हैं मैं शायर बड़ा गठीला हूं इज़ाज़्त दो कुछ अपना लिखूं हमें यूं लगा कि मोहब्बत का जमाना है फरवरी रोज़ ले लिया उसने पर रोज़ देने से मना कर दिया अब मैं अपने होठों को प्यासा नहीं रखता कई सहराओं से गुज़रा हूं दरिया तक आने में तेरे बदन पे जहाँ तिल है जानेमन, वहीं मेरा दिल है बेशक तू किसी से भी प्यार कर पर मुझे उस चीज से मत इनकार कर ता-उम्र साथ देना ना देना तो तेरी मर्जी है पर जरूरत के वक्त तो मत इनकार कर यह आलम शहनाई का होता तो अच्छा होता हिसाब जज़्बातों की भरपाई का होता तो अच्छा होता कमबख्त कंबल की आग भी अब बुझने लगी इस सर्दी इंतजाम रजाई का होता तो अच्छा होता ये सर्द रातें गरमा जाए तो क्या हो तन्हाई मेरी महक जाए तो क्या हो मैं तसव्वर में पढ़ रहा हूं हर-रात जिसे वही किताब हकीकत बन जाए तो क्या हो यही कमबख्त महीना था फरवरी इन्हीं दिनों छोड़ गई थी मुझे वो **मरी

Sher (मुकम्मल)

मेरे हुजरे में ना रख सामान मुजरे का काफ़िरों की बस्ती में इक नेक रहने दे वज़ह ऐसी के लबों पर अपने चुप्पी रखता हूं मुझपे यह इल्ज़ाम है मैं हक़ जमाने लगता हूं मेरी नज़रें उसकी ज़ुल्फ़ में उलझ जाती हैं रातों को हम जागते हैं नींद कहाँ आती है इस कैसे मुकाम पर हम आ खड़े हुए तुझे दिल में बसा कर भी तन्हा ही लगते हैं मुश्किल है वफ़ा-ए-गुल की ज़िम्मेदारी खिलता सुबह शब तक मुरझा वो जाता हैं जफ़ा फ़रेब दर्द अश्क़ होंगे महफ़िलों की तरह  रस्ते में इश्क के मिलेंगे संग ए मीलों की तरह