Sher (✓) बेवफाई, दर्द| Bewafai ki Dard Bhare Shayari
यह कैसी सजा मुझे वो शख्स दे गया,
न तो क़त्ल किया मुझको न ज़िंदा छोड़ा।
ना पूछ मेरी दास्तान-ए-ग़म तू मुझसे,
आंसू तुम्हारे बे-वजह मैं गिराना नहीं चाहता।
हमसे यही गुनाह फिर संगीन हो गया,
उस बेवफ़ा पे हमको फिर यक़ीन हो गया
गर होती यारों ख़्वाबों पे हुकूमत अपनी
हर-शब जानां मैं तेरा दीदार करता
मेरे हुजरे में ना ला सामान मुजरे का,
काफ़िरों की बस्ती में इक नेक रहने दे।
वज़ह ऐसी कि लबों पर अपने चुप्पी रखता हूँ,
मुझ पे इल्ज़ाम है कि मैं अब हक़ जताने लगता हूँ।
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