बेवफाई की दर्द भरी शायरी | Bewafai ki Dard Bhare Shayari

यह कैसे मुकाम पे हम आ खड़े हुए
तुम्हें दिल में बसाकर भी तन्हा से लगते हैं

यह कैसी सज़ा मुझें वो शख़्स दे गया
के क़त्ल भी ना किया और ज़िंदा भी ना छोड़ा

कैसे निकालू दिल से बता तुझे सनम
मैंने तो दर आये को भी गले लगाया है

मत पूछ मेरी दास्तां ए ग़म मुझसे
मैं बेवज़ह किसी के आंसू गिराना नहीं चाहता

इस बार ग़ुनाह हमसे बड़ा संगीन हो गया
उस बेवफ़ा पे फिर से हमें यकीन हो गया

ग़र होती ख़्वाबों पे हुकूमत अपनी
तो हर-शब तेरा दीदार मैं करता

कईं मोड़ से गुज़रे राहे उल्फ़त में 'सत्यं'
सोचा था मैंने यूं, आसानियां होंगी

सुना है बिछुड़कर बढ़ जाती है मोहब्बत और
वो तो ग़ैर के हो गए दो पल की जुदाई के बाद

इक मुद्दत से ज़ुबां ख़ामोश है मेरी
सोचा कह दूं हाले-दिल तड़प अच्छी नहीं होती

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