Sher | बेवफाई, दर्द| Bewafai ki Dard Bhare Shayari

यह कैसी सजा मुझे वो शख्स दे गया,
न तो क़त्ल किया उसने न ज़िंदा छोड़ा।

ना पूछ मेरी दास्तान-ए-ग़म तू मुझसे,
आंसू तुम्हारे बे-वजह मैं गिराना नहीं चाहता।

हमसे यही गुनाह फिर संगीन हो गया,
उस बेवफ़ा पे हमको फिर यक़ीन हो गया।




ग़र होती ख़्वाबों पे हुकूमत अपनी
तो हर-शब तेरा दीदार मैं करता

सुना है बिछुड़कर बढ़ जाती है मोहब्बत और
वो तो ग़ैर के हो गए दो पल की जुदाई के बाद

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