नशा | Nasha | शराब और आंखें

दर्द-ए-दिल अब मैं सुनाने से रहा
अश्क आँखों के दिखाने से रहा
​होगी बरकत पैमाने में कभी
जूठे प्याले मुँह लगाने से रहा

तुम बैठी रहो मेरी नज़रों के सामने,
आज मेरा मन है मदहोश हो जाने का।


मय पी कर सँभलते ही नहीं जज़्बात मेरे,
होश में रहता हूँ तो ख़ामोश ही रहता हूँ।

कभी गुज़ारा था अपना बस एक ही जाम पर,
अब तलब ऐसी बढ़ी है कि दो आँखें चाहिए।

शराब पी कर भी जानाँ बहुत होश में हूँ,
तू आँखों से ना पिला, बहकने का डर है।

​बंद है मय-कदा, और दूर उसका घर भी है,
याद उसकी आज मुझको क़त्ल कर के छोड़ेगी


हर कोशिश मेरी बेकार रही संभल पाने की,
कि हम डूब ही गए तेरी आँखों की गहराई में।

तेरी आँखें नहीं तो क्या कोई जाम ही सही,
अब सहारा कोई तो हो जिए जाने के लिए।

तुम तो सियासती लफ़्ज़ों में बात करती हो,
शराब छोड़ दो कहती हो, पास आती नहीं।

​थी हराम कल जो शराब, आज वो हलाल हो गई,
होश में कह न सके, बेखुदी में बात हो गई

साग़र है मेरे हाथ में आगोश में हो तुम,
तौबा करूँ शराब से या तुमको छोड़ दूं


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मत फूंक मय से, अपना जिग़र ,सत्यं,
बेख़ुद ही होना है तो इश्क़ में जला इस

आँखों में उतर जा मेरी या जाम में उतार मुझे,
मेरी फितरत है दो नशे एक साथ नहीं करता

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