Posts

Showing posts from December, 2025

गर्मी पर शायरी

के मौसम गर्मी का बडा ही बे-दर्दी होता है ज़ालिम रज़ाई भी कतराती है नज़दीक आने में

बाज़ (शायरी)

Image
कल मिरी परवाज़ ऊंचाई छू लेगी आज मैं नाख़ून-ओ-पंख नोच रहा हूं यूं ही नइं कोई किनारा करता है बाज़ इकला ही बुलंदी छूता है चंद कव्वों पे यहां नइं नइं रवानी आयी है बाज़ से टकरा रहे हैं मौत दर तक लायी है हवा चाहे जिधर भी उडे ज़माने की यहां लेकिन रियासत ए फ़लक तो बाज़ के क़दमों में रहती है

Sher (मुकम्मल) चार लाइन वाले

Image
वो मेरी हद-ए-तसव्वुर से गुज़रता क्यों नहीं नशा उसके अन्दाज़ का उतरता क्यों नहीं मैं हैरान हूँ ये सोचकर उसके बारे में ढलता है वक़्त, हुस्न उसका ढलता क्यों नहीं उजाले कफ़न ओढ़कर सोने लगे सहारे सिरों को झुका रोने लगे जहाँ देखो हर तरफ मातम है छाया फ़रिश्ते ख़ुदा की मौत पर रोने लगे अलग सोच ज़माने की बना लेनी चाहिए, उठे जो भी सदाएँ, वो दबा देनी चाहिए। ज़रूरी नहीं शमशीर क़त्ल को ही उठे, दहशतगर्दी को भी लहरा देनी चाहिए। मेरे दिल में वो शम्अ-ए-मुहब्बत जलाता रहा मेरे जुनून पर कामयाबी का रास्ता बनाता रहा जिसे लेकर गया था मैं एक रोज़ बुलंदी पर वही अपनी नज़र से मुझे गिराता रहा ख़ामोशियाँ सुनो तो सुनाई देती हैं आहटें आँखों में दिखाई देती हैं तुम मानो या न मानो कोई बात नहीं तेरी आवाज़ मोहब्बत की गवाही देती है

अंबेडकर साहब की शायरी | Ambedkar Sahab Shayari

जिसका कोई जवाब न हो, ऐसा कोई सवाल मिले, वो राह दिखाती लोगों को, जलती कोई मशाल मिले। मैंने इतिहास के पन्नों को कई बार पलटकर देखा, 'बाबा साहब'-सी दुनिया में दूजी न कोई मिसाल मिले। एक बाग़बाँ सूखे पेड़ों पर लहू की बारिश करता रहा, कतरा-कतरा उम्मीद की क्यारियों में भरता रहा। सूरज भी थक के उठता है रातभर आराम के बाद, वो मसीहा हमारी ख़ातिर दिन-रात एक करता रहा। दिया न ख़ुदा ने जो, एक इंसान दे गया, मुस्कुराहट का अपनी वो बलिदान दे गया। काल को दे दी क़ुर्बानी अपने लाल की, बदले में हमें ख़ुशियों का वरदान दे गया। ख़ुदाओं के शहर में वो ख़ुदा से ज़्यादा दे गया, औरत को, पिछड़ों को जीने का इरादा दे गया। ये ब्रह्मास्त्र भी ऊँच-नीच का कल टूट ही जाएगा, वो जाते-जाते संविधान की मज़बूत ढाल दे गया। वो शख़्स हर शख़्स की तक़दीर हो गया, पढ़-लिखकर इंसाफ़ की शमशीर हो गया। कल्पना में सुनी थी हम ने लक्ष्मण रेखा, बाबा का लिखा पत्थर की लकीर हो गया। गुम अंधेरों में थी गुज़रती ज़िंदगी मेरी, अब सवेरे की राह पर मेरा सफ़र है। खुल गए सब रास्ते जहां में मेरे लिए, ये मेरे बाबा की हिदायत का असर है। एक फ़रिश्ते ने अंधेरों...

Ghazal (मुकम्मल) पुरानी ईंट सही हम

ये रास्ते, ये सफ़र रह जाएँगे मेरे जाने के बाद और रह जाएँगी मेरी यादें मेरे जाने के बाद तुम्हें आँख भर के कोई न देखेगा ज़माने में बहुत रुलाएँगी बातें माँ-बाप गुज़र जाने के बाद हमें कमसिनी में घर से निकाला गया बे-क़सूर मेरे वालिद ने ये बताया जी भर आने के बाद वो बद-मिज़ाज अब बदज़ुबानी सहने लगा आ गया उसे सलीक़ा बेटी घर आने के बाद ये जो गुरूर है मेरा तेरी बेरुख़ी पे टिका उतर जाता है नशे-सा हँस के बुलाने के बाद मैं सोचता हूँ कोई ग़ज़ल अपने हालात पे लिखूँ मुहब्बत लिख जाता है क़लम उठाने के बाद उलझ गई थी ज़िंदगी सबको अपना कहते-कहते आसान कर लिया सबको औक़ात पे लाने के बाद पुरानी ईंट सही हम, तू बे-क़द्री से न फेंक हमें ही अलग किया हमसे सिर छुपाने के बाद

Ghazal (मुकम्मल) ता-उम्र जो मिला ज़ख़्म

ता-उम्र जो मिला ज़ख़्म, निशानी की तरह, मैं ख़ून था जो बहा दिया पानी की तरह। मैंने साथ रहने की अपनों से मिन्नतें कीं, वो बात भी करते रहे मेहरबानी की तरह। चाहे जितना भी तुम अहम किरदार बनो, तुम्हें भुला दिया जाएगा कहानी की तरह। मिट्टी को मिलना है इक दिन मिट्टी में, ग़ुरूर भी ढल जाएगा जवानी की तरह। फिर उनसे तर्क-ए-तअल्लुक़ ठीक नहीं, याद रखना है अगर बात पुरानी की तरह। मुझे ठुकरा के ग़ुरबत में गुज़ारा करती है, जो मुझ पे हुकूमत करती थीं रानी की तरह। तू भी दुनिया के रंग मुझको दिखाने लगी, मैं भी छोड़ दूँगा तुझे एक दीवानी की तरह।