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शेर । गर्मी

के मौसम गर्मी का बडा ही बे-दर्दी होता है ज़ालिम रज़ाई भी कतराती है नज़दीक आने में

शेर । बाज़

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कल मिरी परवाज़ ऊंचाई छू लेगी आज मैं नाख़ून-ओ-पंख नोच रहा हूं यूं ही नइं कोई किनारा करता है बाज़ इकला ही बुलंदी छूता है चंद कव्वों पे यहां नइं नइं रवानी आयी है बाज़ से टकरा रहे हैं मौत दर तक लायी है हवा चाहे जिधर भी उडे ज़माने की यहां लेकिन रियासत ए फ़लक तो बाज़ के क़दमों में रहती है

Sher | अंबेडकर साहब | Ambedkar Sahab Shayari

जिसका कोई जवाब न हो, ऐसा कोई सवाल मिले, वो राह दिखाती लोगों को, जलती कोई मशाल मिले। मैंने इतिहास के पन्नों को कई बार पलटकर देखा, 'बाबा साहब'-सी दुनिया में दूजी न कोई मिसाल मिले। एक बाग़बाँ सूखे पेड़ों पर लहू की बारिश करता रहा, कतरा-कतरा उम्मीद की क्यारियों में भरता रहा। सूरज भी थक के उठता है रातभर आराम के बाद, वो मसीहा हमारी ख़ातिर दिन-रात एक करता रहा। दिया न ख़ुदा ने जो, एक इंसान दे गया, मुस्कुराहट का अपनी वो बलिदान दे गया। काल को दे दी क़ुर्बानी अपने लाल की, बदले में हमें ख़ुशियों का वरदान दे गया। ख़ुदाओं के शहर में वो ख़ुदा से ज़्यादा दे गया, औरत को, पिछड़ों को जीने का इरादा दे गया। ये ब्रह्मास्त्र भी ऊँच-नीच का कल टूट ही जाएगा, वो जाते-जाते संविधान की मज़बूत ढाल दे गया। वो शख़्स हर शख़्स की तक़दीर हो गया, पढ़-लिखकर इंसाफ़ की शमशीर हो गया। कल्पना में सुनी थी हम ने लक्ष्मण रेखा, बाबा का लिखा पत्थर की लकीर हो गया। गुम अंधेरों में थी गुज़रती ज़िंदगी मेरी, अब सवेरे की राह पर मेरा सफ़र है। खुल गए सब रास्ते जहां में मेरे लिए, ये मेरे बाबा की हिदायत का असर है। एक फ़रिश्ते ने अंधेरों...

Ghazal (मुकम्मल) ता-उम्र जो मिला ज़ख़्म

ता-उम्र जो मिला ज़ख़्म, निशानी की तरह, मैं ख़ून था जो बहा दिया पानी की तरह। मैंने साथ रहने की अपनों से मिन्नतें कीं, वो बात भी करते रहे मेहरबानी की तरह। चाहे जितना भी तुम अहम किरदार बनो, तुम्हें भुला दिया जाएगा कहानी की तरह। मिट्टी को मिलना है इक दिन मिट्टी में, ग़ुरूर भी ढल जाएगा जवानी की तरह। फिर उनसे तर्क-ए-तअल्लुक़ ठीक नहीं, याद रखना है अगर बात पुरानी की तरह। मुझे ठुकरा के ग़ुरबत में गुज़ारा करती है, जो मुझ पे हुकूमत करती थीं रानी की तरह। तू भी दुनिया के रंग मुझको दिखाने लगी, मैं भी छोड़ दूँगा तुझे एक दीवानी की तरह।