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Showing posts from June, 2026

Sher | नशा (मुकम्मल)

दर्द-ए-दिल अब मैं सुनाने से रहा अश्क आँखों के दिखाने से रहा ​होगी बरकत पैमाने में कभी जूठे प्याले मुँह लगाने से रहा तुम बैठी रहो मेरी नज़रों के सामने, आज मेरा मन है मदहोश हो जाने का। मय पी कर सँभलते ही नहीं जज़्बात मेरे, होश में रहता हूँ तो ख़ामोश ही रहता हूँ। कभी गुज़ारा था अपना बस एक ही जाम पर, अब तलब ऐसी बढ़ी है कि दो आँखें चाहिए। शराब पी कर भी जानाँ बहुत होश में हूँ, तू आँखों से ना पिला, बहकने का डर है। ​बंद है मय-कदा, और दूर उसका घर भी है, याद उसकी आज मुझको क़त्ल कर के छोड़ेगी । हर कोशिश मेरी बेकार रही संभल पाने की, कि हम डूब ही गए तेरी आँखों की गहराई में। तेरी आँखें नहीं तो क्या कोई जाम ही सही, अब सहारा कोई तो हो जिए जाने के लिए। तुम तो सियासती लफ़्ज़ों में बात करती हो, शराब छोड़ दो कहती हो, पास आती नहीं। ​थी हराम कल जो शराब, आज वो हलाल हो गई, होश में कह न सके, बेखुदी में बात हो गई साग़र है मेरे हाथ में आगोश में हो तुम, तौबा करूँ शराब से या तुमको छोड़ दूं ******************* मत फूंक मय से, अपना जिग़र ,सत्यं, बेख़ुद ही होना है तो इश्क़ में जला इस आँखों में उतर जा मेरी या जाम में उत...

Sher (मुकम्मल) एक कलाम सत्यं के नाम

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यह मंज़र भी किसी दिन मैं दिखाऊँगा उसे किसी जाँबाज़ से रू-ब-रू कराऊँगा उसे ​छुपा रक्खा है इक इक्का अभी आस्तीन में ज़रूरत आ पडी तो खेल जाऊँगा उसे ख़ुदग़र्ज़ हैं वो लोग जो एहसान भूल गए लड़ा था जिनके वास्ते, वो इंसान भूल गए आँधियों से ये कहो कि अपनी हद में ही रहें शराफ़त हमनें क्या दिखाई, औक़ात भूल गए। दुश्मन को नज़र-ए-इनायत देते हैं हम ग़लती पे उसकी पर्दा गिरा देते हैं हम मिला न सकेगा वो आंखें कभी हमसे नज़रों में उसकी उसे गिरा देते हैं हम सितारे गर्दिशों में हैं हमारे इन दिनों वरना, लुटाएं हैं बड़े एहसाँ यहाँ ख़ैरात की सूरत। रहा है शौक़ ही ख़तरों से खेलना, होते रहे सामना, सो मोहब्बत कर ली। कभी बे-बात सुनना, कभी छुप कर रोना इतना आसान नहीं है, 'सत्यं' होना हुनर चेहरे को पढ़ने का क्या ही खूब आया है, उजाले में छुपी हर सूरत को पहचानता हूँ मैं। रौनक़ न देखिए मिरी सूरत की ऐ जनाब, ग़म को छुपाने का मिरा, अंदाज़ है यह। मैंने क़सम उठाई थी गुनाह न करने की मालूम न था लोग मोहब्बत को जुर्म समझते हैं मारा हुआ मैं अपनी ही क़िस्मत का हूँ 'सत्यं', वरना जो ख़ुशनसीब हैं, वो उनके क़रीब ह...

Ghazal (मुकम्मल) पुरानी ईंट सही हम

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ये रास्ते, ये सफ़र रह जाएँगे मेरे जाने के बाद और रह जाएँगी मेरी यादें मेरे जाने के बाद तुम्हें आँख भर के कोई न देखेगा ज़माने में बहुत रुलाएँगी बातें माँ-बाप गुज़र जाने के बाद हमें कमसिनी में घर से निकाला गया बे-क़सूर मेरे वालिद ने ये बताया जी भर आने के बाद वो बद-मिज़ाज अब बदज़ुबानी सहने लगा आ गया उसे सलीक़ा बेटी घर आने के बाद ये जो गुरूर है मेरा तेरी बेरुख़ी पे टिका उतर जाता है नशे-सा हँस के बुलाने के बाद मैं सोचता हूँ कोई ग़ज़ल अपने हालात पे लिखूँ मुहब्बत लिख जाता है क़लम उठाने के बाद उलझ गई थी ज़िंदगी सबको अपना कहते-कहते आसान कर लिया सबको औक़ात पे लाने के बाद पुरानी ईंट सही हम, तू बे-क़द्री से न फेंक हमें ही अलग किया हमसे सिर छुपाने के बाद

Ghazal (मुकम्मल) इश्क़ में यार अपने ही बेगाने हो गए

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इश्क़ में यार अपने ही बेगाने हो गए हम मोहब्बत में उसी के दीवाने हो गए वैसे तो वो मुस्कुरा कर देखा करती थी इस भरम में नए ज़माने, पुराने हो गए चाँद ने हटा दी घटा जो ओढ़ रखी थी आँखों के आगे अनदेखे ख़ज़ाने हो गए सबको मिली शोहरत उसकी पाक निगाहों से क़त्ल होकर मशहूर सब निशाने हो गए उसने बेदख़ल कर दिया मुझे पलकों से दीवार-ओ-दहलीज़ मेरे ठिकाने हो गए एक शमा ने बिखेरी जलवों की सी रौशनी जलने को तैयार कई परवाने हो गए तेरी ज़ुल्फ़ों की वो तासीर, लबों का ज़ायका जाइज़ा तेरे बदन का सब ज़माने हो गए