Ghazal (मुकम्मल) इश्क़ में यार अपने ही बेगाने हो गए




इश्क़ में यार अपने ही बेगाने हो गए
हम मोहब्बत में उसी के दीवाने हो गए

वैसे तो वो मुस्कुरा कर देखा करती थी
इस भरम में नए ज़माने, पुराने हो गए

चाँद ने हटा दी घटा जो ओढ़ रखी थी
आँखों के आगे अनदेखे ख़ज़ाने हो गए

सबको मिली शोहरत उसकी पाक निगाहों से
क़त्ल होकर मशहूर सब निशाने हो गए

उसने बेदख़ल कर दिया मुझे पलकों से
दीवार-ओ-दहलीज़ मेरे ठिकाने हो गए

एक शमा ने बिखेरी जलवों की सी रौशनी
जलने को तैयार कई परवाने हो गए

तेरी ज़ुल्फ़ों की वो तासीर, लबों का ज़ायका
जाइज़ा तेरे बदन का सब ज़माने हो गए

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