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Ghazal (मुकम्मल) एक ही शख़्स से वो इश्क़

किसी इक शख़्स से ही इश्क़ वो दोबारा होना यानी ख़सारे में ही इक और ख़सारा होना ​उसे बस एक ही बार देखा था आधी रात में फिर न मुमकिन हुआ जन्नत का नज़ारा होना ​रंगत-ए-रुख़्सार देती है पयाम-ए-उल्फ़त बज़्म में मुमकिन कहाँ तुमको इशारा होना ​दिल में उसके भी मोहब्बत थी ये जाना मैंने पर उसे मंज़ूर न था सिर्फ़ हमारा होना ​तेज़ लहरों की तरह वो तो निकल जाती है और मेरी चाहतें दरिया से किनारा होना ​थक गया हूँ मैं बहुत हिज्र की राहों में अब अब क़यामत है यहाँ तन्हा गुज़ारा होना ​बेरुख़ी ने तेरी ग़ैरों का किया है मुझको मुश्किल है अब जान मेरी फिर तुम्हारा होना

Sher (मुकम्मल) नई शायरी

मुद्दतों में आज जो देखा है आईना मैंने लोग तो बदल गए, ख़ुद को वही पाया मैंने वो हो रहे हैं बेरुख मुझसे जाने क्यों, जिन्हें करीब से देखने की तमन्ना है। लिखो हम पे कोई दीवान लिखो ​हम एक काग़ज़ पे नहीं आने वाले तलाश उसकी है जो बस मेरा हो जाए, नसीब ऐसा कोई शख़्स मुझको न हुआ। मेरी खुद्दारी ने मुझको हाथ फैलाने न दिया, मेरे मेयार पे झुक गए कई खुद्दार सिर। मुझे अब भी किसी से इश्क़ है पर, कोई हम-सा हमें अपना न मिला। देख लो हमारे सब्र की ज़रा ये इंतहा, हमने ज़िंदगी गुज़ार दी हमसफ़र के बग़ैर। सज्दे की हक़ीक़त न जिन्हें मालूम, वह लगे हैं बेईमानों को ख़ुदा बनाने में। कब तक मुझे इन बंदिशों की हयात में जीना होगा, किस फ़र्ज़ से ग़ैरत के नाम जहन्नुम में जीना होगा। रुख़ से नक़ाब हटाकर नज़र अंदाज़ करती हो, माज़रा क्या है कि हिजाब से दीदार करती हो।

रिश्तेदारी और मां-बाप शाइरी

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जिनके हाथ तजुर्बों से भरे होते हैं, ज़िंदगी के खेल में माहिर बड़े होते हैं। साथ रखना तुम हमेशा बुज़ुर्गों को अपने, बला खौफ खाती है गर ताबीज़ बँधे होते हैं बदनसीबी ने ख़ाक कर दिया था मुझे वो ख़िज़ाँ की आँच अब भी याद थी मुझे बढ़ता रहा मैं राह-ए-कामयाबी माँ की दुआओं का ही असर था मुझे अपने आज सब सरफरोशी हो गए सारे मिरे अरमां इक खमोशी हो गए रिश्ते लहू के पूछता अब कोई नहीं मौसी बुआ चाचा, पड़ोसी हो गए कुछ इस क़दर हमने चिराग़ों को तालीम दी घर जल गए दुश्मन के, इल्ज़ाम हवा पर गया अपने माँ-बाप को हर सूरत ख़ुश रखा कर ऐसा न हो फ़र्ज़ की बद्दुआ लग जाए तुझे मेरे दिल से उठती है यही सदा बार बार गर है पिता सलामत, चाहत नहीं खुदा की मेरे अपने मेरी उम्र को छिपाते रहे बड़ों की नज़र में छोटे बच्चे ही होते हैं