Sher (मुकम्मल)

सज्दे की हक़ीक़त न जिन्हें मालूम,
वह लगे हैं बेईमानों को ख़ुदा बनाने में।

कब तक मुझे इन बंदिशों की हयात में जीना होगा,
किस फ़र्ज़ से ग़ैरत के नाम जहन्नुम में जीना होगा।

रुख़ से नक़ाब हटाकर नज़र अंदाज़ करती हो,
माज़रा क्या है कि हिजाब से दीदार करती हो।

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