Ghazal (मुकम्मल) सबके कर्ज़ उतारे जा रहे हैं (बहर ए मीर)

सब के क़र्ज़ उतारे जा रहे हैं
कुछ बे-फ़र्ज़ उतारे जा रहे हैं

अपने हाल तो यारों गर्दिश में
उनके ख़्वाब संवारे जा रहे हैं

कोई भी नहीं दुनिया में अपना
तन्हा वक़्त गुज़ारे जा रहे हैं

रिश्ते छूट रहे हाथ से मेरे
हम ग़ैरों को पुकारे जा रहे हैं

हाल-ए-दिल सुनाया यूँ सिला मिला
उसके दिल से किनारे जा रहे हैं

मिटा रहा है वो कश्ती-ए-वफ़ा
हम दरिया में उतारे जा रहे हैं

जाऊँ जिधर सदा आती है यही
देखो इश्क़ के मारे जा रहे हैं

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