Sher (मुकम्मल)


मेरी नज़रें उसकी ज़ुल्फ़ में उलझ जाती हैं
रातों को हम जागते हैं नींद कहाँ आती है

इस कैसे मुकाम पर हम आ खड़े हुए
तुझे दिल में बसा कर भी तन्हा ही लगते हैं

मुश्किल है वफ़ा-ए-गुल की ज़िम्मेदारी
खिलता सुबह शब तक मुरझा वो जाता हैं

जफ़ा फ़रेब दर्द अश्क़ होंगे महफ़िलों की तरह 
रस्ते में इश्क के मिलेंगे संग ए मीलों की तरह


सुना है बिछुड़कर बढ़ जाती है मोहब्बत और
वो तो ग़ैर के हो गए दो पल की जुदाई के बाद

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