Sher (मुकम्मल)

मेरे हुजरे में ना रख सामान मुजरे का
काफ़िरों की बस्ती में इक नेक रहने दे

वज़ह ऐसी के लबों पर अपने चुप्पी रखता हूं
मुझपे यह इल्ज़ाम है मैं हक़ जमाने लगता हूं

मेरी नज़रें उसकी ज़ुल्फ़ में उलझ जाती हैं
रातों को हम जागते हैं नींद कहाँ आती है

इस कैसे मुकाम पर हम आ खड़े हुए
तुझे दिल में बसा कर भी तन्हा ही लगते हैं

मुश्किल है वफ़ा-ए-गुल की ज़िम्मेदारी
खिलता सुबह शब तक मुरझा वो जाता हैं

जफ़ा फ़रेब दर्द अश्क़ होंगे महफ़िलों की तरह 
रस्ते में इश्क के मिलेंगे संग ए मीलों की तरह

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