Sher 10 (मुकम्मल)

तबीयत मचल रही तो इज़हार कर,
चारासाज़ी छोड़, किसी से प्यार कर।

उससे इश्क़ है तो छुपाना कैसा,
पर्दा गुनाहों पे रख, इबादत पे नहीं।

प्यार की बस यही एक शर्त होनी चाहिए
इंसाँ को इंसाँ की पहचान होनी चाहिए

यह बात जुदा है, वो अब नहीं आएँगे,
पर दिल की इल्तिजा है, थोड़ा इंतज़ार कर।

मैं सितारों से सरगोशी करता हूं,
जुगनुओं को रातभर खलता हूं।
न देखो मुझे इतना गौर से यार
मैं आंखों पर असर करता हूं।

उसके सच झूठ में बदलने लगे,
सोचते ही आँसू निकलने लगे।
वो बेवफ़ा करता था वफ़ा की बात,
आज सोचा तो दम ही निकलने लगे।

कई दर्द से हर रोज़ उभरती हूँ मैं,
कई आँखों से बचकर निकलती हूँ मैं।
मैंने चाहा था जीना अपने तौर से,
ना-मर्जी मगर राह बदलती हूँ मैं।


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