कईं मिथक प्रमाणों के आधार पर हमें यह पढ़ाया जाता है कि हमारे देश भारत का नाम राजा सर्वदमन यानी भरत के नाम पर पड़ा। जहां वह पैदा हुए थे वह जगह अब अफगानिस्तान में है। व्याकरणिक दृष्टि से देखा जाए तो भरत के नाम पर पड़ने के कारण तो इसका नाम भरतवर्त, भरतपुर, भरत नगरी, भरत विहार आदि होना चाहिए था। मुझे सचमुच बहुत आश्चर्य है कि कोई अपने नाम को क्यों विकृत होने देगा। "भ+र+त" नाम में वर्ण "भ" के साथ "भ+।" क्यों जोड़ देगा और इसे "भ+।+र+त" क्यों बना देगा। यह बात हर सिरे से अतार्किक लगती है। कुछ जातिगत लोग और धर्म के ठेकेदार आज भी ऐसे-ऐसे प्रयोग करते रहते हैं। मैं आपको एक उदाहरण के माध्यम से समझाता हूं- "हमारा देश भारत एक पुलिंग शब्द है" लेकिन फिर भी कुछ लोग इसे भारत माता बोलते रहते हैं जो कि भाषाई व व्याकरणिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है। यदि बात वास्तविकता की करें तो भारत देश का नाम यहां आदिकाल से रहने वाली एक कबीलाई अनुसूचित जनजाति के नाम पर पड़ा है। "इस कबीलाई जाति का नाम ही भारत था, परंतु कुछ जालसाज लोगों ने भारत की वास्तविक संस्कृति या...
इश्क़ में यार अपने ही बेगाने हो गए हम मोहब्बत में उसी के दीवाने हो गए वैसे तो वो मुस्कुरा कर देखा करती थी इस भरम में नए ज़माने, पुराने हो गए चाँद ने हटा दी घटा जो ओढ़ रखी थी आँखों के आगे अनदेखे ख़ज़ाने हो गए सबको मिली शोहरत उसकी पाक निगाहों से क़त्ल होकर मशहूर सब निशाने हो गए उसने बेदख़ल कर दिया मुझे पलकों से दीवार-ओ-दहलीज़ मेरे ठिकाने हो गए एक शमा ने बिखेरी जलवों की सी रौशनी जलने को तैयार कई परवाने हो गए तेरी ज़ुल्फ़ों की वो तासीर, लबों का ज़ायका जाइज़ा तेरे बदन का सब ज़माने हो गए
मेरे हुजरे में ना रख सामान मुजरे का काफ़िरों की बस्ती में इक नेक रहने दे वज़ह ऐसी के लबों पर अपने चुप्पी रखता हूं मुझपे यह इल्ज़ाम है मैं हक़ जमाने लगता हूं मेरी नज़रें जब उसकी जुल्फ़ों में उलझ जाती है जगते रहते हैं रातों में नींद कहां आती है यह कैसी मुझे सज़ा दे गया वो सितंगार के क़त्ल भी ना किया और ज़िंदा भी ना छोड़ा इस कैसे मुकाम पर हम आ खड़े हुए तुझे दिल में बसा कर भी तन्हा ही लगते हैं मुश्किल है वफ़ा-ए-गुल की ज़िम्मेदारी खिलता सुबह शब तक मुरझा वो जाता हैं जफ़ा फ़रेब दर्द अश्क़ होंगे महफ़िलों की तरह रस्ते में इश्क के मिलेंगे संग ए मीलों की तरह
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