हड़प्पा सभ्यता, नागवंश, वेद-पुराण व पुरा तत्वों के आधार पर भारत में रहने वाली प्रत्येक आदिवासी मलनिवासी स्त्री शूद्र (अनार्य) यानि नागवंशी या मौर्य व द्रविड़ वंश की हैं। इतिहास गवाह है कि जब आर्य शोध में जिनका DNA R1A1 के रूप में पाया गया मध्य एशिया से भारत को लूटने के उद्देश्य से आये तो ये लोग भी अरब-लूटेरों की ही तरह अपने साथ एक भी महिला को नहीं लेकर आये थे। उन्होंने लोहे की खोज कर ली थी और इन्हीं हथियारों के बल पर यहां के आदिवासी मूलनिवासियों जिनका DNA L3MN है की युद्ध में जीती हुई शूद्र स्त्रियां (अनार्य) यानि नागवंशी या मौर्य व दविड़ वंश से विवाह रचाया तथा यहां के निवासी बनकर र्स्वस्त पर अपना अधिपत्य स्थापित करने हेतु मनुस्मृति लिख ब्राह्मणवाद की स्थापना की। रक्त की शुद्धता बनाए रखने हेतु जातियां बनाई तथा स्त्रियों को शूद् श्रेणी में रख पुरूष-शुद्रों की तरह ही उन पर भी कड़े नियम लागू किए जैसे- गुलामी, अशिक्षा तथा अन्याय आदि। स्त्रियों को बच्चे पैदा करने तथा उनका शारीरिक शोषण करने के लिए ही इस्तेमाल किया जाता था इसीलिए स्त्रियों को इतनी निम्न श्...
यह वास्तविक घटना दिल्ली के आर. के. पुरम गांव की है। गांव में एक व्यक्ति रहता था जो कि बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी का बहुत बड़ा अनुयाई और भक्त था। वह सुबह सवेरे उठता तो सबसे पहले बाबा साहब की प्रतिमा को नमन करता था। दिन के किसी भी पहर जब भी वह किसी अन्य व्यक्ति से मिलता तो उसे "जय भीम" बोलकर सत्कार किया करता था। उसने बाबा साहब की अनेकों किताबों का अध्ययन कर बहुत बड़े पैमाने पर ज्ञान अर्जित किया था। बाबा साहब के विचार सदैव उसके मस्तिष्क पर छाए रहते थे। एक रात की बात है जब वह गहन निद्रा में सोया हुआ था तो उसने एक सपना देखा जिसमें उसने ख़ुद को एक तालाब के किनारे पाया। उसने जैसे ही तालाब के अंदर पानी पीने के लिए अपना एक पैर रखा तो वहां पहले से ही घात लगाएं बैठे एक मगरमच्छ ने उसका पैर अपने जबड़े में दबोच लिया और धीरे-धीरे पानी के अंदर खींचने लगा। अब वह बहुत ज्यादा घबरा गया, उसे कुछ नहीं सूझ रहा था। उसने अपना पैर छुड़ाने का बहुत प्रयास किया परंतु असमर्थ रहा। पीड़ा ज्यादा होने के कारण उसके मुंह से एक आवाज़़ निकली "हे! बाबा साहब मुझे बचाओ।" इतना कहते ही बाबा साहब हाथ मे...
इश्क़ में यार अपने ही बेगाने हो गए हम मोहब्बत में उसी के दीवाने हो गए वैसे तो वो मुस्कुरा कर देखा करती थी इस भरम में नए ज़माने, पुराने हो गए चाँद ने हटा दी घटा जो ओढ़ रखी थी आँखों के आगे अनदेखे ख़ज़ाने हो गए सबको मिली शोहरत उसकी पाक निगाहों से क़त्ल होकर मशहूर सब निशाने हो गए उसने बेदख़ल कर दिया मुझे पलकों से दीवार-ओ-दहलीज़ मेरे ठिकाने हो गए एक शमा ने बिखेरी जलवों की सी रौशनी जलने को तैयार कई परवाने हो गए तेरी ज़ुल्फ़ों की वो तासीर, लबों का ज़ायका जाइज़ा तेरे बदन का सब ज़माने हो गए
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