Sher 12
उससे इक-तरफ़ा मोहब्बत का सिला यूं मिला यारों,
अज़िय्यत, शर्रिय्यत, फ़ज़ीहत मिली और तो कुछ भी नहीं।
अज़िय्यत, शर्रिय्यत, फ़ज़ीहत मिली और तो कुछ भी नहीं।
न शराफ़त उसने छोड़ी, न जिस्म की नुमाइश की,
एक दौलतमंद ने हरगिज़ न दौलत की आज़माइश की।
उसने मेरी वफ़ा का तमाशा बना दिया,
मैं समझा कि मोहब्बत महफ़ूज़ हाथों में है।
मालूम है मेरे दिल की दहलीज़ तक उसे,
लेकिन अड़े हैं ज़िद पे कि हम पुकार लें उसे।
कल जितनी गरमी थी, आज उतनी ही नरमी है,
वो दौर बहाव का था, ये दौर ठहराव का है।
मेरी ख़ुश्क आँखों ने बदलता दौर देखा है,
हमने कुछ और देखा था, तुमने कुछ और देखा है।
हमने कुछ और देखा था, तुमने कुछ और देखा है।
उफ़! मोहब्बत भी बहुत मजबूरियों का सौदा है,
हर सूरत दिल को दिल से बदलना पड़ता है।
इस तरह से लोग अपना फ़र्ज़ निभा रहे हैं,
बातों से पेट भर रहे हैं, आँसू पिला रहे हैं।
हम शायरों को पेड़ गिनना भी जरूरी है
हमारी हदे सिर्फ आम खाने तक तो नहीं
जी का क्या है, कहीं भी लगा बैठेंगे
हाथ उसने बढ़ाया तो मिला बैठेंगे
मुझे यही इक मरज़ लगा रहता है
तेरा ख़याल मेरा फ़र्ज़ बना रहता है
कर तालीम की तामील में हर शख़्स झुका करे
आलम-ए-तमाम क़ायल हो तेरे ख़याल का
हम उजालों को बढ़ाते जा रहे हैं
अंधेरे सिर को धुनते जा रहे हैं
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