Sher (मुकम्मल)

तुझे अपने दिल में बसा रखा है,
खज़ाना जहाँ से छुपा रखा है।
​ज़माना खड़ा है खिलाफ़ अब मेरे,
मगर हाथ तुझसे मिला रखा है।

सबके हिस्से हिस्से-दारी होनी चाहिए
सबकी चादर-ओ-दीवारी होनी चाहिए
बर्तन खाली चूल्हा ठंडा ही सही
आँखों में 'सत्यं' ख़ुद्दारी होनी चाहिए

ज़ख़्म मेरे अब मुस्कुराने लगे
वो हमें और भी आज़माने लगे
​सजाए उसने फूल अपने बालों में
भँवरे आगे-पीछे गुनगुनाने लगे

बदन में मचलती हरारत सी है,
तेरे वास्ते ये बशारत सी है।
इजाज़त हो बाहों में भर लूँ तुझे,
कि जागी तबीयत में शरारत सी है।

यूँ आसाँ नहीं होता, सच-झूठ समझ पाना
कई नक़ाब पड़े हैं, एक चेहरे पे आजकल

नादानी में जो लोग क़दम उठा लेते हैं।
पहचान की ख़ातिर पहचान गवाँ देते हैं,

तू भी छोड़ देना मुझे एक ज़माने के बाद,
उतर जाएगा नशा मेरा आज़माने के बाद।

चाहता हूँ ख़ुद से ही अब मैं रिहाई पाना,
छीन ली है एक शख़्स ने आज़ादी मेरी।

संभाला है ख़ुद को हमने क्या क्या देखकर
किया नहीं गुनाह कोई ख़ुद को तन्हा देखकर

हज़ार ग़म हैं और एक मुसीबत भी तो है,
जिसको चाहूं मैं, वही दूर चला जाता है।

क्यों लगाएं मैंने ये ख़्वाहिशों के मेले,
मालूम था जब ख़्वाब हक़ीक़त नहीं होते।

कैसे निकालूँ दिल से, बता तुझे ऐ सनम
मैंने तो दर-आए को भी गले लगाया है

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