Sher (✓)

मुश्किल है बड़ा सच-झूठ का खेल समझ पाना,
कई नक़ाब पड़े हैं एक चेहरे पे आजकल।

​नादानी में जो लोग क़दम उठा लेते हैं,
पहचान की ख़ातिर पहचान गँवा देते हैं।

चाहता हूँ ख़ुद से ही अब मैं रिहाई पाना,
छीन ली है एक शख़्स ने आज़ादी मेरी।

संभाला है ख़ुद को हमने क्या क्या देखकर
किया नहीं गुनाह कोई ख़ुद को तन्हा देखकर

हज़ार ग़म हैं और एक मुसीबत भी तो है,
जिसको चाहूं मैं, वही दूर चला जाता है।

क्यों लगाएं मैंने ये ख़्वाहिशों के मेले,
मालूम था जब ख़्वाब हक़ीक़त नहीं होते।

कैसे निकालूँ दिल से, बता तुझे ऐ सनम
मैंने तो दर-आए को भी गले लगाया है

​तू भी छोड़ देना मुझे एक ज़माने के बाद,
उतर जाएगा नशा मेरा आज़माने के बाद।

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