Ghazal (✓) अब और क्या बाकी रहा कमाने में




उलझ कर शाम वो मेरी, ढली है एक ज़माने में,
भटकते ही रहे हम तो, इसी शहर-ए-पुराने में।

​मुक़द्दर से मिला जो भी, उसे हँस कर क़ुबूल तू कर
गँवा मत ज़ीस्त को अपनी, यूँ नादाँ आज़माने में।

​सजाया शौक़ से हमने भी इक उतरन को बदन पर,
ज़माना ढूँढता है अब सुकून बस नए-पुराने में।

​सिरहाने थे जो मेरे दो चराग़ाँ कर रहे उजाला,
अँधेरे कामयाब आख़िर हुए हैं मुझे रुलाने में।

गुनाहगारों से अब जो है भरा यह शहर सारा ही,
लगा है हर कोई बस दूसरों की कमी गिनाने में।

​यह सिलसिला पुराना है, कोई आज की बात नहीं,
है आफ़ताब से ही रोशन महताब हर ज़माने में।

नशा है साहिबे मसनद पे यूँ झूठी हवाओं का,
नादान लगे हैं यहाँ, मुरझाए गुल खिलाने में।

​मुक़द्दर भी संवारें उनके और सबको साथ रक्खा,
बता अब और क्या बाक़ी रहा सत्यम कमाने में

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