Sher (शरारत)




अपनी ख़्वाहिशों को यूं ना आज़माया कर
कभी भीगने का मन हो तो भीग जाया कर

तेरे बदन की शायरी में तमाम हरूफ बड़े कटीले हैं
मैं शायर बड़ा गठीला हूं इज़ाज़्त दो कुछ अपना लिखूं

हमें यूं लगा कि मोहब्बत का जमाना है फरवरी
रोज़ ले लिया उसने पर रोज़ देने से मना कर दिया

अब मैं अपने होठों को प्यासा नहीं रखता
कई सहराओं से गुज़रा हूं दरिया तक आने में

तेरे बदन पे जहाँ तिल है
जानेमन, वहीं मेरा दिल है

बेशक तू किसी से भी प्यार कर
पर मुझे उस चीज से मत इनकार कर
ता-उम्र साथ देना ना देना तो तेरी मर्जी है
पर जरूरत के वक्त तो मत इनकार कर

यह आलम शहनाई का होता तो अच्छा होता
हिसाब जज़्बातों की भरपाई का होता तो अच्छा होता
कमबख्त कंबल की आग भी अब बुझने लगी
इस सर्दी इंतजाम रजाई का होता तो अच्छा होता

ये सर्द रातें गरमा जाए तो क्या हो
तन्हाई मेरी महक जाए तो क्या हो
मैं तसव्वर में पढ़ रहा हूं हर-रात जिसे
वही किताब हकीकत बन जाए तो क्या हो


यही कमबख्त महीना था फरवरी
इन्हीं दिनों छोड़ गई थी मुझे वो **मरी



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