Ghazal (मुकम्मल) इस बहार में नख़रे

इस बहार में नख़रे मुरझाए गुल पे आ गए,
हमसे हुई ग़लती कि हम खुल के आ गए।

जो उठाए थे सिर पे गुनाहों का बोझ वो,
जा मिले हुकूमत से पाक धुल के आ गए।

उसके दिल में पले-बड़े ख्व़ाब बग़ावत के,
जुबाँ से अल्फ़ाज़ के सहारे घुल के आ गए।

एक हुजूम था मगर कोई भी अपना न था,
ग़ैर के साथ ग़ैर से ही मिलजुल के आ गए।

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