Sher 5 (बहर ए मीर)

-- बहर ए मीर --

बादलों उसके भी घर जा कर बरसो
याद मिरी उस बेख़बर को भी तो आए

वह बेरुखी करते हैं मुझसे जाने क्यों
जिसे करीब से तमन्ना देखने की है

जिनका घर है दिल मेरा वो दूर जा बैठे
भला कैसे किसी अजनबी को मैं पनाह दूं

तमाम कोशिशें बेकार ही रही संभल पाने की
जब डूब गए हम तेरी आंखों की गहराई में


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