धीरे धीरे
तुम चाहोगे निकालना तो फंस जाओगे धीरे-धीरे
इश्क़ है यह जनाब शराब की क्या बिसात
चढ़ गया है नशा तो अब उतरेगा धीरे-धीरे
इत्तेदा ए ज़िंदगी में आते हैं उतार-चढ़ाव बहुत
तपिश में तजुर्बे की जल संभल जाओगे धीरे-धीरे
दबाई गई है कईं आवाज़ें मज़हब की आड़ में
कईं औरत उठाने लगी है सिर अपना धीरे-धीरे
खूबसूरती देखने वाले की नज़र में होती है सत्यं
ये बात समझनी चाहिए हर नाज़नीं को धीरे-धीरे
हमने अभी सपने बोएं है जिंदगी नइ बोई
कोई मिल जाए हमसफ़र तो बसा लेंगे घर धीरे-धीरे
मेरे जेहन पे छाया है खुमार तेरी मुहब्बत का
काश! तू भी तड़प उठे मेरी मुहब्बत को धीरे-धीरे
.jpeg)
Comments
Post a Comment