Sher 8 (मुकम्मल)

अपने कमरे में मैंने रूठा हुआ आईना देखा
अक़्स अपना देख कर सोचा यह किसको देखा

देख कर साज़िश मेरे जिस्म‑ओ‑मिज़ाज की
होंठ तो चुप ही रहे, आँखों को गवारा न हुआ

जिसने मेरी आँखों से आँसू उतारे हैं
मैं भी अपनी नज़र से उतार दूँगा उसे

क्या सुनाएँ तुमको दास्तान-ए-दिल  
हम तो जीते जा रहे हैं ख़्वाहिशों के सहारे

इक दरिया को नाज़ था अपनी रवानी पर
समंदर से जो मिला, उसका गुमान खो गया

इश्क़, प्यार, मोहब्बत, उल्फत, प्रेम सब में आधा हरफ़ है
फिर मैं कैसे उम्मीद करूँ उससे मुकम्मल मोहब्बत की।

एक परिंदा हूँ, मुझे आज़ाद ही रहने दो
ज़ुल्फ़-ओ-दामन से मेरा वास्ता ही क्या

मैं तपती ज़मीं हूँ, तू बादल है जानाँ  
तू आए तो बरसे, मेरी प्यास बुझ जाए

किसी से मिलना कभी इत्तेफ़ाक़ होता नहीं
वही होता है जो ख़ुदा ने लिखा होता है

Comments

Popular posts from this blog

भारत की माता ‘शूद्र’ (लेख)

अंबेडकर और मगरमच्छ

Ghazal (मुकम्मल) इश्क़ में यार अपने ही बेगाने हो गए