Ghazal (मुकम्मल) मेरी तबीयत में बरकत हो गई है

















मेरी तबीयत में बरकत हो गई है
चुनाँचे सबको वहशत हो गई है

मेरी तारीफ़ से ख़ुद-मंसूब मसीहा को
मेरे रुतबे से ही दिक़्क़त हो गई है

वो जो करता था मोहब्बत से किनारा
उसी शख़्स को पाने की हसरत हो गई है

वफ़ा करके भी जो सहते रहे जुदाई
उन्हीं जैसी अब मेरी क़िस्मत हो गई है

जो कल तक था सभी का ही चहीता
उसी को आज ख़ुद से नफ़रत हो गई है

तलाशा हमने सुकून-ए-दिल बहुत ही
प्यारी तेरे लबों की लज़्ज़त हो गई है

क्या करूँ मैं तेरी कम-सिन जवानी का
मुझ पे अब ख़ुदा की रहमत हो गई है

अमीर-ए-शहर को सौंप दी सब विरासत
वतन की बदतर हालत क़ुदरत हो गई है

दैर-ओ-हरम में ढूँढते हैं हम ख़ुदाओं को
मगर इंसाँ को इंसाँ से नफ़रत हो गई है

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