Ghazal (मुकम्मल) दिल पर हमारे ज़ख़्म इक

दिल पर हमारे ज़ख़्म इक गहरा बना दिया,
शहर-ए-वफ़ा जला के सहरा बना दिया।

देखा जो उस तरफ़ तो जन्नत नज़र आई,
मेरी हँसी पे उसने पहरा लगा दिया।

​परवाज़ जिसकी अर्श की हदों को छूती थी,
सैयाद की निगाह ने पिंजरे में ला दिया।

​दुनिया को वो गिनाता रहा मेरी ख़ामियाँ,
उल्फ़त में जिसके सामने सर को झुका दिया।

​उसकी नज़र से ही तबीयत में थी बहार,
फेरी नज़र तो दिल को वीराना बना दिया।

​घबरा के रात ख़्वाब से हम यूँ ही जग गए,
इक संग-दिल ने जान पे सदमा लगा दिया।

​सबको लगा कि मुझपे है साये का बद-असर,
हम प्यार में थे पागल कि ख़ुद को भुला दिया।

​सोचा न था इस मोड़ से गुज़रेंगे हम 'सत्यं',
हँसते हुए इंसान को मुर्दा बना दिया।

​आया न लब पे नाम कभी मेरे इश्क़ का,
साहिल पे ख़ुद खड़ा रहा, मुझको डुबा दिया।


221 / 2121 / 1221 / 212

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