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अंधेरे का सूरज (ग़ज़ल) मुकम्मल

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अंधेरे का सूरज निकाला जा रहा है، संभले हालात को संभाला जा रहा है। सच को हर सूरत छुपाया जाता है، झूठ का अख़बार निकाला जा रहा है। कट रही उँगलियाँ, नोचे जा रहे जिस्म، ग़रीब को दहशत में ढाला जा रहा है। मौसम की नज़ाकत समझो दौर-ए-हाज़िर में، पगड़ियों को सरे-आम उछाला जा रहा है। कल उँगली पकड़ जिनके यतीम बड़े हुए، उनकी परवरिश में नुक़्स निकाला जा रहा है। कई साँप जकड़े हैं इस सोने की चिड़िया को، पालने वाले पर इल्ज़ाम डाला जा रहा है। रखो नज़र दहलीज़ पर ये दौर तुम्हारा है، हमारी पुरानी आँखों का उजाला जा रहा है। मिसाले-मोहब्बत इस क़दर करो क़ायम، जो देखे यही कहे—हिंदुस्तान वाला जा रहा है।