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Showing posts from September, 2025

Sher 9 (मुकम्मल)

ग़ज़ल उगती नहीं हरगिज़ बंजर ज़मीन से, यह क़सीदा तजुर्बे के हाथ से बुना जाता है माँगी   जा   रही   है   राय   मेरे   बारे   में , ग़लत   आदमी   मुझे   ग़लत   बता   रहे   हैं । मुफ़लिसी में मोहब्बत का अंजाम यूँ हुआ मैं चलता रहा और  फ़ासले  बढ़ते गए यह फ़र्क तो इंसानी नज़रिये का है सत्यं, वरगना हिदायत-ए-क़ुरआन-ओ-पुराण में ज़रा भी फ़र्क नहीं। बहुत ज़ालिम है दुनिया, ज़रा किनारा करो, खिलते चेहरों से यह हँसी चुरा लेती है। हाँ, ये झूठ है कि मैं तुम पर मरता हूँ, तुम सच को तो सच मानने से रहे। कोई सिमट जाए मेरी सूनी बाहों में, है कोई दुनिया में बदनाम होने वाला? मैं समझता था वो समझता है मुझे, कौन खुदगर्ज भला समझता है मुझे। बस यही फ़लसफ़ा सर उठाए हुए हैं हम, मोहब्बत से, ज़माने से शिकस्त खाए हुए हैं हम।

Ghazal 8 (मुकम्मल) इस बहार में नख़रे

इस बहार में नख़रे मुरझाए गुल पे आ गए, हमसे हुई ग़लती कि हम खुल के आ गए। जो उठाए थे सिर पे गुनाहों का बोझ वो, जा मिले हुकूमत से पाक धुल के आ गए। उसके दिल में पले-बड़े ख्व़ाब बग़ावत के, जुबाँ से अल्फ़ाज़ के सहारे घुल के आ गए। एक हुजूम था मगर कोई भी अपना न था, ग़ैर के साथ ग़ैर से ही मिलजुल के आ गए।