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Sher (मुकम्मल) एक कलाम सत्यं के नाम

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ये मंज़र भी किसी दिन मैं दिखाऊँगा उसे किसी जाँबाज़ से रू-ब-रू कराऊँगा उसे ​अभी तो हुक्म का इक्का छुपा है आस्तीं में ज़रूरत पड़ गई तो फिर खेल जाऊँगा उसे ख़ुदग़र्ज़ हैं वो लोग जो एहसान भूल गए लड़ा था जिनके वास्ते, वो इंसान भूल गए आँधियों से ये कहो कि अपनी हद में ही रहें शराफ़त हमनें क्या दिखाई, औक़ात भूल गए। दुश्मन को भी नज़र-ए-इनायत देते हैं हम गुस्ताख़ी पे उसकी ख़ुद ही पर्दा देते हैं हम शर्मिंदा ही रहेगा जब भी सामना होगा इज़्ज़त उसकी उसी की नज़रों में गिरा देते हैं हम पूछ कर गुज़री वो दास्ताँ, सत्यं इक शायर को रुलाने का ख़याल अच्छा है मैं अब किसी से कोई उम्मीद नहीं रखता मेरे मयार के मुताबिक कोई मेरी नज़र में नहीं जिल्द देखकर भला क्या साबित करोगे तुम बंद किताबों पर कोई फ़ैसला नहीं लिया जाता कभी बे-बात सुनना, कभी छुप कर रोना इतना आसान नहीं है, सत्यं होना दुश्मन को भी मोहब्बत की सज़ा देते हैं हम नज़र में उसकी अपनी दीद शर्मिंदगी बना देते हैं हम जिनका दिल है घर मेरा, वो दिल के अंदर हैं अभी और बहुत हैं चाहत, ऐसे दीवानों के पैदाइशी शौक़ है ख़तरों से खेलना होते रहे सामना, सो मोहब्बत कर ली इ...