नज़्म/Nazm (आज़ाद) मुस्कुराहट पे मेरी पहरा बैठा दिया
बैठा हुआ था सुकूँ से इक साए तले मैं,
किसी ने जला दिया घरौंदा, सहरा बना दिया।
कभी उस तरफ़ जो देखा तो जन्नत नज़र आई,
किसी ने मेरी मुस्कुराहट पर पहरा लगा दिया।
अर्श की बुलंदी पे था इक तेज़-परवाज़ कभी,
एक सैय्याद की निगाहों ने पिंजरे में ला दिया।
पीठ पीछे वो मेरी ख़ामियाँ गिनता रहा,
मोहब्बत में जिसके आगे सिर अपना झुका दिया।
उसकी नज़र से, मेरी तबीयत में बहार रहती थी
फैर ली आंखें उधर, इधर वीराना बना दिया
हम घबराकर ख़्वाब से आधी रात में जगते हैं
एक सगंदिल ने, जां पे मेरी सदमा लगा दिया
ख़्वाब अच्छे देखने का तो मुझको भी हक़ है
फिर क्यों मेरे जज़्बात को उसने दबा दिया
सबको लगा मुझपे किसी साए का असर है,
उसके प्यार में पागल थे, ख़ुद को भुला दिया।
सोचा न था इस मोड़ से भी गुज़रेंगे हम, सत्यं,
हँसते हुए इक इंसान को मुर्दा बना दिया।
कभी नाम भी न आता था मेरे लब पे मोहब्बत का,
वो ख़ुद साहिल पे खड़ा रहा, मुझको डुबा दिया।

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