वो जा चुका है (ग़ज़ल) मुकम्मल
वो जा चुका है अपनी गिरफ़्त से निकल के,
हम ही उलझे रह गए जाल में सिर डाल के।
वैसे तो वो ग़ैर से भी खुल के मिलता है,
हम ही आदमी न निकले उसके ख़याल के।
उसका रिश्ता फ़क़त सफ़ेद-झूठ पर टिका था,
कैसे मुकम्मल देता जवाब हर सवाल के।
उस बे-मुरव्वत ने बेरुख़ी की हदें कर दीं,
हम देखते रहे तमाशे उसके कमाल के।
उम्र-भर की चाहत का बदला यूँ मिला हमको,
हिस्से में आए क़िस्से बस उसके मलाल के।
अब जो मिला है तजुर्बा उसे खोकर ये जाना,
मोहब्बत में उठते हैं क़दम बहुत सँभाल के।

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