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उद्धरण (quotation)

आत्म-संयम हेतु बुद्ध की शिक्षाएं ली है तो आत्म-सम्मान हेतु युद्ध की शिक्षाएं भी ली है मन विजय हेतु बुद्ध की शिक्षाएं ली है और  जन विजय हेतु युद्ध की शिक्षाएं ली है 

धीरे धीरे

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राहे-उल्फ़त में क़दम ना ज़ल्दबाज़ी में बढ़ा तुम चाहोगे निकालना तो फंस जाओगे धीरे-धीरे इश्क़ है यह जनाब शराब की क्या बिसात चढ़ गया है नशा तो अब उतरेगा धीरे-धीरे इत्तेदा ए ज़िंदगी में आते हैं उतार-चढ़ाव बहुत तपिश में तजुर्बे की जल संभल जाओगे धीरे-धीरे दबाई गई है कईं आवाज़ें मज़हब की आड़ में कईं औरत उठाने लगी है सिर अपना धीरे-धीरे खूबसूरती देखने वाले की नज़र में होती है सत्यं ये बात समझनी चाहिए हर नाज़नीं को धीरे-धीरे हमने अभी सपने बोएं है जिंदगी नइ बोई कोई मिल जाए हमसफ़र तो बसा लेंगे घर धीरे-धीरे मेरे जेहन पे छाया है खुमार तेरी मुहब्बत का काश! तू भी तड़प उठे मेरी मुहब्बत को धीरे-धीरे

Ghazal 4 (मुकम्मल) अलग सोच ज़माने की

अलग सोच ज़माने की बना लेनी चाहिए, उठे जो भी सदाएँ, वो दबा देनी चाहिए। ज़रूरी नहीं शमशीर क़त्ल को ही उठे, दहशतगर्दी को भी लहरा देनी चाहिए। अँधेरों से जो लड़ते हैं, वही लाते हैं सहर, सदा सबको मिलकर उठा देनी चाहिए। फ़क़त बातें नहीं, हौसला भी चाहिए, अमल की राह आसान बना देनी चाहिए। मुहब्बत के चराग़ों से सजे हर एक दिल, ये नफ़रत की हवाएँ बुझा देनी चाहिए। ग़रीबों की दुआएँ ही ख़ज़ाना हैं असल, लागत चाहे जो भी हो उठा लेनी चाहिए। सत्यं इस दौर में इंसानियत की ख़ातिर, कलम को आज तलवार बना देनी चाहिए।