भुला नहीं सका जिसे - कविता
मैंने देखा था उसे भुला नहीं सका जिसे।
नैंनों से क्षणभर औझल नहीं किया जिसे।।मुझें अच्छी तरह याद है, वो दिन का पहर
घन थे गगन मे उमड़े, शीतल थी दोपहर।
मनमोहक, आकर्षक वातावरण था और
मंद गति में वायु लहरत-लहर
मैंने देखा था उसे ---------------------------
मिली एक युवती मुझे लड़कियां काटते हुए
शांत, सरल स्वभाव से कार्यरत होते हुए।
मुख-मंडल पर ओज था, लीन थी
मुख-मंडल पर ओज था, लीन थी
कर्म अपना कर्त्तव्य समझते हुए।।
मैंने देखा था उसे ---------------------------
प्रसन्नचित आँखें, आकर्षण परिपूर्ण
युवा अवस्था में प्रवेश पाया था।
सावल तन में योग्यता थी और
यौवन सिर मंडराया था।।
मैंने देखा था उसे ---------------------------
आकर्षक रूप, संस्कार का पहरा था
आँखें सुंदर, रंग झील-सा गहरा था।
ना मिला कोई उसके समरूप
व्यर्थ संसार यह सारा था।
मैं वृक्ष की छाँव से उसे निहार रहा था
देखा मुझे तो स्वयं में सिमटने लगी।
नैंन झुकाएं, दृष्टि बचाई
तदोप्तरांत कार्य करने लगी।।
मैंने देखा था उसे ---------------------------
व्यर्थ संसार यह सारा था।
मैंने देखा था उसे ---------------------------
मैं वृक्ष की छाँव से उसे निहार रहा था
देखा मुझे तो स्वयं में सिमटने लगी।
नैंन झुकाएं, दृष्टि बचाई
तदोप्तरांत कार्य करने लगी।।
मैंने देखा था उसे ---------------------------
आज भी स्वप्न में, मैं देखता हूँ उसे
मेरे पहले प्रेम ने चुना था जिसे।
ये जाति-धर्म ही ना झुक सकें
हृदय न्यौछावर तो कर दिया था उसे ।।

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