Ghazal (✓) धीरे-धीरे
शिकस्ता इरादों को हिम्मत मिली धीरे-धीरे, उठाने लगीं सर जो कल तक दबीं धीरे-धीरे तमन्ना की धरती पे बोया है इक ख़्वाब, मिले हमसफ़र तो बसा ही लेंगे घर धीरे-धीरे। निगाहों का मेयार ही हुस्न तय करता है बस समझ जाएगी बात हर नाज़नीं धीरे-धीरे। मिरे दिल पे तारी ख़ुमार-ए-मोहब्बत, असर तुझ पे भी काश आए नज़र धीरे-धीरे।