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Showing posts from 2022

किस्मत किसी शख़्स को आजमाती नहीं

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हर आदमी को वहशी दरिंदा ना समझो हर औरत भी औलाद को कोठे पे बैठाती नहीं दुनिया उजाड़ने में हवा का किरदार बड़ा होता है चिराग की लौ ही अकेले घर को जलाती नहीं इन दिनों मेरा ही काम सबसे मुश्किल लगा मुझे मैं बेरोज़गार हूं रोज़गार पे दुनिया बुलाती नहीं हर शख़्स इस दुनिया में किस्मत को आजमाता है कभी किस्मत किसी शख़्स को आजमाती नहीं यूं ही न जमाने ने उसे खुदा का खिताब दिया मां खून पिलाती है अपना भूखा सुलाती नहीं अपने गुनाहों की तौबा ख़ुदा से राब्ते में कर मैदान ए हश्र में फ़रियाद काम आती नहीं कितने ही सावन बीत गए प्यास अधूरी लगती है इश्क की आग है एक पल में तो बुझ पाती नहीं यूं तो सभी ग़ज़ल मैंने उसकी तारीफ़ में लिखी पर कोई भी मुकम्मल त'अर्रुफ़ कराती नहीं

दिल पे बोझ बना रहता है

लो खुद ही देख लो मेरे मिट्टी से रंगे हाथ मुफलिसी में कब हाथ साफ़ बना रहता है देखना ये है के तहज़ीब से उमर कौन बसर करें जवानी आने का जवानी जाने का दौर तो लगा रहता है सियासत में कौन हमेशा हुक़्मरां रहा यहां आना जाना फ़न्ने खां का लगा रहता है दौरे इश्क में गिरकर ही संभलना पड़ता है कौन इस मैदान में हर रोज़ खड़ा रहता है बेगुनाह परिंदों को यूं ही ना गिरफ़्तार करो क़ैद की एक रात का सदमा उमर भर लगा रहता है बेफ़िक्री से ना रिश्तों को लहूलुहान किया करो जख़्म ऊपर से भर भी जाए अंदर से हरा रहता है कोई कितना भी  उस क़ौम को छोटा समझे भूल करे जो फितरत से बड़ा हो बड़ा रहता है कभी जो फुर्सत मिले वालिद के दामन में बैठा कर वक्त गुजर जाए तो दिल पे बोझ बना रहता है

दौर ए बेरुख़ी

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मैं गुनाहगार नहीं और तुमको एतबार नहीं फिर सोचना कैसा तोहमत जो चाहे लगा दो मैं जानता हूं के इल्ज़ाम यूं ही सिर नहीं रखते कोई सुबूत नहीं मेरे ख़िलाफ़ तो झूठा ही बना दो ग़र बदनाम ही है करना मुझ अमन-परस्त को शराब हराम है तुम मुझे शराबी बता दो इश्क मेरा मज़हब इश्क ही मेरा इमां इश्क करना है जुर्म तो जो चाहे सज़ा दो तू है जुदा मुझसे मैं भी जुदा तुझसे बरसों से थे एक जां अब ऐसा ना सिला दो इंसान को इंसान की अब ज़ियादा जरूरत है तेरे मेरे बीच की इस दूरी को मिटा दो यूं तो लड़ाना आपस में सियासत का काम है मज़हब नहीं सिखाता यह सबको बता दो यही तो कमाल है हिंदुस्तां की मिट्टी का जो भी झुक के चूम ले उसे सीने से लगा लो

मैं, मित्र और महबूब

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यह कहानी मेरी किशोरावस्था की है, जिस समय मेरी उम्र 16 वर्ष थी। उन दिनों मैं पढ़ाई करने के साथ-साथ एक फैक्ट्री में अपने एक मित्र जिसका नाम विपिन था के साथ काम करने भी जाया करता था। नौकरी से जो पैसा मिलता था उससे मैं अपनी पढ़ाई व रोजमर्रा का पॉकेट खर्च निकालता था। मैं और मेरा मित्र फ़ैक्ट्री तक 2-3 किलोमीटर का रास्ता पैदल चल कर ही जाया करते थे। दिन में जैसे ही दोपहर 1ः00 बजे लंच टाईम होता था तो हम दोनों जल्दी से खाना खाते और उसके बाद बाहर टहलने निकल जाते, जो कि हमारी रोज़ की आदत में शामिल था। वैसे तो हमें उस कॉलोनी की ज्यादा जानकारी नहीं थी इसलिए हम अधिक दूर तक नहीं जाया करते थे। मेरे मित्र को तंबाकू खाने की आदत बनती जा रही थी इसलिए वह कॉलोनी की पास की एक दुकान पर भी जाया करता था। हम दोनों दोपहर लगभग 1ः30 बजे रोज़ एक गली से गुजरते और वापिस आकर फिर से काम पर लग जाते थे। लगभग डेढ़ महीना तक ऐसे ही चलता रहा। एक दिन की बात है हम उस गली से गुज़र रहे थे कि तभी विपिन ने अचानक तबाकू की पुड़िया निकाली और उसे तुरंत दांतो से काटकर मुंह में डालते हुए आहिस्ता-आहिस्ता मुस्कुराने लगा। मैंने जैसे ही अपनी गर्दन ...

Quotation । उद्धरण

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मनुष्य जिस बात को सहजता से जान लेता है उसे साधारण मान लेता है और जो बात उसकी तार्किक क्षमता से परे होती है उसे चमत्कार मान लेता है। वेद-पुराणों के अनुसार कोई भी जीवित व्यक्ति स्वर्ग नहीं जा सकता। फिर कुछ जीवित धूर्त बाबा जिन्होंने खुद तो स्वर्ग देखा नहीं परंतु लोगों को रास्ता कैसे दिखा रहे हैं? ------------------------------- शरीर में जब दवा असर ना करें तो समझ लेना चाहिए कि रोग शारीरिक नहीं मानसिक है ना कि अलौकिक। ------------------------------- ।। डेढ़ मिनट पानी का नियम ।। पहले 30 सेकंड तक ज़मीन पर बैठे रहे फिर 30 सेकंड तक पानी पीए और फिर 30 सेकंड बाद खड़े हो जाएं। ------------------------------- ।। चार धाम यात्रा क्यों कराई जाती है?।। * इसलिए नहीं कि तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा, बल्कि इसलिए ताकि मनुवादियों का व्यवसाय व व्यवस्था चलते रहें। ------------------------------- मनुवाद में संख्या 3 व 8 को अशुभ क्यों माना जाता है? * संख्या ३ : क्योंकि बौद्धों की ३ पवित्र पुस्तकें त्रिपिटक हैं। * संख्या ८ : क्योंकि बौद्धों के ८ मार्ग हैं जिन्हें अष्टांग मार्ग कहते हैं। --------------------------...

अंबेडकर और मगरमच्छ

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यह वास्तविक घटना दिल्ली के आर. के. पुरम गांव की है। गांव में एक व्यक्ति रहता था जो कि बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी का बहुत बड़ा अनुयाई और भक्त था। वह सुबह सवेरे उठता तो सबसे पहले बाबा साहब की प्रतिमा को नमन करता था। दिन के किसी भी पहर जब भी वह किसी अन्य व्यक्ति से मिलता तो उसे "जय भीम" बोलकर सत्कार किया करता था। उसने बाबा साहब की अनेकों किताबों का अध्ययन कर बहुत बड़े पैमाने पर ज्ञान अर्जित किया था। बाबा साहब के विचार सदैव उसके मस्तिष्क पर छाए रहते थे। एक रात की बात है जब वह गहन निद्रा में सोया हुआ था तो उसने एक सपना देखा जिसमें उसने ख़ुद को एक तालाब के किनारे पाया। उसने जैसे ही तालाब के अंदर पानी पीने के लिए अपना एक पैर रखा तो वहां पहले से ही घात लगाएं बैठे एक मगरमच्छ ने उसका पैर अपने जबड़े में दबोच लिया और धीरे-धीरे पानी के अंदर खींचने लगा। अब वह बहुत ज्यादा घबरा गया, उसे कुछ नहीं सूझ रहा था। उसने अपना पैर छुड़ाने का बहुत प्रयास किया परंतु असमर्थ रहा। पीड़ा ज्यादा होने के कारण उसके मुंह से एक आवाज़़ निकली "हे! बाबा साहब मुझे बचाओ।" इतना कहते ही बाबा साहब हाथ मे...

भारत और भरत?

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कईं मिथक प्रमाणों के आधार पर हमें यह पढ़ाया जाता है कि हमारे देश भारत का नाम राजा सर्वदमन यानी भरत के नाम पर पड़ा। जहां वह पैदा हुए थे वह जगह अब अफगानिस्तान में है।  व्याकरणिक दृष्टि से देखा जाए तो भरत के नाम पर पड़ने के कारण तो इसका नाम भरतवर्त, भरतपुर, भरत नगरी, भरत विहार आदि होना चाहिए था। मुझे सचमुच बहुत आश्चर्य है कि कोई अपने नाम को क्यों विकृत होने देगा। "भ+र+त" नाम में वर्ण "भ" के साथ "भ+।" क्यों जोड़ देगा और इसे "भ+।+र+त" क्यों बना देगा। यह बात हर सिरे से अतार्किक लगती है। कुछ जातिगत लोग और धर्म के ठेकेदार आज भी ऐसे-ऐसे प्रयोग करते रहते हैं। मैं आपको एक उदाहरण के माध्यम से समझाता हूं- "हमारा देश भारत एक पुलिंग शब्द है" लेकिन फिर भी कुछ लोग इसे भारत माता बोलते रहते हैं जो कि भाषाई व व्याकरणिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है। यदि बात वास्तविकता की करें तो भारत देश का नाम यहां आदिकाल से रहने वाली एक कबीलाई अनुसूचित जनजाति के नाम पर पड़ा है। "इस कबीलाई जाति का नाम ही भारत था, परंतु कुछ जालसाज लोगों ने भारत की वास्तविक संस्कृति या...