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Showing posts from 2024

समंदर से भी यार (ग़ज़ल) मुकम्मल

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समंदर से भी यार-यारी रखा करो, या पार जाने की तैयारी रखा करो। घर जाओ तुम तो आईना ज़रूर देखना, अपनी भी थोड़ी ज़िम्मेदारी रखा करो। संभलकर उड़ो आसमानों की ऊँचाई पर, शाहीन से भी अपनी पहरेदारी रखा करो। पेड़ लगाए हैं तो पत्थरबाज़ों से होशियार, कच्चे फलों पे भी निगरानी रखा करो। हमें ये पता चला कि वो बेवफ़ा है, आईने, तुम न यूँ जी-भारी रखा करो। घर के अंदर दग़ाबाज़ भी दुश्मन से कम नहीं, चिराग़ों पे अपनी रोशनी सारी रखा करो।

वो जा चुका है (ग़ज़ल) मुकम्मल

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वो जा चुका है अपनी गिरफ़्त से निकल के, हम ही उलझे रह गए जाल में सिर डाल के। वैसे तो वो ग़ैर से भी खुल के मिलता है, हम ही आदमी न निकले उसके ख़याल के। उसका रिश्ता फ़क़त सफ़ेद-झूठ पर टिका था, कैसे मुकम्मल देता जवाब हर सवाल के। उस बे-मुरव्वत ने बेरुख़ी की हदें कर दीं, हम देखते रहे तमाशे उसके कमाल के। उम्र-भर की चाहत का बदला यूँ मिला हमको, हिस्से में आए क़िस्से बस उसके मलाल के। अब जो मिला है तजुर्बा उसे खोकर ये जाना, मोहब्बत में उठते हैं क़दम बहुत सँभाल के।

मेरे जाने के बाद | Mere jane ke baad (Ghazal)

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ये रास्ते, ये फ़िज़ाएं, यहीं रह जाएंगे, कल के लिए और रह जाएंगी मेरी यादें, मेरे जाने के बाद हमें कमसिनी में घर से निकाला गया था, बे-कसूर मेरे वालिद ने ये बताया था, जी भर आने के बाद तुम्हें आंख भरके कोई ना देखेगा, ज़माने में बहुत रुलाएंगी कुछ बातें, मां-बाप गुजर जाने के बाद अब वो बद-मिज़ाज बर्दाश्त की हद से गुजरने लगा आ गया है सलीक़ा उसे, बेटी घर आ जाने के बाद मैंने भी अब अपने दिल को, पत्थर का कर लिया मयख़ाना चला जाता हूं, उसकी याद आ जाने के बाद मैं अक्सर सोचता हूं, कोई ग़ज़ल अपने हालत पे लिखूं मोहब्बत ही लिख जाता है, कलम हाथ में आ जाने के बाद यह जो गुरूर है मेरा, तेरी बेरुख़ी पे टिका है उतर जाता है नशे-सा, मोहब्बत से बुला लेने के बाद उलझ-उलझ-सी गई ज़िन्दगी, सबको अपना कहते-कहते आसान बनाया है इसे, सबको औकात पे लाने के बाद पुरानी ईट सही हम के बे-कद्री से ना फेंक हमें ही अलग कर रहे हो, हमसे सर छुपाने के बाद

तेरे जाने के बाद (नज़्म) Nazm

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सोचा ना था मैं बिखर जाऊंगा, तेरे जाने के बाद आज फिर याद आ रहा है तू, तेरे जाने के बाद फिर ग़म ने ली है करवट, तुझे भूलाने के बाद हम अक्सर रोते हैं तन्हाई में, तेरे जाने के बाद  सफ़र तन्हा ही है हमारा, तेरा ना आने के बाद दिन-सहरा रात-क़यामत है, तेरे जाने के बाद उठते हैं दुआ में हाथ मेरे, याद तेरी आने के बाद बिगड़ते जा रहे हैं हालात मेरे, तेरे जाने के बाद रुला गया तू उम्रभर को, एक-पल हंसाने के बाद बे-दिली ओढ़ ली है मैंने, तेरे जाने के बाद

अब और क्या बाकी रहा कमाने में

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उलझी-सी एक शाम मेरी ढली है कई ज़माने में हम खोए हुए थे बरसो से उस शहर पुराने में वो जैसा भी है उसे वैसे ही क़ुबूल कर जिंदगी रूठ जाती है, बेवजह आज़माने में हमने उतरन को भी बदन पे शौक़ से औढ़ा दुनिया सुकून ढूंढ रहा थी, नए पुराने में मेरे सिरहाने पर दो चिराग कर रहे थे उजाला अंधेरे कामयाब हो गये मुझे रुलाने में गुनहगारों से भरा यह जो शहर है यहां हर-एक लगा है, दूसरे की कमी गिनाने में ये सिलसिला कोई कल की बात तो नहीं माहताब रोशन है आफ़ताब से, हर ज़माने में साहिब-ए-मसनद को गुमां है, झूठी हवाओं पे लगे हैं नादान, मुरझाएं गुल खिलाने में मैंने रिश्ते संजोए, मुक़द्दर संवारे, सबको साथ रखा अब और क्या बाकी रहा कमाने में

मजबूरियां शराफ़त को भी ले आती है बाज़ार में

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जरूरत कैसी-कैसी निकल आती है घर-बार में मजबूरियां शराफ़त को भी ले आती है बाज़ार में साथ रखना हमेशा बुजुर्गों को अपने ज़ंजीर रिश्तो की पड़ी रहती है परिवार में आज न जाने क्या ग़रज़ निकल आई परिंदा ख़ुद ही सर पटकने लगा है दीवार में यह कैसी सज़ा मुझें वो शख़्स दे गया जान बख़्श दी मेरी उस क़ातिल ने पलटवार में वज़ह ऐसी के अपने लबों पे चुप्पी रखता हूं मुझपे इल्ज़ाम कई लगे हैं मोहब्बत के कारोबार में इन ख़्वाहिशों के शहर में बह रही है आंधियां किशती साहिल पे आ जाएगी ग़र हिम्मत हो पतवार में

पहली बार का नशा रहता है

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क्या सितम है तेरे आने का ख़्याल बना रहता है तू मेरा है कि नहीं यही सवाल बना रहता है तेरे चेहरे में ऐसा क्या है ये तो मालूम नहीं फिर एक तुझपे ही क्युं मेरा ध्यान लगा रहता है जब कभी देखता हूं मैं पलट कर तुझे हर बार वही पहली बार का सा नशा रहता है लोग हंसते हैं मुझपे तेरा नाम ले लेकर ये क्या कम है, तेरे नाम से मेरा नाम जुड़ा रहता है उसकी आंखें सुर्ख़ बनी रहती है आजकल क्या वो भी मेरी तरह रातभर जगा रहता है लोग आते हैं ग़म भुलाते हैं चले जाते हैं यह मकान यूं ही वीरान बना रहता है अब समंदर भी मुंह देखकर पानी पिलाने लगा प्यासा आजकल बस किनारे पे खड़ा रहता है

बरसों की शनासाई

एक शख़्स की और मेरी  शनासाई है, लड़ाई है दुनिया की ना माने तो वो प्यार भी कर सकता है सुना है वो शख़्स कान का बहुत कच्चा है किसी ग़ैर की बातों पे एतबार भी कर सकता है अपने दिल की बात कहने से पहले कईं दफ़ा सोचो सामने वाला बेफ़िक्री से इंकार भी कर सकता है उससे इश्क में सब कुछ ला-हासिल लगा मुझे काम पे रखने से पहले ख़बरदार भी तो कर सकता है वो रहता है हमेशा दुश्मनों के साथ मिलकर वो चाहे तो मुझे होशियार भी कर सकता है उसी का हाथ है यारों साज़िश-ओ- नवाज़िश में वो साबित मुझे धोखे से गुनहग़ार भी कर सकता है अब यूं ना दिखाओ डर सैलाबों का सरफ़रोशों को जान हथेली पे हो जिसकी दरिया पार भी कर सकता है

तूफ़नों में दरिया में नाव चलानी पड़ती है

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कहां आसां होता है सफ़र, इक तरफा मुहब्बत का तूफ़नों में दरिया में नाव चलानी पड़ती है यूं ही नहीं बनता ख़ुदा, कोई किसी का मुहब्बत में बदले वफ़ा के उनसे वफ़ा निभानी पड़ती है किसी के दिल में उतरने का यही तो पहला क़दम है नज़रे दुनिया से बचाकर उससे नज़र मिलानी पड़ती है मुहब्बत की हिफ़जत करनी पड़ती है बड़ी फ़िक्री से छुपकर ज़माने से यह रस्म निभानी पड़ती है यूं ही नहीं आसानी से मिलता है कोई चाहने वाला किसी के दिल में बसने की कीमत चुकानी पड़ती है कईं बार वो छोड़ जाने को कहता है बीच राह में दर्द-ए-जिग़र से उसे आवाज़ लगानी पड़ती है भुला चुका हूं वैसे तो उसे दुनिया की नज़र में महफ़ूज़ हवा से रखकर यह समां जलानी पड़ती है के इश्क का अंदाज़ है क्या, किसी दिलदार से पूछो जलाकर खुद को जिंदगी उनकी रोशन बनानी पड़ती है

आशिक का इंटरव्यू (not completed)

 ( प्रत्यक्ष साक्षात्कार)  प्रश्न : पहले तो आप पाठकों को अपना नाम बताइए उत्तर :   "जी मेरा नाम आशिक है" प्रश्न : महिलाओं के बारे में आपके क्या विचार हैं उत्तर :  मैं महिलाओं की इज्जत बहुत करता हूं प्रश्न : महिलाओं से आप किस तरह का संबंध रखते हैं उत्तर :  महिलाओं से मेरा एक ही संबंध है और वो है यौन-संबंध।  प्रश्न : क्या आप फ्लाइंग सिख को जानते हैं उत्तर :  जी नहीं,  फ्लाइंग किस तो जानता हूं प्रश्न : कल रोज़-डे है। कैसी लड़की को रोज़ देना पसंद करेंगे?  उत्तर :  उसे, जो मुझे रोज़ देगी Aap mujhe kya bolna chahte ho  O lv u Nanga parvat 123... Sex 7 Mujhe strike Sare part dekhne hai

नज़्म/Nazm (आज़ाद) मुस्कुराहट पे मेरी पहरा बैठा दिया

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बैठा हुआ था सुकूँ से इक साए तले मैं, किसी ने जला दिया घरौंदा, सहरा बना दिया। कभी उस तरफ़ जो देखा तो जन्नत नज़र आई, किसी ने मेरी मुस्कुराहट पर पहरा लगा दिया। अर्श की बुलंदी पे था इक तेज़-परवाज़ कभी, एक सैय्याद की निगाहों ने पिंजरे में ला दिया। पीठ पीछे वो मेरी ख़ामियाँ गिनता रहा, मोहब्बत में जिसके आगे सिर अपना झुका दिया। उसकी नज़र से, मेरी तबीयत में बहार रहती थी फैर ली आंखें उधर, इधर वीराना बना दिया हम घबराकर ख़्वाब से आधी रात में जगते हैं एक सगंदिल ने, जां पे मेरी सदमा लगा दिया ख़्वाब अच्छे देखने का तो मुझको भी हक़ है फिर क्यों मेरे जज़्बात को उसने दबा दिया सबको लगा मुझपे किसी साए का असर है, उसके प्यार में पागल थे, ख़ुद को भुला दिया। सोचा न था इस मोड़ से भी गुज़रेंगे हम, सत्यं, हँसते हुए इक इंसान को मुर्दा बना दिया। कभी नाम भी न आता था मेरे लब पे मोहब्बत का, वो ख़ुद साहिल पे खड़ा रहा, मुझको डुबा दिया।