Posts

Showing posts from December, 2025

गर्मी पर शायरी

के मौसम गर्मी का बडा ही बे-दर्दी होता है ज़ालिम रज़ाई भी कतराती है नज़दीक आने में

धीरे धीरे

Image
राहे-उल्फ़त में क़दम ना ज़ल्दबाज़ी में बढ़ा तुम चाहोगे निकालना तो फंस जाओगे धीरे-धीरे इश्क़ है यह जनाब शराब की क्या बिसात चढ़ गया है नशा तो अब उतरेगा धीरे-धीरे इत्तेदा ए ज़िंदगी में आते हैं उतार-चढ़ाव बहुत तपिश में तजुर्बे की जल संभल जाओगे धीरे-धीरे दबाई गई है कईं आवाज़ें मज़हब की आड़ में कईं औरत उठाने लगी है सिर अपना धीरे-धीरे खूबसूरती देखने वाले की नज़र में होती है सत्यं ये बात समझनी चाहिए हर नाज़नीं को धीरे-धीरे हमने अभी सपने बोएं है जिंदगी नइ बोई कोई मिल जाए हमसफ़र तो बसा लेंगे घर धीरे-धीरे मेरे जेहन पे छाया है खुमार तेरी मुहब्बत का काश! तू भी तड़प उठे मेरी मुहब्बत को धीरे-धीरे

बहका-बहका मौसम

Image
अपनी ख़्वाहिशों को यूं ना आज़माया कर कभी भीगने का मन हो तो भीग जाया कर तेरे बदन की शायरी में तमाम हरूफ बड़े कटीले हैं मैं शायर बड़ा गठीला हूं इज़ाज़्त दो कुछ अपना लिखूं हमें यूं लगा कि मोहब्बत का जमाना है फरवरी रोज़ ले लिया उसने पर रोज़ देने से मना कर दिया इन दिनों ही तो हम कुछ जुदा-जुदा से रहने लगे एक ज़माने में हमने फूलों की बहोत इज्जत की अब मैं अपने होठों को प्यासा नहीं रखता कई सहराओं से गुज़रा हूं दरिया तक आने में तेरे बदन पे जहाँ तिल है जानेमन, वहीं मेरा दिल है बेशक तू किसी से भी प्यार कर पर मुझे उस चीज से मत इनकार कर ता-उम्र साथ देना ना देना तो तेरी मर्जी है पर जरूरत के वक्त तो मत इनकार कर यह आलम शहनाई का होता तो अच्छा होता हिसाब जज़्बातों की भरपाई का होता तो अच्छा होता कमबख्त कंबल की आग भी अब बुझने लगी इस सर्दी इंतजाम रजाई का होता तो अच्छा होता ये सर्द रातें गरमा जाए तो क्या हो तन्हाई मेरी महक जाए तो क्या हो मैं तसव्वर में पढ़ रहा हूं हर-रात जिसे वही किताब हकीकत बन जाए तो क्या हो यही कमबख्त महीना था फरवरी इन्हीं दिनों छोड़ गई थी मुझे वो **मरी

बाज़ (शायरी)

Image
कल मिरी परवाज़ ऊंचाई छू लेगी आज मैं नाख़ून-ओ-पंख नोच रहा हूं यूं ही नइं कोई किनारा करता है बाज़ इकला ही बुलंदी छूता है चंद कव्वों पे यहां नइं नइं रवानी आयी है बाज़ से टकरा रहे हैं मौत दर तक लायी है हवा चाहे जिधर भी उडे ज़माने की यहां लेकिन रियासत ए फ़लक तो बाज़ के क़दमों में रहती है

रिश्तेदारी, संबंध और मां-बाप शाइरी

Image
मेरी बदनसीबी ने ख़ाक में मिला रखा था मुझें वो ख़िज़ां के मौसम की आंच दिल में दफ़न है फिर भी छूते रहें क़दम मेरे क़ामयाबी की मंज़िल ये मेरी मां की दुआओं का असर है। जिनके हाथ तजुर्बे से भरे होते हैं जिंदगी के खेल में माहीर वही लोग बडे होते हैं साथ रखना हमेशा बुजुर्गों को अपने बलाएं छूती नहीं, जिन हाथ में ताबीज़ बंधे होते हैं मेरा दिल गवाही ये बार-बार देता है जब है पिता सलामत तो चाहत नहीं ख़ुदा की हमने चिरागों को तालीम कुछ ऐसी दे रखी थी के घर जल गए दुश्मन के, इल्ज़ाम भी हवाओं पे गया मेरे अपने मेरी उम्र को छिपाते रहे शायद बड़ों की नज़र में छोटे बच्चे ही होते हैं आ मेरे जिग़र के टुकडे तुझे आंखों में बसा लूं तूने चलना भी नहीं सीखा और दरिया सामने है तेरे कई दिनों से मुझे कोई दर्द नहीं मिला मलाल ये है के अपनों से भी दूर हूं मैं इस मतलबी दुनिया में कोई सहारा ना मिला वो मां थी जो मरने के बाद भी मेरे काम आई आ मेरे जिग़र के टुकडे तुझे आंखों में बसा लूं तूने चलना भी नहीं सीखा और दरिया सामने है तेरे

Sher (मुकम्मल) एक कलाम सत्यं के नाम

Image
ये मंज़र भी मैं इक रोज़ दिखाऊँगा उसे किसी सरफ़रोश से रू-ब-रू कराऊँगा उसे अभी हुक्म का इक्का है मेरी आस्तीन में ज़रूरत पड़ी तो बा-ख़ुदा खेल जाऊँगा उसे ख़ुदग़र्ज़ बड़े हैं लोग एहसान भूल गए हर शख़्स की ख़ातिर जो लड़ा इंसान भूल गए आँधियों से गुज़ारिश है अपनी हद में रहें पल-भर हमारी आँख लगी औक़ात भूल गए दुश्मन को भी नज़र-ए-इनायत देते हैं हम गुस्ताख़ी पे उसकी ख़ुद ही पर्दा देते हैं हम शर्मिंदा ही रहेगा जब भी सामना होगा इज़्ज़त उसकी उसी की नज़रों में गिरा देते हैं हम पूछ कर गुज़री वो दास्ताँ, सत्यं इक शायर को रुलाने का ख़याल अच्छा है मैं अब किसी से कोई उम्मीद नहीं रखता मेरे मयार के मुताबिक कोई मेरी नज़र में नहीं जिल्द देखकर भला क्या साबित करोगे तुम बंद किताबों पर कोई फ़ैसला नहीं लिया जाता कभी बे-बात सुनना, कभी छुप कर रोना इतना आसान नहीं है, सत्यं होना दुश्मन को भी मोहब्बत की सज़ा देते हैं हम नज़र में उसकी अपनी दीद शर्मिंदगी बना देते हैं हम जिनका दिल है घर मेरा, वो दिल के अंदर हैं अभी और बहुत हैं चाहत, ऐसे दीवानों के पैदाइशी शौक़ है ख़तरों से खेलना होते रहे सामना, सो मोहब्बत कर ली इन दिनों गर्...

Sher (मुकम्मल) चार लाइन वाले

Image
वो मेरी हद-ए-तसव्वुर से गुज़रता क्यों नहीं नशा उसके अन्दाज़ का उतरता क्यों नहीं मैं हैरान हूँ ये सोचकर उसके बारे में ढलता है वक़्त, हुस्न उसका ढलता क्यों नहीं उजाले कफ़न ओढ़कर सोने लगे सहारे सिरों को झुका रोने लगे जहाँ देखो हर तरफ मातम है छाया फ़रिश्ते ख़ुदा की मौत पर रोने लगे अलग सोच ज़माने की बना लेनी चाहिए, उठे जो भी सदाएँ, वो दबा देनी चाहिए। ज़रूरी नहीं शमशीर क़त्ल को ही उठे, दहशतगर्दी को भी लहरा देनी चाहिए। मेरे दिल में वो शम्अ-ए-मुहब्बत जलाता रहा मेरे जुनून पर कामयाबी का रास्ता बनाता रहा जिसे लेकर गया था मैं एक रोज़ बुलंदी पर वही अपनी नज़र से मुझे गिराता रहा ख़ामोशियाँ सुनो तो सुनाई देती हैं आहटें आँखों में दिखाई देती हैं तुम मानो या न मानो कोई बात नहीं तेरी आवाज़ मोहब्बत की गवाही देती है

अंबेडकर साहब की शायरी | Ambedkar Sahab Shayari

जिसका कोई जवाब न हो, ऐसा कोई सवाल मिले, वो राह दिखाती लोगों को, जलती कोई मशाल मिले। मैंने इतिहास के पन्नों को कई बार पलटकर देखा, 'बाबा साहब'-सी दुनिया में दूजी न कोई मिसाल मिले। एक बाग़बाँ सूखे पेड़ों पर लहू की बारिश करता रहा, कतरा-कतरा उम्मीद की क्यारियों में भरता रहा। सूरज भी थक के उठता है रातभर आराम के बाद, वो मसीहा हमारी ख़ातिर दिन-रात एक करता रहा। दिया न ख़ुदा ने जो, एक इंसान दे गया, मुस्कुराहट का अपनी वो बलिदान दे गया। काल को दे दी क़ुर्बानी अपने लाल की, बदले में हमें ख़ुशियों का वरदान दे गया। ख़ुदाओं के शहर में वो ख़ुदा से ज़्यादा दे गया, औरत को, पिछड़ों को जीने का इरादा दे गया। ये ब्रह्मास्त्र भी ऊँच-नीच का कल टूट ही जाएगा, वो जाते-जाते संविधान की मज़बूत ढाल दे गया। वो शख़्स हर शख़्स की तक़दीर हो गया, पढ़-लिखकर इंसाफ़ की शमशीर हो गया। कल्पना में सुनी थी हम ने लक्ष्मण रेखा, बाबा का लिखा पत्थर की लकीर हो गया। गुम अंधेरों में थी गुज़रती ज़िंदगी मेरी, अब सवेरे की राह पर मेरा सफ़र है। खुल गए सब रास्ते जहां में मेरे लिए, ये मेरे बाबा की हिदायत का असर है। एक फ़रिश्ते ने अंधेरों...

Ghazal (मुकम्मल) पुरानी ईंट सही हम

ये रास्ते, ये सफ़र रह जाएँगे मेरे जाने के बाद और रह जाएँगी मेरी यादें मेरे जाने के बाद तुम्हें आँख भर के कोई न देखेगा ज़माने में बहुत रुलाएँगी बातें माँ-बाप गुज़र जाने के बाद हमें कमसिनी में घर से निकाला गया बे-क़सूर मेरे वालिद ने ये बताया जी भर आने के बाद वो बद-मिज़ाज अब बदज़ुबानी सहने लगा आ गया उसे सलीक़ा बेटी घर आने के बाद ये जो गुरूर है मेरा तेरी बेरुख़ी पे टिका उतर जाता है नशे-सा हँस के बुलाने के बाद मैं सोचता हूँ कोई ग़ज़ल अपने हालात पे लिखूँ मुहब्बत लिख जाता है क़लम उठाने के बाद उलझ गई थी ज़िंदगी सबको अपना कहते-कहते आसान कर लिया सबको औक़ात पे लाने के बाद पुरानी ईंट सही हम, तू बे-क़द्री से न फेंक हमें ही अलग किया हमसे सिर छुपाने के बाद

Ghazal (मुकम्मल) ता-उम्र जो मिला ज़ख़्म

ता-उम्र जो मिला ज़ख़्म, निशानी की तरह, मैं ख़ून था जो बहा दिया पानी की तरह। मैंने साथ रहने की अपनों से मिन्नतें कीं, वो बात भी करते रहे मेहरबानी की तरह। चाहे जितना भी तुम अहम किरदार बनो, तुम्हें भुला दिया जाएगा कहानी की तरह। मिट्टी को मिलना है इक दिन मिट्टी में, ग़ुरूर भी ढल जाएगा जवानी की तरह। फिर उनसे तर्क-ए-तअल्लुक़ ठीक नहीं, याद रखना है अगर बात पुरानी की तरह। मुझे ठुकरा के ग़ुरबत में गुज़ारा करती है, जो मुझ पे हुकूमत करती थीं रानी की तरह। तू भी दुनिया के रंग मुझको दिखाने लगी, मैं भी छोड़ दूँगा तुझे एक दीवानी की तरह।