जिसका कोई जवाब न हो, ऐसा कोई सवाल मिले, वो राह दिखाती लोगों को, जलती कोई मशाल मिले। मैंने इतिहास के पन्नों को कई बार पलटकर देखा, 'बाबा साहब'-सी दुनिया में दूजी न कोई मिसाल मिले। एक बाग़बाँ सूखे पेड़ों पर लहू की बारिश करता रहा, कतरा-कतरा उम्मीद की क्यारियों में भरता रहा। सूरज भी थक के उठता है रातभर आराम के बाद, वो मसीहा हमारी ख़ातिर दिन-रात एक करता रहा। दिया न ख़ुदा ने जो, एक इंसान दे गया, मुस्कुराहट का अपनी वो बलिदान दे गया। काल को दे दी क़ुर्बानी अपने लाल की, बदले में हमें ख़ुशियों का वरदान दे गया। ख़ुदाओं के शहर में वो ख़ुदा से ज़्यादा दे गया, औरत को, पिछड़ों को जीने का इरादा दे गया। ये ब्रह्मास्त्र भी ऊँच-नीच का कल टूट ही जाएगा, वो जाते-जाते संविधान की मज़बूत ढाल दे गया। वो शख़्स हर शख़्स की तक़दीर हो गया, पढ़-लिखकर इंसाफ़ की शमशीर हो गया। कल्पना में सुनी थी हम ने लक्ष्मण रेखा, बाबा का लिखा पत्थर की लकीर हो गया। गुम अंधेरों में थी गुज़रती ज़िंदगी मेरी, अब सवेरे की राह पर मेरा सफ़र है। खुल गए सब रास्ते जहां में मेरे लिए, ये मेरे बाबा की हिदायत का असर है। एक फ़रिश्ते ने अंधेरों...