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Sher 9 (मुकम्मल)

ग़ज़ल उगती नहीं हरगिज़ बंजर ज़मीन से, यह क़सीदा तजुर्बे के हाथ से बुना जाता है माँगी   जा   रही   है   राय   मेरे   बारे   में , ग़लत   आदमी   मुझे   ग़लत   बता   रहे   हैं । मुफ़लिसी में मोहब्बत का अंजाम यूँ हुआ मैं चलता रहा और  फ़ासले  बढ़ते गए यह फ़र्क तो इंसानी नज़रिये का है सत्यं, वरगना हिदायत-ए-क़ुरआन-ओ-पुराण में ज़रा भी फ़र्क नहीं। बहुत ज़ालिम है दुनिया, ज़रा किनारा करो, खिलते चेहरों से यह हँसी चुरा लेती है। हाँ, ये झूठ है कि मैं तुम पर मरता हूँ, तुम सच को तो सच मानने से रहे। कोई सिमट जाए मेरी सूनी बाहों में, है कोई दुनिया में बदनाम होने वाला? बस यही फ़लसफ़ा सर उठाए हुए हैं हम, मोहब्बत से, ज़माने से शिकस्त खाए हुए हैं हम।

Ghazal (मुकम्मल) इस बहार में नख़रे

इस बहार में नख़रे मुरझाए गुल पे आ गए, हमसे हुई ग़लती कि हम खुल के आ गए। जो उठाए थे सिर पे गुनाहों का बोझ वो, जा मिले हुकूमत से पाक धुल के आ गए। उसके दिल में पले-बड़े ख्व़ाब बग़ावत के, जुबाँ से अल्फ़ाज़ के सहारे घुल के आ गए। एक हुजूम था मगर कोई भी अपना न था, ग़ैर के साथ ग़ैर से ही मिल-जुल के आ गए।

शेर

वो अब सामने से भी गुजरे तो धड़कन तेज़ नहीं होती वरना तस्वीर से भी होती थी घंटो बातें कभी कभी एक आईने को मैंने आईना दिखा दिया सब में नुक्स निकालता फिरता था शौक भुला दिया मैं अपने चेहरे पर खुशी की झलक रखता हूं अंदर से टूटा हूं मगर दुश्मन को परेशां रखता हूं मजबूरियों पे पाबंद हूं और चुप-चुप रहा नहीं जाता फ़र्क इतना है तुम कह देते हो, हमसे कहा नहीं जाता एतबार कर पैग़ाम ए मोहब्बत जिसके हाथों भेजा वो क़ासिद भी कमबख़्त मेरा रक़ीब निकला क्यों लगाये मैंने ख़्वाइशों के मेले मालूम था जब ख़्वाब हक़ीक़त नहीं होतें

Sher | हास्य शेरो-शायरी | Funny and Comedy Sher Shayari

मैं तेरा सिर अपने कांधे पे तो रख लूं पर क्या करूं तेरी ज़ुल्फ़ों में जूं बहुत है यह एहसान कर दे कहना मान ले मेरा कहीं डूब मर जाके, के मुंह दिखे ना दिखे ना तेरा वो एक हंसी ना, दूसरी हंस गई मैं पटा रहा था तीसरी को, चौथी पट गई जिंदा रहते वो इज़हारे-मोहब्बत ना कर सकी अब भूत बनके मेरे पीछे पड़ी है शे'र तो मैं मार दूं, तकरार से डरता हूं कहीं सज़ा ना दे दे मुझको, सरकार से डरता हूं यह सच है दोस्तों ख़ुदा सबसे बड़ा है वरना सिकंदर जैसे शाह बुखार से ना मारे जाते इतना सूख गया हूं तेरी बेवफ़ाई से के बस जी रहा हूं हकीम की दवाई से एक तो वो बदशक्ल है फिर ऊपर से बेअक़्ल है

Diwan E Satyam | Best Shayari ever

मैंने मुद्दतों में आज आईना देखा लोग बदल गए मैं वैसा ही हूं, इतना देखा नज़रे अब भी उसकी तलाश में लगी रहती है मैं लोगों के बीच घिरा रहता हूं, ये राहगीरों पे टिकी रहती है आफताब अब उसके दरवाज़े की हिफ़जत करता है चांद घटा से निकले भी तो निकले कैसे? कुछ लोग जल्दबाजी में ऐसे कदम उठा लेते हैं पहचान बनाने के चक्कर में पहचान गवां देते हैं सुना है के प्यार आंखों में दिखाई देता है पर कैसे साबित करूं सच्चा है या झूठा है हम अपनी नींद से भी समझौता करने लगे इन सोए हुओं को भी जगाना जरूरी है

Best Sher | Diwan E Satyam

मेरे दुश्मन ही नहीं एक मुझको ग़म देते हैं अब तो इनमें सितमग़र तेरा नाम भी आने लगा कभी सिगरेट कभी शराब हर रोज़ नए तज़ुर्बें करता हूं तेरे ग़म में सितमगर अपने रुतबे से भी गिर गया मैं      अपने जज़्बात पे उसूलों सा क़ायम रहा मैं तुम क्या जानो मर-मरके ये रस्म निभाई है ना मदहोशी का ना सरगोशी का मौसम मुझे मिला ये कैसी ग़म की हवा चली हर पल खिज़ा-खिज़ा मिला मैं भी ख़्वाहिशों के शहर में तू भी ख़्वाहिशों के शहर में घर अपना बनाने चले हैं इस तपती हुई दोपहर में ये मेरा बांकपन, शोख़पन, सब कुंवारापन है पर ये शादीशुदा कह रहे हैं आवारापन हैं

Sher | दर्द भरी शायरी | Best Sad Sher ever

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मैंने ज़माने की हर शय को बदलते देखा है इक तेरी याद के मौसम के सिवा क्यों लगाये मैंने ख़्वाहिशों के मेले मालूम था जब ख़्वाब हक़ीक़त नहीं होतें कैसे निकालूं दिल से बता तुझें सनम मैंने तो दर आये को भी गले लगाया है क्या सुनाए तुमको दास्ताने-दिल जीये जा रहे हैं ख़्वाहिशों के सहारे एक रोज़ उन्हें मांगेंगे दुआ कर खुदा से फ़िलहाल लुत्फ़ उठा रहा हूं इंतज़ार का मत मार पत्थर पे अपना सिर सत्यं चोट पहुंचेगी तुझे दर्द होगा बहुत वक़्त गुज़ार लूंगा किसी भी मुकाम पे मग़र होगी बड़ी दिक्कत शाम के ढ़लते