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Sher (मुकम्मल)

शायद मिरी चाहत मिरे जानिब खड़ी है सच बोला था नज़मी ने वो मग़रूर बड़ी होगी देखो बेमिस्ल फ़ैसला ये ख़ुदाई का तोड़ते-तोड़ते मुझे वो ख़ुदा टूट गया मालूम है दिल की दहलीज़ उन्हें मगर ज़िद पे अड़े हैं कोई अब उनको पुकार ले उसने जब अपनी चाहत का इज़हार कर दिया अधूरी मेरी ग़ज़ल थी मुकम्मल हो गई मैं मुसाफ़िर हूँ तेरी रज़ा की किश्ती का चाहे साहिल पे ले चल चाहे डुबा दे मुझे एक मुद्दत से मैं ख़ामोश चला आता हूँ  सोचा कह दूँ हाल-ए-दिल तड़पना ठीक नहीं गुज़रा है बदलते हुए हालात का हर मंज़र एक बस तेरी याद के मौसम के सिवा लिख दी है तब्दीलियाँ हर दौर ने हर शै पे एक बस तेरी याद के मौसम के सिवा उसे भूल जाने की करामात हो जाए बग़ैर इल्ज़ाम के ये सारी बात हो जाए

Sher (✓)

मुश्किल है बड़ा सच-झूठ का खेल समझ पाना, कई नक़ाब पड़े हैं एक चेहरे पे आजकल। ​नादानी में जो लोग क़दम उठा लेते हैं, पहचान की ख़ातिर पहचान गँवा देते हैं। चाहता हूँ ख़ुद से ही अब मैं रिहाई पाना, छीन ली है एक शख़्स ने आज़ादी मेरी। संभाला है ख़ुद को हमने क्या क्या देखकर किया नहीं गुनाह कोई ख़ुद को तन्हा देखकर हज़ार ग़म हैं और एक मुसीबत भी तो है, जिसको चाहूं मैं, वही दूर चला जाता है। क्यों लगाएं मैंने ये ख़्वाहिशों के मेले, मालूम था जब ख़्वाब हक़ीक़त नहीं होते। कैसे निकालूँ दिल से, बता तुझे ऐ सनम मैंने तो दर-आए को भी गले लगाया है ​तू भी छोड़ देना मुझे एक ज़माने के बाद, उतर जाएगा नशा मेरा आज़माने के बाद।

Sher | दीवान ए सत्यं | Diwan E Satyam | Anil Satyam

मेरे दुश्मन ही नहीं एक, मुझको ग़म देते हैं अब तो इनमें सितमग़र तेरा नाम भी आने लगा कभी सिगरेट कभी शराब हर रोज़ नए तज़ुर्बें करता हूं तेरे ग़म में सितमगर अपने रुतबे से भी गिर गया मैं मैं भी ख़्वाहिशों के शहर में, तू भी ख़्वाहिशों के शहर में घर अपना बनाने चले हैं, इस तपती हुई दोपहर में

Sher | 4 लाइन शायरी

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तुझे अपने दिल में बसा रखा है, खज़ाना जहाँ से छुपा रखा है। ​ज़माना खड़ा है खिलाफ़ अब मेरे, मगर हाथ तुझसे मिला रखा है। मिला एक मुझको भी ऐसा दिलदार लगा हूँ मैं जीने उसी का किरदार उसी का अक्स अब ज़ेहन में बसा है जुमेरात, जुमा, हो थावर, इतवार मोहब्बत जिससे भी मुझको ज़रा हो जाती है, वह मेरी जान से ज़्यादा मुझे हो जाती है। उसे पलकों पे अपनी मैं बिठा कर रखता हूँ, जो मेरी हो जाती है मेरी हो जाती है। मैं सितारों से सरगोशी करता हूं, जुगनुओं को रातभर खलता हूं। न देखो मुझे इतना गौर से यार मैं आंखों पर असर करता हूं। उसके सच झूठ में बदलने लगे, सोचते ही आँसू निकलने लगे। वो बेवफ़ा करता था वफ़ा की बात, आज सोचा तो दम ही निकलने लगे। सबके हिस्से हिस्से-दारी होनी चाहिए सबकी चादर-ओ-दीवारी होनी चाहिए बर्तन खाली चूल्हा ठंडा ही सही आँखों में 'सत्यं' ख़ुद्दारी होनी चाहिए ज़ख़्म मेरे अब मुस्कुराने लगे वो हमें और भी आज़माने लगे ​सजाए उसने फूल अपने बालों में भँवरे आगे-पीछे गुनगुनाने लगे बदन में मचलती हरारत सी है, तेरे वास्ते ये बशारत सी है। इजाज़त हो बाहों में भर लूँ तुझे, कि जागी तबीयत में शरारत सी है।...

Sher (शरारत)

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अपनी ख़्वाहिशों को यूं ना आज़माया कर कभी भीगने का मन हो तो भीग जाया कर तेरे बदन की शायरी में तमाम हरूफ बड़े कटीले हैं मैं शायर बड़ा गठीला हूं इज़ाज़्त दो कुछ अपना लिखूं हमें यूं लगा कि मोहब्बत का जमाना है फरवरी रोज़ ले लिया उसने पर रोज़ देने से मना कर दिया अब मैं अपने होठों को प्यासा नहीं रखता कई सहराओं से गुज़रा हूं दरिया तक आने में तेरे बदन पे जहाँ तिल है जानेमन, वहीं मेरा दिल है बेशक तू किसी से भी प्यार कर पर मुझे उस चीज से मत इनकार कर ता-उम्र साथ देना ना देना तो तेरी मर्जी है पर जरूरत के वक्त तो मत इनकार कर यह आलम शहनाई का होता तो अच्छा होता हिसाब जज़्बातों की भरपाई का होता तो अच्छा होता कमबख्त कंबल की आग भी अब बुझने लगी इस सर्दी इंतजाम रजाई का होता तो अच्छा होता ये सर्द रातें गरमा जाए तो क्या हो तन्हाई मेरी महक जाए तो क्या हो मैं तसव्वर में पढ़ रहा हूं हर-रात जिसे वही किताब हकीकत बन जाए तो क्या हो यही कमबख्त महीना था फरवरी इन्हीं दिनों छोड़ गई थी मुझे वो **मरी

Sher (✓) नशा

दर्द-ए-दिल अब मैं सुनाने से रहा अश्क आँखों के दिखाने से रहा ​होगी बरकत पैमाने में कभी जूठे प्याले मुँह लगाने से रहा तुम बैठी रहो मेरी नज़रों के सामने, आज मेरा मन है मदहोश हो जाने का। मय पी कर सँभलते ही नहीं जज़्बात मेरे, होश में रहता हूँ तो ख़ामोश ही रहता हूँ। कभी गुज़ारा था अपना बस एक ही जाम पर, अब तलब ऐसी बढ़ी है कि दो आँखें चाहिए। शराब पी कर भी जानाँ बहुत होश में हूँ, तू आँखों से ना पिला, बहकने का डर है। ​बंद है मय-कदा, और दूर उसका घर भी है, याद उसकी आज मुझको क़त्ल कर के छोड़ेगी । हर कोशिश मेरी बेकार रही संभल पाने की, कि हम डूब ही गए तेरी आँखों की गहराई में। तेरी आँखें नहीं तो क्या कोई जाम ही सही, अब सहारा कोई तो हो जिए जाने के लिए। तुम तो सियासती लफ़्ज़ों में बात करती हो, शराब छोड़ दो कहती हो, पास आती नहीं। ​थी हराम कल जो शराब, आज वो हलाल हो गई, होश में कह न सके, बेखुदी में बात हो गई साग़र है मेरे हाथ में आगोश में हो तुम, तौबा करूँ शराब से या तुमको छोड़ दूं ******************* मत फूंक मय से, अपना जिग़र ,सत्यं, बेख़ुद ही होना है तो इश्क़ में जला इस आँखों में उतर जा मेरी या जाम में उत...

Sher ✓ एक कलाम सत्यं के नाम

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यह मंज़र भी किसी दिन मैं दिखाऊँगा उसे किसी जाँबाज़ से रू-ब-रू कराऊँगा उसे ​छुपा रक्खा है इक इक्का अभी आस्तीन में ज़रूरत आ पडी तो खेल जाऊँगा उसे ख़ुदग़र्ज़ हैं वो लोग जो एहसान भूल गए लड़ा था जिनके वास्ते, वो इंसान भूल गए आँधियों से ये कहो कि अपनी हद में ही रहें शराफ़त हमनें क्या दिखाई, औक़ात भूल गए। दुश्मन को नज़र-ए-इनायत देते हैं हम ग़लती पे उसकी पर्दा गिरा देते हैं हम मिला न सकेगा वो आंखें कभी हमसे नज़रों में उसकी उसे गिरा देते हैं हम सितारे गर्दिशों में हैं हमारे इन दिनों वरना, लुटाएं हैं बड़े एहसाँ यहाँ ख़ैरात की सूरत। रहा है शौक़ ही ख़तरों से खेलना, होते रहे सामना, सो मोहब्बत कर ली। कभी बे-बात सुनना, कभी छुप कर रोना इतना आसान नहीं है, 'सत्यं' होना हुनर चेहरे को पढ़ने का क्या ही खूब आया है, उजाले में छुपी हर सूरत को पहचानता हूँ मैं। रौनक़ न देखिए मिरी सूरत की ऐ जनाब, ग़म को छुपाने का मिरा, अंदाज़ है यह। मैंने क़सम उठाई थी गुनाह न करने की मालूम न था लोग मोहब्बत को जुर्म समझते हैं मारा हुआ मैं अपनी ही क़िस्मत का हूँ 'सत्यं', वरना जो ख़ुशनसीब हैं, वो उनके क़रीब ह...