एक हसीना | Ek Haseena - कविता

मुझको मिली इक हसीना
वो जाड़े का था महीना
उसने कसकर मेरा सीना
कहां छोड़ जाना कभी ना

मौसम भी था कमीना
मुझको आने लगा पसीना
उसे आगोश में ले -यूं बोला
"रज़ा कहो ना?"

मेरे बाज़ुओं से ख़ुद को छीना
और कहती रही अभी ना
मेरा ज़वाब था -
"तो फिर कभी ना"

अब मौजों में था दिल शफ़ीना
कश्मकश में थी वो हसीना
यूं बोली - "मेरे दिलबर!"
'मुझे बाहों में ख़ुद लो ना'

उसका शाने से लिपटकर रोना
मैं भूल पाया अभी ना
अब छोड़ घर का कोना
उसे मांगूंगा जा मदीना



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